अमेरिका के फैसले से वैश्विक बाजार को राहत
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने एक बड़ा फैसला लेते हुए रूसी समुद्री मार्ग से कच्चे तेल की खरीद पर दी गई छूट को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है। इस फैसले से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह छूट समाप्त हो जाती, तो वैश्विक बाजार में सप्लाई संकट और गहरा सकता था। इससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भारी दबाव पड़ता और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती थी।
भारत ने साफ कहा- ऊर्जा सुरक्षा सबसे पहले
अमेरिकी छूट को लेकर चर्चा तेज होने के बीच भारत सरकार ने भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा, क्योंकि देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा और व्यावसायिक हित सबसे महत्वपूर्ण हैं।
अधिकारी ने कहा कि भारत किसी भी विदेशी दबाव या प्रतिबंध के बजाय अपनी आर्थिक जरूरतों और उपलब्ध सप्लाई के आधार पर फैसले लेता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने लंबे समय के समझौतों के जरिए पर्याप्त कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर रखी है, इसलिए फिलहाल सप्लाई को लेकर कोई संकट नहीं है।
दरअसल, रूस से मिलने वाला डिस्काउंटेड क्रूड भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ है। पिछले दो वर्षों में भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदकर अपनी आयात लागत को नियंत्रित करने की कोशिश की है।
क्यों बढ़ीं कच्चे तेल की कीमतें?
हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में संभावित व्यवधान की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यदि यहां कोई बाधा आती है, तो वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। इसी डर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी देखने को मिली।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचता है, तो आने वाले समय में तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और रुपये पर पड़ सकता है।
अमेरिका ने क्यों दी अतिरिक्त छूट?
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मार्च के मध्य में यह अस्थायी छूट जारी की थी, जिसे अप्रैल में बढ़ाया गया और अब फिर एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना और तेल की कीमतों को अनियंत्रित होने से रोकना बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका भी नहीं चाहता कि अचानक रूसी तेल बाजार से बाहर हो जाए, क्योंकि इससे वैश्विक स्तर पर ईंधन संकट पैदा हो सकता है। यही वजह है कि प्रतिबंधों के बावजूद सीमित अवधि की राहत दी जा रही है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर उतार-चढ़ाव का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
यदि रूस से सस्ता तेल मिलता रहता है, तो भारत को आयात बिल नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी कुछ हद तक दबाव कम हो सकता है। हालांकि यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है, तो आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने का खतरा बना रहेगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बढ़ती तेल कीमतों से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में कमजोरी आ सकती है।
वैश्विक बाजार की नजर अब अगले फैसले पर
फिलहाल वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर अमेरिका के अगले कदम और पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हुई है। यदि तनाव कम होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं, तो दुनिया भर में ईंधन महंगा हो सकता है।
भारत के लिए आने वाले कुछ सप्ताह काफी अहम माने जा रहे हैं, क्योंकि तेल की कीमतें सीधे आम लोगों की जेब, महंगाई और आर्थिक विकास पर असर डालती हैं।
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