सोने की रिकॉर्डतोड़ कीमतों और लगातार बढ़ती आर्थिक चर्चाओं के बीच सोशल मीडिया पर एक खबर तेजी से वायरल होने लगी कि केंद्र सरकार देशभर के बड़े मंदिरों में जमा सोने का “मुद्रीकरण” (Gold Monetisation) करने जा रही है। दावा किया गया कि सरकार काशी, मथुरा, तिरुपति, पद्मनाभस्वामी जैसे बड़े मंदिरों में रखे सोने को अपने रणनीतिक भंडार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।
इस खबर के वायरल होते ही लोगों के मन में कई सवाल उठने लगे। क्या सरकार मंदिरों का सोना अपने नियंत्रण में ले लेगी? क्या धार्मिक संस्थाओं के पास जमा सोने को बेच दिया जाएगा? क्या मंदिरों के शिखरों और दरवाजों पर लगी सोने की परतों को भी सरकारी योजना में शामिल किया जाएगा?
अब इन तमाम सवालों पर सरकार की तरफ से आधिकारिक जवाब सामने आ गया है। वित्त मंत्रालय और PIB ने सोशल मीडिया पर चल रही इन खबरों को पूरी तरह फर्जी, भ्रामक और निराधार बताया है। सरकार ने साफ कहा है कि मंदिरों के सोने के मुद्रीकरण को लेकर कोई योजना नहीं बनाई गई है।
वित्त मंत्रालय ने क्या कहा?
👉 Clarification on false claims on monetisation of temple gold holdings
👉 Speculation and rumours suggesting that the Government is planning to introduce monetisation scheme for Gold held by temple trusts, or any religious institution, across the country are completely false,… pic.twitter.com/BcuGaogGM7
— Ministry of Finance (@FinMinIndia) May 19, 2026 वित्त मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में कहा कि देशभर के मंदिर ट्रस्टों या धार्मिक संस्थाओं के पास रखे सोने को लेकर किसी भी प्रकार की “Gold Monetisation Scheme” लागू करने की खबरें पूरी तरह झूठी हैं।
मंत्रालय ने कहा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि सरकार मंदिरों में रखे सोने को राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में इस्तेमाल करेगी, लेकिन ऐसी कोई नीति या प्रस्ताव सरकार के पास नहीं है।
सरकार ने लोगों से अपील की कि वे बिना पुष्टि वाली खबरों पर भरोसा न करें और न ही उन्हें आगे शेयर करें, क्योंकि इससे समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
किन मंदिरों का नाम वायरल खबरों में लिया गया?
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट्स में खासतौर पर कुछ बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों का जिक्र किया जा रहा था। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि, तिरुपति बालाजी मंदिर, श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, सिद्धिविनायक मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों के नाम शामिल थे। दावा किया गया कि इन मंदिरों में हजारों टन सोना जमा है और सरकार इसे आर्थिक जरूरतों के लिए उपयोग में ला सकती है। हालांकि सरकार ने इन सभी दावों को फर्जी बताया है।
मंदिरों में कितना सोना होने का अनुमान है?
भारत के बड़े मंदिरों में वर्षों से भक्तों द्वारा सोना, चांदी और कीमती आभूषण दान किए जाते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्ट्स और अनुमान बताते हैं कि देश के प्रमुख मंदिरों के पास हजारों करोड़ रुपये मूल्य का सोना मौजूद है।
विशेषज्ञों के अनुसार: तिरुपति बालाजी मंदिर के पास भारी मात्रा में सोना जमा है, केरल का पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया के सबसे धनी मंदिरों में गिना जाता है, कई मंदिरों के पास सोने के बर्तन, मुकुट, आभूषण और सोने की परतों से सजे शिखर मौजूद हैं. हालांकि इन संपत्तियों का आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
आखिर Gold Monetisation Scheme क्या होती है?
सोशल मीडिया पर वायरल अफवाहों के बाद लोगों के बीच “Gold Monetisation” शब्द को लेकर भी काफी चर्चा शुरू हो गई। दरअसल, भारत सरकार पहले से Gold Monetisation Scheme (GMS) चला चुकी है। इसका उद्देश्य लोगों और संस्थाओं के पास घरों या ट्रस्टों में निष्क्रिय पड़े सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाना था।
इस योजना के तहत लोग अपना सोना बैंकों में जमा कर सकते थे, बदले में ब्याज मिलता था. सरकार को सोने के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती थी लेकिन यह योजना पूरी तरह स्वैच्छिक थी। किसी व्यक्ति, मंदिर या संस्था पर सोना जमा कराने का दबाव नहीं था।
मंदिरों के सोने को लेकर पहले भी हो चुकी है बहस
यह पहला मौका नहीं है जब मंदिरों में रखे सोने को लेकर बहस छिड़ी हो। इससे पहले भी कई अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने सुझाव दिया था कि निष्क्रिय पड़े सोने को आर्थिक गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना रहा है कि यदि बड़ी मात्रा में सोना बैंकिंग सिस्टम में आए तो देश का आयात बिल कम हो सकता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घट सकता है, सरकार को सोना आयात कम करना पड़ेगा लेकिन दूसरी तरफ धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को देखते हुए इस विषय को बेहद संवेदनशील माना जाता है।
सरकार ने “रणनीतिक स्वर्ण भंडार” वाले दावे को भी बताया फर्जी
PIB की फैक्ट चेक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा था कि मंदिरों के शिखरों, दरवाजों और संरचनाओं पर लगी सोने की प्लेटों को “भारत का रणनीतिक स्वर्ण भंडार” माना जाएगा।
सरकार ने इस दावे को भी पूरी तरह झूठा बताया। सरकार के मुताबिक, ऐसी कोई योजना नहीं है जिसमें मंदिरों की धार्मिक संरचनाओं पर लगे सोने का सरकारी उपयोग किया जाए।
अफवाहों से क्यों बढ़ी चिंता?
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने की रिकॉर्ड कीमतों और आर्थिक अनिश्चितताओं के माहौल में ऐसी खबरें तेजी से वायरल हो जाती हैं। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में गोल्ड खरीद रहे हैं, वैश्विक तनाव और महंगाई के कारण सोने की मांग बढ़ी है
ऐसे माहौल में मंदिरों के सोने को लेकर वायरल हुई खबरों ने लोगों का ध्यान खींचा।
सरकार ने नागरिकों से क्या अपील की?
वित्त मंत्रालय ने लोगों से कहा है कि वे केवल अधिकृत सरकारी माध्यमों से जारी सूचनाओं पर भरोसा करें। सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी नई नीति की जानकारी आधिकारिक प्रेस रिलीज में दी जाएगी, सोशल मीडिया पोस्ट्स या अपुष्ट दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, फर्जी खबरें समाज में भ्रम और तनाव पैदा कर सकती हैं.
क्या सच में सरकार मंदिरों का सोना बेचेगी?
सरकार के आधिकारिक बयान के बाद स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि मंदिरों के सोने के मुद्रीकरण की कोई योजना नहीं है धार्मिक संस्थाओं के सोने को लेकर वायरल खबरें फर्जी हैं, मंदिरों की संपत्ति को “रणनीतिक गोल्ड रिजर्व” बनाने का दावा भी गलत है
यानि काशी से लेकर मथुरा, तिरुपति और पद्मनाभस्वामी मंदिर तक किसी भी धार्मिक संस्था के सोने को सरकार बेचने या कब्जे में लेने की कोई योजना फिलहाल नहीं बना रही है।
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