भारतीय रुपया एक बार फिर भारी दबाव में दिखाई दे रहा है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 96.45 तक फिसल गया। विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अनिश्चितता और बढ़ती है तथा विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है, तो आने वाले दिनों में रुपया 97 प्रति डॉलर के स्तर की ओर भी बढ़ सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति केवल करेंसी मार्केट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों, शेयर बाजार और आम लोगों की जेब तक पहुंचता है।
क्यों टूट रहा है रुपया?
भारतीय मुद्रा पर इस समय सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों से आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों को सुरक्षित निवेश की ओर धकेल दिया है। ऐसी परिस्थितियों में निवेशक अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड को सुरक्षित विकल्प मानते हैं। परिणामस्वरूप उभरते बाजारों से पैसा निकलने लगता है और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है।
करेंसी बाजार के जानकारों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी चिंताओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में शामिल यह समुद्री रास्ता अगर किसी भी तरह प्रभावित होता है, तो तेल की सप्लाई बाधित हो सकती है और वैश्विक बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी चिंता का कारण
रुपये की कमजोरी के पीछे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की गतिविधियां भी अहम भूमिका निभा रही हैं। हाल के कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से निकासी की है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो उन्हें रुपये बेचकर डॉलर खरीदना पड़ता है। इससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर वैश्विक जोखिम की स्थिति बनी रहती है तो विदेशी निवेशकों की सतर्कता जारी रह सकती है। इसका सीधा असर रुपये पर दिखाई देगा।
क्या 97 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है रुपया?
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के अमित पबारी के अनुसार, इस समय बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ दिशा तय करना नहीं, बल्कि निवेशकों का विश्वास बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि जब तक वैश्विक तनाव कम नहीं होता और विदेशी निवेश में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
पबारी के मुताबिक 94.80 से 95.10 का स्तर रुपये के लिए अहम सपोर्ट जोन माना जा रहा है। हालांकि अगर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां और बिगड़ती हैं तो बाजार का फोकस धीरे-धीरे 97 प्रति डॉलर के स्तर की ओर शिफ्ट हो सकता है।
करेंसी विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां, कच्चे तेल की चाल और पश्चिम एशिया की स्थिति रुपये की दिशा तय करेंगी।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है।
1. पेट्रोल-डीजल हो सकते हैं महंगे
भारत को तेल आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लागत बढ़ेगी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा हो सकता है।
2. महंगाई बढ़ने का खतरा
कच्चा तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है। इसका असर खाने-पीने की चीजों, FMCG उत्पादों और रोजमर्रा के सामानों पर पड़ सकता है।
3. विदेश यात्रा और पढ़ाई होगी महंगी
कमजोर रुपये का असर विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों पर भी पड़ता है। डॉलर में फीस और खर्च बढ़ जाते हैं।
4. इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं
मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं क्योंकि इनके आयात में डॉलर का इस्तेमाल होता है।
शेयर बाजार पर क्या असर?
रुपये की कमजोरी का असर शेयर बाजार पर मिला-जुला रहता है। आईटी और फार्मा जैसी निर्यात आधारित कंपनियों को कमजोर रुपये से फायदा हो सकता है क्योंकि उनकी डॉलर में होने वाली कमाई बढ़ जाती है। हालांकि तेल आयातक कंपनियों, एविएशन सेक्टर और उन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है जिनकी आयात लागत ज्यादा है।
मंगलवार के कारोबार में भी निवेशकों की नजर रुपये की चाल और कच्चे तेल की कीमतों पर बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर डॉलर इंडेक्स मजबूत बना रहता है और कच्चे तेल में तेजी जारी रहती है, तो भारतीय बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
RBI क्या कर सकता है?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आमतौर पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में बाजार में हस्तक्षेप करता है। RBI डॉलर बेचकर रुपये को सपोर्ट देने की कोशिश कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक दबाव बहुत ज्यादा बढ़ता है तो केवल हस्तक्षेप से स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
RBI फिलहाल विदेशी मुद्रा भंडार और बाजार की तरलता के जरिए रुपये की अस्थिरता को सीमित रखने की कोशिश कर सकता है।
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर इन प्रमुख कारकों पर रहेगी कच्चे तेल की कीमतों की दिशा, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेत, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, RBI का संभावित हस्तक्षेप, डॉलर इंडेक्स की चाल
अगर इन मोर्चों पर राहत नहीं मिलती है तो रुपये पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।
क्या यह सिर्फ शुरुआत है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल बाजार बेहद संवेदनशील स्थिति में है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। यही कारण है कि रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है।
हालांकि अगर वैश्विक परिस्थितियों में सुधार आता है, कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं और विदेशी निवेशकों की वापसी होती है, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन फिलहाल बाजार में डर और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, जिसके चलते आने वाले दिनों में रुपये की चाल पर सभी की नजर रहने वाली है।
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