Highlights
- भारत में विदेशी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन 9 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा
- सिंगापुर, अमेरिका और ब्रिटेन सबसे बड़े निवेशक देशों में शामिल
- जर्मनी और दक्षिण कोरिया से भी तेजी से बढ़ी कंपनियों की एंट्री
- सेवाओं के क्षेत्र में सबसे ज्यादा विदेशी कंपनियों ने दिखाई दिलचस्पी
- चीन से भी तीन साल बाद फिर बढ़ी गतिविधि
नई दिल्ली। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है और इसका असर अब विदेशी कंपनियों की बढ़ती दिलचस्पी में साफ दिखाई देने लगा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में विदेशी कंपनियों के रजिस्ट्रेशन ने पिछले नौ साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के डेटा के आधार पर किए गए एक ताजा विश्लेषण में यह सामने आया है कि दुनियाभर की कंपनियां अब भारत को केवल बड़ा बाजार नहीं, बल्कि लंबी अवधि के रणनीतिक निवेश केंद्र के रूप में भी देखने लगी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस बार केवल अमेरिका या ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि सिंगापुर, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की कंपनियों ने भी भारत में तेजी से एंट्री की है। वहीं, दक्षिण अफ्रीका, घाना और उज्बेकिस्तान जैसे देशों की कंपनियों ने पहली बार भारत में अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत वैश्विक बिजनेस नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
9 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा विदेशी रजिस्ट्रेशन
कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में विदेशी कंपनियों के कुल रजिस्ट्रेशन बढ़कर 101 तक पहुंच गए। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में यह संख्या 57 थी। यानी सिर्फ एक साल में विदेशी रजिस्ट्रेशन में करीब दोगुनी तेजी देखने को मिली। अगर पुराने आंकड़ों से तुलना करें तो आखिरी बार वित्त वर्ष 2016-17 में यह संख्या 103 तक पहुंची थी। उसके बाद अब पहली बार विदेशी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन इतने बड़े स्तर पर देखने को मिला है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई बड़े कारण हैं, जिनमें भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, चीन प्लस वन रणनीति, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं और स्थिर नीतिगत माहौल प्रमुख हैं।
सिंगापुर बना सबसे बड़ा निवेशक केंद्र
इस बार भारत में विदेशी कंपनियों की एंट्री में सिंगापुर सबसे आगे रहा। MCA डेटा के मुताबिक:
| देश | FY26 रजिस्ट्रेशन | FY25 रजिस्ट्रेशन |
|---|---|---|
| सिंगापुर | 13 | 7 |
| अमेरिका | 10 | 6 |
| ब्रिटेन | 9 | 4 |
| जर्मनी | 8 | 1 |
| दक्षिण कोरिया | 8 | 4 |
| जापान | 7 | 8 |
सिंगापुर की बढ़ती मौजूदगी का एक बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि कई वैश्विक निवेश फंड और टेक कंपनियां एशियाई ऑपरेशंस के लिए सिंगापुर को हब की तरह इस्तेमाल करती हैं। वहां से भारतीय बाजार में निवेश करना आसान माना जाता है। अमेरिका और ब्रिटेन की कंपनियों की बढ़ती भागीदारी यह दिखाती है कि पश्चिमी कंपनियां भी भारत में लंबे समय के अवसर तलाश रही हैं। खासकर टेक्नोलॉजी, फाइनेंस, डेटा सर्विसेज और कंसल्टिंग सेक्टर में विदेशी कंपनियों की गतिविधियां बढ़ी हैं।
जर्मनी और दक्षिण कोरिया की तेजी ने चौंकाया
इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा संकेत जर्मनी और दक्षिण कोरिया की तेज ग्रोथ को माना जा रहा है। जर्मनी से जहां वित्त वर्ष 2024-25 में केवल एक कंपनी ने रजिस्ट्रेशन कराया था, वहीं FY26 में यह संख्या बढ़कर आठ हो गई। इसी तरह दक्षिण कोरिया की कंपनियों का रजिस्ट्रेशन चार से बढ़कर आठ तक पहुंच गया।
विश्लेषकों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भारत की बढ़ती क्षमता विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर रही है। भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन नीति का फायदा भी देश को मिल रहा है। चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए कई कंपनियां अब भारत में वैकल्पिक उत्पादन और बिजनेस बेस तैयार करना चाहती हैं।
पहली बार भारत पहुंचे नए देश
वित्त वर्ष 2025-26 में दक्षिण अफ्रीका, घाना और उज्बेकिस्तान जैसे देशों की कंपनियों ने पहली बार भारत में अपना रजिस्ट्रेशन कराया। यह केवल संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी बिजनेस विस्तार का प्रमुख केंद्र बन रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विशाल उपभोक्ता आबादी, डिजिटल इकोनॉमी और तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर रहा है।
FDI में भी इन देशों का दबदबा
सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान केवल कंपनी रजिस्ट्रेशन में ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में भी भारत के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दिसंबर तक कुल FDI इक्विटी प्रवाह में इन पांच देशों की हिस्सेदारी 62.4% रही। यह दिखाता है कि भारत में आने वाला विदेशी निवेश कुछ चुनिंदा रणनीतिक देशों से लगातार मजबूत हो रहा है।
चीन की वापसी के संकेत?
