भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक तनाव जगजाहिर हैं। जापान और दक्षिण कोरिया भी चीन के खिलाफ कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सख्त रुख अपनाते रहे हैं। लेकिन अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां ये सभी देश एक ही मंच पर एकजुट दिखाई दिए हैं। वजह है यूनाइटेड किंगडम (UK) का स्टील आयात पर टैरिफ बढ़ाने का प्रस्ताव, जिसने एशिया के बड़े स्टील निर्यातक देशों की चिंता बढ़ा दी है।
विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया ने UK के प्रस्तावित स्टील सेफगार्ड उपायों का खुलकर विरोध किया है। यह मामला केवल टैरिफ बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक व्यापार, मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और आने वाले समय में स्टील उद्योग पर बड़े असर की आशंका जताई जा रही है।
क्या है UK का नया प्रस्ताव?
ब्रिटेन ने 1 जुलाई 2026 से स्टील आयात पर लागू अपने सेफगार्ड नियमों को और सख्त करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत दो बड़े बदलाव किए जाने की तैयारी है।
पहला, टैरिफ-फ्री स्टील आयात कोटा कम किया जाएगा। यानी अभी तक जितनी मात्रा तक बिना अतिरिक्त शुल्क के स्टील आयात किया जा सकता था, उसे घटा दिया जाएगा।
दूसरा, तय कोटे से अधिक स्टील आयात होने पर लगने वाला शुल्क 25% से बढ़ाकर 50% तक किया जा सकता है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ेगा जो बड़ी मात्रा में UK को स्टील निर्यात करते हैं।
ब्रिटेन का कहना है कि यह कदम घरेलू स्टील उद्योग को सस्ते आयात से बचाने के लिए उठाया जा रहा है। UK लंबे समय से अपने स्टील सेक्टर में लागत, ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों से जूझ रहा है।
WTO में क्यों भड़के कई देश?
WTO की गुड्स काउंसिल की बैठक में जापान और दक्षिण कोरिया ने सबसे पहले UK के प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि इस तरह के सेफगार्ड उपाय वैश्विक व्यापार नियमों की भावना के खिलाफ हैं और इससे मुक्त व्यापार प्रभावित होगा।
इसके बाद भारत, चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड और तुर्की जैसे देशों ने भी इस विरोध का समर्थन किया। इन देशों का मानना है कि UK अपने घरेलू उद्योग को बचाने के नाम पर अत्यधिक संरक्षणवादी नीति अपना रहा है। भारत ने WTO में साफ कहा कि अचानक टैरिफ बढ़ाने से स्टील व्यापार पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और इससे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत दुनिया के बड़े स्टील उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यूरोप और ब्रिटेन को स्टील निर्यात बढ़ाया है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का UK को लोहा और स्टील निर्यात करीब 900 मिलियन डॉलर रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर UK 50% टैरिफ लागू करता है तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और निर्यात प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ सकती है। इसका असर भारत के स्टील सेक्टर की कमाई पर भी दिखाई दे सकता है।
भारत की चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि हाल ही में भारत और UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सहमति बनी है। इस समझौते के तहत UK ने भारत से आने वाले 99% उत्पादों पर टैरिफ खत्म करने का वादा किया था। लेकिन अब स्टील पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी से भारत को लग रहा है कि FTA की मूल भावना कमजोर हो सकती है।
क्या FTA लागू होने में देरी हो सकती है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत इस मुद्दे को लेकर UK के साथ अलग से द्विपक्षीय बातचीत भी कर रहा है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि अगर स्टील विवाद का समाधान नहीं निकला तो भारत-UK FTA के लागू होने में देरी हो सकती है।
यह समझौता 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक लागू होने की उम्मीद थी। लेकिन अब स्टील टैरिफ का मुद्दा दोनों देशों के बीच एक नई बाधा बनता दिख रहा है। भारत चाहता है कि UK स्टील सेक्टर को लेकर ऐसा समाधान निकाले जिससे व्यापारिक संतुलन भी बना रहे और FTA पर भी असर न पड़े।
चीन और भारत एक साथ क्यों आए?
भारत और चीन के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद लंबे समय से चले आ रहे हैं। इसके बावजूद दोनों देशों का स्टील निर्यात काफी बड़ा है। UK जैसे बाजार में नए टैरिफ लागू होने से दोनों देशों के उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
इसी वजह से WTO में दोनों देशों का रुख इस मुद्दे पर समान दिखाई दिया। व्यापारिक हितों के मामले में अक्सर देश रणनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साथ खड़े हो जाते हैं। वैश्विक व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला दिखाता है कि आने वाले समय में आर्थिक हित कई बार भू-राजनीतिक तनाव से भी ऊपर चले जाते हैं।
ब्रिटेन आखिर ऐसा क्यों कर रहा है?
ब्रिटेन का स्टील उद्योग पिछले कई वर्षों से दबाव में है। ऊर्जा लागत बढ़ने, चीन समेत एशियाई देशों से सस्ते स्टील आयात और घरेलू उत्पादन घटने से वहां की कंपनियों पर संकट बढ़ा है।
ब्रिटिश सरकार घरेलू उद्योग और रोजगार बचाने के लिए सुरक्षा उपायों को सख्त करना चाहती है। UK पहले भी कई बार स्टील आयात पर सेफगार्ड उपाय लागू कर चुका है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक टैरिफ लगाने से वैश्विक व्यापार युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
दुनिया में बढ़ रहा संरक्षणवाद
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, यूरोप और अब UK में भी घरेलू उद्योग बचाने के लिए संरक्षणवादी नीतियां तेजी से बढ़ रही हैं। अमेरिका पहले ही चीन और कई देशों के स्टील पर भारी टैरिफ लगा चुका है।
यूरोपीय यूनियन भी कार्बन टैक्स और आयात नियमों को सख्त कर रही है। ऐसे में वैश्विक व्यापार पहले की तुलना में ज्यादा जटिल होता जा रहा है। भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती है कि वे अपने निर्यात को सुरक्षित रखें और नए व्यापारिक अवरोधों से निपटने की रणनीति बनाएं।
भारतीय स्टील कंपनियों पर क्या असर पड़ सकता है?
अगर UK का प्रस्ताव लागू होता है तो इसका असर भारत की कई बड़ी स्टील कंपनियों पर पड़ सकता है। UK भारतीय स्टील के लिए एक अहम बाजार माना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक: निर्यात लागत बढ़ सकती है, प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकता है, UK में भारतीय स्टील की प्रतिस्पर्धा घट सकती है, कंपनियां दूसरे बाजार तलाशने को मजबूर हो सकती हैं. हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भारत लंबे समय में वैकल्पिक बाजारों की ओर तेजी से बढ़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबकी नजर WTO में आगे होने वाली चर्चाओं और भारत-UK द्विपक्षीय वार्ता पर रहेगी। अगर दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचते हैं तो टकराव टल सकता है।
लेकिन यदि UK अपने प्रस्ताव पर कायम रहता है तो आने वाले समय में यह विवाद और बड़ा हो सकता है। इससे वैश्विक स्टील व्यापार में नई अस्थिरता पैदा होने की आशंका भी जताई जा रही है।
Also Read:


