पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव अब भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधे असर डालने लगे हैं। कच्चे तेल, गैस और शिपिंग लागत में उछाल के बीच अब सबसे बड़ा दबाव उर्वरक यानी खाद सब्सिडी पर दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, अगर हालात लंबे समय तक बने रहे तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल बढ़कर करीब 2.41 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
यह अनुमान मौजूदा बजट प्रावधान से करीब 70,000 करोड़ रुपये अधिक है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर युद्ध का खाद सब्सिडी से क्या संबंध है, सरकार पर कितना वित्तीय बोझ बढ़ेगा, किसानों पर इसका क्या असर पड़ेगा और क्या देश में खाद की कमी होने वाली है?
आखिर क्यों बढ़ रही है उर्वरक सब्सिडी?
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। खासकर यूरिया, डीएपी (DAP), एनपीके कॉम्प्लेक्स और अमोनिया जैसे कई कच्चे माल के लिए देश काफी हद तक आयात पर निर्भर है।
पश्चिम एशिया संकट के कारण तीन बड़े असर दिखाई दे रहे हैं:
1. प्राकृतिक गैस महंगी हो रही है
यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस सबसे जरूरी कच्चा माल है। युद्ध के कारण गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आ रही है। इससे घरेलू उत्पादन लागत बढ़ रही है।
2. शिपिंग और बीमा लागत बढ़ गई
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। यहां तनाव बढ़ने के कारण जहाजों की बीमा लागत और माल ढुलाई खर्च बढ़ गया है।
3. आयातित खाद की कीमतों में उछाल
भारत को डीएपी और अन्य उर्वरकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है। वैश्विक कीमत बढ़ने पर सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ाती है।
सरकार ने कितना अनुमान लगाया?
उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस शर्मा ने संकेत दिया कि अगर हालात नहीं सुधरे तो उर्वरक सब्सिडी खर्च में भारी वृद्धि संभव है।
मौजूदा स्थिति
| मद | राशि |
|---|---|
| FY 2026-27 बजट प्रावधान | ₹1.71 लाख करोड़ |
| संभावित अतिरिक्त बोझ | ₹70,000 करोड़ |
| संभावित कुल सब्सिडी | ₹2.41 लाख करोड़ |
यह आंकड़ा भारत के वित्तीय घाटे और सरकारी खर्च पर भी असर डाल सकता है।
क्या किसानों को खाद की कमी होगी?
फिलहाल सरकार का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है और खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
मौजूदा उर्वरक स्टॉक
| विवरण | मात्रा |
|---|---|
| कुल जरूरत | 390 लाख टन |
| उपलब्ध स्टॉक | 200.9 लाख टन |
| उपलब्धता प्रतिशत | 51% से अधिक |
इसके अलावा घरेलू उत्पादन करीब 80,000 टन प्रतिदिन, वैकल्पिक समुद्री मार्गों से आयात जारी, 22 लाख टन से अधिक उर्वरक भारत पहुंच चुका सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि गैस आपूर्ति अभी पर्याप्त बनी हुई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे व्यस्त तेल और गैस व्यापार मार्गों में शामिल है। वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
अगर यहां तनाव बढ़ता है तेल महंगा होता है, गैस महंगी होती है, शिपिंग लागत बढ़ती है, खाद और ईंधन दोनों पर असर पड़ता है भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका सीधा दबाव पड़ता है।
सरकार ने क्या तैयारी की है?
भारत ने केवल पश्चिम एशियाई मार्गों पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक सप्लाई चैन तैयार करना शुरू किया है।
सरकार के प्रमुख कदम
वैकल्पिक समुद्री मार्गों से आयात, consortium मॉडल के जरिए bulk खरीद, साप्ताहिक सब्सिडी भुगतान, कच्चे माल की उपलब्धता की निगरानी
अब तक सुरक्षित की गई सप्लाई
| उर्वरक | मात्रा |
|---|---|
| DAP | 13.5 लाख टन |
| NPK कॉम्प्लेक्स | 7 लाख टन |
| अन्य कच्चा माल | लगातार आयात |
अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
अगर सब्सिडी 2.41 लाख करोड़ तक पहुंचती है तो सरकार पर कई तरह का दबाव बढ़ सकता है।
1. Fiscal Deficit बढ़ सकता है
सरकार को अतिरिक्त उधारी लेनी पड़ सकती है।
2. दूसरे खर्च प्रभावित हो सकते हैं
इन्फ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
3. महंगाई का खतरा
अगर सरकार सब्सिडी पूरी तरह absorb नहीं करती तो खाद महंगी हो सकती है, खेती लागत बढ़ सकती है, खाद्यान्न महंगाई बढ़ सकती है
क्या 2022 जैसा संकट फिर आ सकता है?
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत की उर्वरक सब्सिडी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। उस समय गैस कीमतों में भारी उछाल आया था, DAP और यूरिया महंगे हुए थे, सरकार को अतिरिक्त सब्सिडी देनी पड़ी थी
अब विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर पश्चिम एशिया तनाव लंबा चला तो वैसी ही स्थिति दोबारा बन सकती है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?
फिलहाल सरकार किसानों पर बोझ डालने के मूड में नहीं दिख रही। इसलिए MSP नीति जारी रह सकती है, खाद की कीमत नियंत्रित रखने की कोशिश होगी, सब्सिडी मॉडल जारी रह सकता है
लेकिन अगर वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो भविष्य में सब्सिडी पुनर्गठन, nutrient-based pricing, direct benefit transfer मॉडल जैसे विकल्पों पर चर्चा तेज हो सकती है।
क्या भारत की आयात निर्भरता कम हो सकती है?
सरकार लंबे समय से “आत्मनिर्भर उर्वरक” मॉडल पर काम कर रही है। इसके तहत घरेलू यूरिया प्लांट विस्तार, green ammonia projects, alternative nutrient technologies, nano urea जैसे विकल्पों पर निवेश बढ़ाया जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय में यही भारत को वैश्विक संकटों से बचा सकता है।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया युद्ध केवल तेल कीमतों तक सीमित नहीं है। इसका असर अब भारत की खाद सब्सिडी, सरकारी वित्त, कृषि लागत और महंगाई तक पहुंच चुका है। हालांकि सरकार का दावा है कि फिलहाल देश में उर्वरकों की उपलब्धता पर्याप्त है, लेकिन यदि वैश्विक तनाव लंबा खिंचता है तो वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी 2.41 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
यानी आने वाले महीनों में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि खेती और खाद्य महंगाई भी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
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