पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, महंगी एलएनजी (LNG) और वैश्विक सप्लाई संकट के बीच चीन ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा दांव चल दिया है। दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक देश अब हजारों मीटर गहरी कोयला चट्टानों को तोड़कर गैस निकाल रहा है। इसे ‘कोल रॉक गैस’ (Coal Rock Gas-CRG) कहा जा रहा है। चीन की सरकारी ऊर्जा कंपनी पेट्रोचाइना (PetroChina) इस तकनीक पर अरबों डॉलर खर्च कर रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह मॉडल सफल रहा तो आने वाले वर्षों में वैश्विक गैस बाजार का पूरा समीकरण बदल सकता है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह बड़ा संकेत माना जा रहा है।
नई दिल्ली: दुनिया इस समय ऊर्जा असुरक्षा के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब पश्चिम एशिया में तनाव ने तेल और गैस बाजार को फिर अस्थिर कर दिया है। एलएनजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की चिंता गहरा गई है। ऐसे माहौल में चीन ने अपने घरेलू संसाधनों के जरिए नई गैस क्रांति की तैयारी शुरू कर दी है।
चीन अब पारंपरिक गैस स्रोतों से आगे बढ़कर गहरी कोयला चट्टानों में फंसी गैस निकालने पर जोर दे रहा है। यह सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। चीन का लक्ष्य भविष्य में गैस आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू उत्पादन बढ़ाना है।
क्या है कोल रॉक गैस (CRG)?
कोल रॉक गैस ऐसी प्राकृतिक गैस है जो जमीन के भीतर गहरी कोयला चट्टानों में फंसी होती है। इसे निकालने के लिए एडवांस हॉरिजॉन्टल ड्रिलिंग और हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग यानी ‘फ्रैकिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। यही तकनीक अमेरिका में शेल गैस क्रांति का आधार बनी थी।
फ्रैकिंग प्रक्रिया में जमीन के भीतर बहुत अधिक दबाव के साथ पानी, रेत और रसायनों को भेजा जाता है। इससे चट्टानों में दरारें बनती हैं और उनमें फंसी गैस बाहर निकलती है। चीन ने इसी तकनीक को अपने विशाल कोयला भंडारों के साथ जोड़कर नया ऊर्जा मॉडल तैयार किया है।
चीन क्यों कर रहा है इतना बड़ा निवेश?
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। उसका फोकस अब सिर्फ तेल आयात पर नहीं बल्कि घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाने पर है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक है और उसे लंबे समय से इस बात की चिंता रही है कि किसी भी वैश्विक संघर्ष की स्थिति में उसकी सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि पेट्रोचाइना 2035 तक करीब 30 अरब क्यूबिक मीटर कोल रॉक गैस का उत्पादन कर सकती है। यह चीन के मौजूदा शेल गैस उत्पादन से भी ज्यादा होगा। अगर ऐसा होता है तो चीन एलएनजी आयात पर अपनी निर्भरता काफी हद तक कम कर सकता है।
ऑर्डोस बेसिन बना चीन का नया ऊर्जा केंद्र
चीन का ऑर्डोस बेसिन इस परियोजना का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यह क्षेत्र तीन प्रांतों तक फैला हुआ है और यहां विशाल कोयला भंडार मौजूद हैं। पेट्रोचाइना ने यहां हजारों मीटर गहराई तक हॉरिजॉन्टल ड्रिलिंग शुरू की है।
रिपोर्ट के मुताबिक दाजी क्षेत्र में एक कुएं से रोजाना लगभग 1 लाख क्यूबिक मीटर गैस निकल रही है। इस सफलता के बाद चीन ने बड़े स्तर पर ड्रिलिंग अभियान शुरू कर दिया। अब तक 700 से ज्यादा CRG कुएं खोदे जा चुके हैं।
चीन की सरकारी कंपनी CNPC का अनुमान है कि देश के 14 प्रमुख कोयला बेसिनों में करीब 13 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर गैस के ऐसे भंडार मौजूद हैं जिन्हें तकनीकी रूप से निकाला जा सकता है। यह आंकड़ा दुनिया के ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चीन को कैसे मिलेगा रणनीतिक फायदा?
