पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान से जुड़े ऊर्जा संकट और वैश्विक व्यापारिक अस्थिरता के बीच भारत एक बार फिर दुनिया की बड़ी ताकतों के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे वाशिंगटन की उस कोशिश के रूप में देखा जा रहा है जिसके जरिए अमेरिका भारत के साथ बिगड़ते रिश्तों को दोबारा मजबूत करना चाहता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मार्को रूबियो के बीच हुई बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति सबसे बड़े मुद्दे रहे। खास बात यह रही कि अमेरिका ने खुलकर भारत को ऊर्जा सप्लाई बढ़ाने की पेशकश की। ऐसे समय में जब ईरान संकट के कारण वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है, अमेरिका का यह ऑफर भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से अहम माना जा रहा है।
आखिर अमेरिका भारत को ऊर्जा बेचने पर इतना जोर क्यों दे रहा?
अमेरिका लंबे समय से चाहता रहा है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कई प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन भारत ने सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की ऊर्जा जरूरतें और घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखना था।
भारत आज अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ी सी तेजी भी भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिति और महंगाई पर बड़ा असर डालती है। ऐसे में अमेरिका अब खुद को भारत के लिए एक भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार के रूप में पेश करना चाहता है।
मार्को रूबियो ने भारत दौरे से पहले भी कहा था कि अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद भारत की ऊर्जा आपूर्ति को विविधता देने में मदद कर सकते हैं। इसका सीधा संकेत यह है कि वाशिंगटन चाहता है कि नई दिल्ली रूस और ईरान जैसे देशों पर अपनी निर्भरता सीमित करे।
ईरान संकट ने अमेरिका की चिंता क्यों बढ़ाई?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित किया है। ईरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देशों में शामिल है और होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का बेहद अहम मार्ग माना जाता है। अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति गंभीर हो सकती है। यही वजह है कि अमेरिका भारत को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि वह ऊर्जा आपूर्ति में किसी तरह की कमी नहीं आने देगा। रूबियो ने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान को वैश्विक ऊर्जा बाजार को “बंधक” नहीं बनाने देगा। इस बयान को सिर्फ कूटनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि ऊर्जा बाजार को लेकर अमेरिकी रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।
ट्रंप की टैरिफ नीति ने रिश्तों में पैदा कर दी थी दूरी
हालांकि अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत होती रही है, लेकिन व्यापारिक मोर्चे पर कई बार तनाव भी सामने आया। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए थे, जिससे दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में खटास आ गई।
भारत लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापक व्यापार समझौते की कोशिश कर रहा है, लेकिन अब तक कोई अंतिम डील नहीं हो सकी है। अमेरिकी प्रशासन की “अनुचित व्यापार प्रथाओं” से जुड़ी जांचों ने भी नई दिल्ली की चिंता बढ़ाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वाशिंगटन अब समझ चुका है कि सिर्फ दबाव की नीति से भारत को अपने रणनीतिक खेमे में पूरी तरह नहीं लाया जा सकता। यही कारण है कि अब अमेरिका व्यापारिक तनाव कम करने और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर फोकस कर रहा है।
रूस और चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए चुनौती
भारत और रूस के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंध हैं। रूस सिर्फ रक्षा क्षेत्र ही नहीं बल्कि ऊर्जा सेक्टर में भी भारत का बड़ा साझेदार बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने भारी मात्रा में रियायती रूसी तेल खरीदा है।
दूसरी ओर चीन लगातार एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर भारत रूस और चीन के साथ ज्यादा करीब होता गया तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी रणनीति कमजोर पड़ सकती है।
यही वजह है कि अमेरिका भारत को अपने सबसे अहम साझेदारों में बनाए रखना चाहता है। क्वाड समूह, रक्षा सहयोग और टेक्नोलॉजी साझेदारी इसी रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।
पाकिस्तान फैक्टर ने भी बढ़ाई अमेरिकी मुश्किल
भारत में अमेरिकी नीति को लेकर चिंता का एक कारण पाकिस्तान के साथ बढ़ती अमेरिकी बातचीत भी है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता के बीच पाकिस्तान को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है।
भारत लंबे समय से अमेरिका-पाकिस्तान नजदीकियों को लेकर सतर्क रहा है। नई दिल्ली को आशंका रहती है कि वाशिंगटन अपने रणनीतिक हितों के कारण इस्लामाबाद को फिर से अहमियत दे सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका को भारत के साथ भरोसा बनाए रखने के लिए बेहद संतुलित नीति अपनानी होगी।
भारत की रणनीति क्या है?
भारत फिलहाल “संतुलन की कूटनीति” पर काम कर रहा है। नई दिल्ली एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक और तकनीकी सहयोग बढ़ा रही है, वहीं दूसरी तरफ रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध भी मजबूत बनाए हुए है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालिया बातचीत में साफ संकेत दिया कि भारत संघर्षों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए चाहता है। भारत खुलकर किसी एक खेमे में जाने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहा है। यही कारण है कि भारत आज अमेरिका, रूस, यूरोप और पश्चिम एशिया—सभी के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए आगे क्या चुनौती रहेगी?
ऊर्जा सुरक्षा आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल रहने वाली है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार समझौता, टैरिफ विवाद और चीन से जुड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियां भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती रहेंगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को आने वाले समय में ऊर्जा आयात के स्रोत बढ़ाने, घरेलू ऊर्जा उत्पादन मजबूत करने, और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष
मार्को रूबियो की भारत यात्रा ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका भारत को खोना नहीं चाहता। ऊर्जा सहयोग की पेशकश सिर्फ व्यापारिक सौदा नहीं बल्कि एक बड़ा रणनीतिक संदेश है। ट्रंप की टैरिफ नीतियों और वैश्विक तनावों के बाद दोनों देशों के रिश्तों में जो दूरी आई थी, अब उसे कम करने की कोशिश शुरू हो चुकी है।
हालांकि भारत भी अच्छी तरह समझता है कि बदलती वैश्विक राजनीति में उसे बेहद सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे। नई दिल्ली की कोशिश यही रहेगी कि वह अमेरिका, रूस और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सुरक्षित रख सके।
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