भारत और ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच व्यापार पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन इस बढ़ते व्यापार के साथ एक ऐसी समस्या भी तेजी से सामने आई है जिसने नीति निर्माताओं और उद्योग जगत दोनों की चिंता बढ़ा दी है। यह समस्या है बढ़ता हुआ ट्रेड डेफिसिट यानी व्यापार घाटा।
रूस से सस्ते कच्चे तेल का आयात, चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी की भारी खरीद, खाड़ी देशों से ऊर्जा आयात और घरेलू विनिर्माण की सीमित क्षमता ने भारत के व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ा दिया है। स्थिति यह है कि साल 2025 में ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 224 अरब डॉलर यानी करीब ₹21.49 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
यह आंकड़ा सिर्फ एक आर्थिक डेटा नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत अभी भी कई रणनीतिक क्षेत्रों में आयात पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर निर्यात और घरेलू उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में यह असंतुलन और गंभीर हो सकता है।
416 अरब डॉलर तक पहुंचा व्यापार
रूबिक्स डेटा साइंसेज की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और बाकी 10 ब्रिक्स देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2025 में 416 अरब डॉलर तक पहुंच गया। साल 2021 से 2025 के बीच इसमें औसतन करीब 10% सालाना वृद्धि दर्ज की गई।
ब्रिक्स समूह में अब केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, बल्कि यूएई, मिस्र, सऊदी अरब और अन्य नए सदस्य भी शामिल हो चुके हैं। इन देशों के साथ भारत का आर्थिक जुड़ाव लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन असली चिंता यह है कि व्यापार बढ़ने की तुलना में आयात कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है जबकि निर्यात की रफ्तार कमजोर रही। यही वजह है कि व्यापार घाटा लगभग दोगुना हो गया।
आयात ने बढ़ाई सबसे ज्यादा चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में ब्रिक्स देशों से भारत का कुल आयात 320 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पिछले पांच वर्षों में इसमें 12% CAGR की वृद्धि हुई।
भारत के कुल आयात में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है।
- 2021 में कुल आयात में हिस्सेदारी: 36%
- 2025 में कुल आयात में हिस्सेदारी: 43%
इसका मतलब यह है कि भारत अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा ब्रिक्स देशों पर निर्भर हो गया है।
रूस बना सबसे तेजी से बढ़ता आयात साझेदार
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से भारत ने भारी मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। इसी वजह से रूस से आयात में 61% CAGR की जबरदस्त वृद्धि दर्ज हुई।
भारत की रिफाइनरियों ने डिस्काउंट पर रूसी तेल खरीदकर घरेलू जरूरतें पूरी कीं और कुछ उत्पादों का निर्यात भी किया। हालांकि इससे रूस के साथ भारत का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से रूस से तेल खरीदना जरूरी था, लेकिन लंबे समय तक एक ही स्रोत पर अधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम भी पैदा कर सकती है।
चीन अब भी सबसे बड़ी चुनौती
भारत के लिए सबसे बड़ा व्यापार असंतुलन चीन के साथ बना हुआ है।
2025 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। यह दिखाता है कि भारत अभी भी इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर उपकरण, मशीनरी, केमिकल्स और औद्योगिक कच्चे माल के लिए चीन पर काफी निर्भर है।
मोबाइल फोन, लैपटॉप, बैटरी, सेमीकंडक्टर उपकरण, फार्मा API और सोलर पैनल जैसे कई सेक्टरों में चीन की पकड़ बेहद मजबूत बनी हुई है।
सरकार की PLI योजना और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के बावजूद घरेलू उत्पादन अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है जहां आयात निर्भरता तेजी से कम हो सके।
UAE और ब्राजील भी बने अहम साझेदार
रूस और चीन के अलावा यूएई और ब्राजील भी भारत के बड़े व्यापारिक साझेदार बनकर उभरे हैं।
यूएई और ब्राजील दोनों के साथ व्यापार में करीब 12% CAGR की वृद्धि दर्ज की गई। यूएई भारत के लिए ऊर्जा, सोना और लॉजिस्टिक्स ट्रेड का बड़ा केंद्र बन चुका है।
भारत और यूएई के बीच CEPA समझौते के बाद व्यापार और तेज हुआ है। हालांकि सोने और पेट्रोलियम उत्पादों के बड़े आयात की वजह से घाटे का दबाव बना हुआ है।
निर्यात क्यों नहीं बढ़ पा रहा?
भारत का निर्यात 2025 में ब्रिक्स देशों को 96 अरब डॉलर तक पहुंचा, लेकिन इसमें केवल 3% CAGR की वृद्धि हुई।
यानी आयात की तुलना में निर्यात बेहद धीमी गति से बढ़ा। यही असली समस्या है।
भारत के कुल निर्यात में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी करीब 22% रही।
इन देशों में सबसे तेज निर्यात वृद्धि यूएई को हुई:
- यूएई: 11%
- रूस: 8%
- मिस्र: 5%
लेकिन यह वृद्धि भी आयात के मुकाबले काफी कम रही।
किन सेक्टरों में भारत पीछे रह गया?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत कुछ प्रमुख सेक्टरों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त नहीं बना पाया है:
1. हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग
चीन इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी निर्माण में भारत से काफी आगे है।
2. सेमीकंडक्टर और चिप्स
भारत अभी भी आयात आधारित बाजार है।
3. ऊर्जा निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।
4. औद्योगिक कच्चा माल
कई उद्योग चीन और अन्य देशों से कच्चे माल पर निर्भर हैं।
5. लॉजिस्टिक लागत
भारत में लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट लागत अभी भी कई प्रतिस्पर्धी देशों से ज्यादा है।
क्या है इस समस्या का समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ आयात रोकने से समस्या हल नहीं होगी। भारत को अपनी उत्पादन क्षमता और निर्यात ताकत दोनों बढ़ानी होंगी।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा
- इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण
- सेमीकंडक्टर
- रक्षा उत्पादन
- सोलर उपकरण
- केमिकल और फार्मा सेक्टर
में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी।
निर्यात को नई दिशा देनी होगी
भारत को सिर्फ कच्चे माल या लो-वैल्यू उत्पादों की बजाय हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी निर्यात बढ़ाना होगा।
नए बाजार खोजने होंगे
भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोप में नए निर्यात अवसर तलाशने होंगे ताकि चीन और ऊर्जा आयात आधारित व्यापार संतुलन पर दबाव कम हो सके।
लॉजिस्टिक्स सुधार जरूरी
बंदरगाह, रेलवे, एक्सप्रेसवे और सप्लाई चेन सुधार के बिना भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाएंगे।
BRICS अब वैश्विक ताकत बन चुका है
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में ब्रिक्स देशों का कुल निर्यात 6.1 ट्रिलियन डॉलर और आयात 4.9 ट्रिलियन डॉलर रहा। इस समूह की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है:
- वैश्विक आबादी: 49.5%
- विश्व GDP: 40%
- वैश्विक व्यापार: 26%
यानी आने वाले समय में BRICS दुनिया की आर्थिक दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा समूह बन सकता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह BRICS जैसे बड़े व्यापारिक समूह का हिस्सा रहते हुए भी व्यापार संतुलन कैसे बनाए।
अगर भारत सिर्फ आयात आधारित बाजार बनकर रह गया तो घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा, रुपया कमजोर हो सकता है और चालू खाते का घाटा भी बढ़ सकता है।
लेकिन अगर भारत मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और तकनीकी उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ता है, तो यही BRICS भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक अवसर भी साबित हो सकता है।
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