विश्लेषकों के अनुसार चीन की गैस खपत 2040 तक 600 से 650 bcm तक पहुंच सकती है। ऐसे में अगर चीन घरेलू स्तर पर गैस उत्पादन बढ़ाने में सफल हो जाता है तो उसका एलएनजी आयात कम हो जाएगा।
इसका असर वैश्विक ऊर्जा राजनीति पर भी पड़ेगा। अभी चीन रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन गैस पर काफी निर्भर है। रूस लंबे समय से ‘Power of Siberia 2’ पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाना चाहता है। लेकिन अगर चीन को घरेलू गैस के बड़े स्रोत मिल जाते हैं तो उसकी मोलभाव की ताकत बढ़ जाएगी।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक भी है। बीजिंग भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान ऊर्जा सप्लाई सुरक्षित रखना चाहता है।
इलेक्ट्रिक वाहनों ने भी दी बड़ी मदद
चीन ने सिर्फ गैस उत्पादन पर ही फोकस नहीं किया है। उसने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया है। दुनिया में सबसे ज्यादा EV चीन में बिकते हैं। इससे तेल की मांग पर दबाव कम हुआ है।
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि चीन की EV रणनीति और घरेलू गैस उत्पादन मॉडल मिलकर उसे ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बना सकते हैं। यही कारण है कि पश्चिम एशिया संकट के बावजूद चीन पर उतना दबाव नहीं दिख रहा जितना दूसरे देशों पर दिख रहा है।
क्या भारत भी अपना सकता है यह मॉडल?
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। एलएनजी की कीमतों में तेजी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, उर्वरक उद्योग, बिजली उत्पादन और सीएनजी कीमतों पर पड़ता है।
भारत के पास भी विशाल कोयला भंडार हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े कोयला बेसिन मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत डीप फ्रैकिंग और हॉरिजॉन्टल ड्रिलिंग तकनीकों में निवेश बढ़ाए तो वह भी कोयला चट्टानों में फंसी गैस निकाल सकता है।
ONGC और Coal India पहले से Coal Bed Methane (CBM) परियोजनाओं पर काम कर चुके हैं। हालांकि भारत अभी तकनीकी और लागत के मामले में चीन से काफी पीछे माना जाता है।
भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती तकनीक और लागत है। चीन ने इस तकनीक पर एक दशक से ज्यादा समय तक काम किया है। उसके पास विशाल ड्रिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी समर्थन है।
इसके अलावा फ्रैकिंग तकनीक को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी हैं। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में पानी और रसायनों का इस्तेमाल होता है। कई देशों में इसे भूजल प्रदूषण और छोटे भूकंपों के जोखिम से भी जोड़ा गया है।
भारत में पर्यावरणीय मंजूरी और भूमि अधिग्रहण जैसी चुनौतियां भी बड़े पैमाने पर परियोजनाओं को धीमा कर सकती हैं।
लागत अभी भी बड़ी समस्या
विश्लेषकों का कहना है कि कोल रॉक गैस उत्पादन की लागत फिलहाल काफी अधिक है। दक्षिण-पश्चिम चीन के सिचुआन बेसिन में शेल गैस परियोजनाओं की ब्रेक-ईवन लागत 1.7 से 1.8 युआन प्रति क्यूबिक मीटर बताई गई है, जबकि पारंपरिक गैस की लागत इससे काफी कम है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने और तकनीक बेहतर होने के बाद लागत कम हो सकती है। चीन अब ऐसी नई तकनीकों पर भी काम कर रहा है जिनसे फ्रैकिंग में पानी और रसायनों का इस्तेमाल घटाया जा सके।
दुनिया की ऊर्जा राजनीति बदल सकती है
ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक लड़ाई बन सकती है। चीन जिस तरह घरेलू संसाधनों को नई तकनीक के जरिए ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रहा है, वह बाकी देशों के लिए भी संकेत है।
अगर चीन CRG उत्पादन में बड़े स्तर पर सफल हो जाता है तो वैश्विक एलएनजी बाजार, पाइपलाइन गैस समझौते और ऊर्जा कीमतों पर बड़ा असर पड़ सकता है। इससे अमेरिका, रूस, कतर और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े गैस निर्यातकों की रणनीतियों पर भी प्रभाव पड़ेगा।
भारत के लिए बड़ा सबक
भारत लंबे समय से ऊर्जा आयात पर भारी खर्च करता रहा है। कच्चे तेल और गैस की वैश्विक कीमतों में उछाल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में चीन का यह मॉडल भारत के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को भी अब पारंपरिक ऊर्जा सोच से आगे बढ़ना होगा। सिर्फ आयात आधारित मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू गैस संसाधनों की खोज और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाना जरूरी हो सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय में सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक ताकत भी तय करेगी। चीन फिलहाल इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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