रिपोर्ट में चीन से जुड़े आंकड़े भी दिलचस्प हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में चीन से तीन कंपनियों ने भारत में रजिस्ट्रेशन कराया। पिछले तीन वर्षों में यह संख्या लगभग शून्य थी। हालांकि, यह अभी भी पुराने स्तर से काफी कम है। वित्त वर्ष 2018-20 के दौरान औसतन हर साल नौ चीनी कंपनियां भारत में रजिस्ट्रेशन कराती थीं। अब यह संख्या घटकर औसतन दो रह गई है।
भारत-चीन संबंधों में तनाव और निवेश नियमों की सख्ती के बाद चीनी कंपनियों की गतिविधियां सीमित हो गई थीं। लेकिन अब कुछ सेक्टरों में धीरे-धीरे फिर हलचल दिखाई दे रही है।
सेवा क्षेत्र बना विदेशी कंपनियों की पहली पसंद
MCA डेटा के अनुसार, कुल विदेशी रजिस्ट्रेशन में करीब 90% हिस्सा सेवा क्षेत्र का रहा। इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा गतिविधि देखने को मिली प्रोफेशनल सर्विसेज, फाइनेंस और इंश्योरेंस, रियल एस्टेट और रेंटल, कम्युनिकेशन और ट्रांसपोर्ट, ट्रेड और बिजनेस सर्विसेज, सोशल और कम्युनिटी सर्विसेज वहीं, मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग, बिजली, गैस और जल आपूर्ति जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की हिस्सेदारी करीब 10% रही।
इससे साफ है कि फिलहाल विदेशी कंपनियां भारत के सेवा आधारित बाजार में ज्यादा अवसर देख रही हैं। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी धीरे-धीरे निवेश बढ़ रहा है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह ट्रेंड?
विदेशी कंपनियों का बढ़ता रजिस्ट्रेशन केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। इसका सीधा असर रोजगार, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, टैक्स कलेक्शन और आर्थिक विकास पर पड़ता है।
अगर यह ट्रेंड अगले कुछ वर्षों तक जारी रहता है तो भारत एशिया का बड़ा बिजनेस हब बन सकता है, वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है, हाई-वैल्यू जॉब्स तैयार कर सकता है, निर्यात क्षमता मजबूत कर सकता है विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को अब केवल बाजार नहीं बल्कि “ग्लोबल ऑपरेशन बेस” के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि दुनियाभर की कंपनियां भारत में तेजी से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
निष्कर्ष
भारत में विदेशी कंपनियों के रजिस्ट्रेशन का नौ साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचना देश की आर्थिक मजबूती और वैश्विक भरोसे का बड़ा संकेत माना जा रहा है। सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की बढ़ती भागीदारी दिखाती है कि भारत अब वैश्विक निवेश मानचित्र पर बेहद मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है।
अगर सरकार नीतिगत स्थिरता और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार की गति बनाए रखती है, तो आने वाले वर्षों में भारत विदेशी निवेश और वैश्विक कंपनियों के लिए सबसे बड़े केंद्रों में शामिल हो सकता है।
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