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Oil Crisis: पेट्रोल-डीजल तो संभल गया, लेकिन रसोई के इस तेल ने बढ़ाई सरकार की टेंशन, भारत के लिए बना सिरदर्द

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 10:27 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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भारत के सामने नया संकट: अब असली चिंता कुकिंग ऑयल का बढ़ता आयात बिल

नई दिल्ली: पिछले कुछ वर्षों से भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चिंता कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें और उससे जुड़ा आयात बिल रहा है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने भी आम लोगों की जेब पर असर डाला है। लेकिन अब सरकार और नीति निर्माताओं के सामने एक और बड़ा संकट तेजी से उभर रहा है — खाद्य तेल यानी कुकिंग ऑयल का बढ़ता आयात बिल।

Contents
भारत के सामने नया संकट: अब असली चिंता कुकिंग ऑयल का बढ़ता आयात बिलकच्चे तेल पर भारत ने बनाई रणनीति, लेकिन खाद्य तेल में विकल्प सीमितआखिर खाद्य तेल भारत के लिए बड़ी समस्या क्यों बनता जा रहा है?1. सप्लाई कुछ देशों तक सीमितइंडोनेशिया का बायोडीजल प्लान भारत के लिए नई चिंतारुपया कमजोर, इसलिए आयात और महंगाभारतीयों की बढ़ती खपत ने भी बढ़ाई परेशानीसरकार का क्या है प्लान?लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब भी मानसूनआम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?क्या भारत आत्मनिर्भर बन पाएगा?

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कच्चा तेल ही है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 88% क्रूड ऑयल आयात करता है। लेकिन गहराई से देखें तो स्थिति इससे कहीं ज्यादा जटिल है। खाद्य तेल के मामले में भारत ऐसी वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है, जहां विकल्प बेहद सीमित हैं और भू-राजनीतिक घटनाओं का सीधा असर भारतीय रसोई तक पहुंचता है।

यही वजह है कि हाल के महीनों में सरकार के भीतर खाद्य तेल सुरक्षा (Edible Oil Security) को लेकर चिंता बढ़ी है। प्रधानमंत्री द्वारा तेल की खपत कम करने की अपील को भी इसी व्यापक आर्थिक और स्वास्थ्य संकट के संदर्भ में देखा जा रहा है।


कच्चे तेल पर भारत ने बनाई रणनीति, लेकिन खाद्य तेल में विकल्प सीमित

मार्च 2026 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर करीब 121.8 अरब डॉलर खर्च किए। यह रकम बहुत बड़ी जरूर है, लेकिन भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत की है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रियायती रूसी तेल खरीदकर अपने आयात बिल को काफी हद तक नियंत्रित किया। 2019-20 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी केवल 1.7% थी, जो 2024-25 तक बढ़कर 35% से अधिक हो गई। इससे भारत को सस्ता कच्चा तेल मिला और विदेशी मुद्रा पर दबाव कुछ कम हुआ।

इसके अलावा भारत ने विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार किए हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में कुछ हफ्तों तक सप्लाई बनाए रखी जा सके। भारत अब अमेरिका, रूस और सऊदी अरब जैसे बड़े उत्पादकों के बीच संतुलन बनाकर बेहतर सौदे करने की स्थिति में भी पहुंच चुका है।

लेकिन खाद्य तेल में ऐसा करना आसान नहीं है।


आखिर खाद्य तेल भारत के लिए बड़ी समस्या क्यों बनता जा रहा है?

भारत अपनी जरूरत का करीब 60% खाद्य तेल आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने खाद्य तेल आयात पर लगभग 17.59 अरब डॉलर यानी करीब 1.61 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।

यह आंकड़ा कच्चे तेल की तुलना में छोटा जरूर दिखता है, लेकिन असली समस्या यहां निर्भरता की प्रकृति है।

1. सप्लाई कुछ देशों तक सीमित

भारत पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भर है, सोया तेल के लिए अर्जेंटीना और ब्राजील पर, जबकि सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन पर। यानी अगर इनमें से किसी क्षेत्र में युद्ध, सूखा, निर्यात प्रतिबंध, या राजनीतिक संकट आता है, तो उसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत में सूरजमुखी तेल की कीमतों में आई भारी तेजी इसका बड़ा उदाहरण रही।


इंडोनेशिया का बायोडीजल प्लान भारत के लिए नई चिंता

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता अब इंडोनेशिया की नई नीति बनती जा रही है।

इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक देश है। लेकिन अब वह अपने पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा घरेलू बायोडीजल कार्यक्रमों में इस्तेमाल कर रहा है। वहां B40 कार्यक्रम लागू किया जा रहा है और भविष्य में B50 योजना पर भी काम चल रहा है।

इसका मतलब साफ है:

निर्यात के लिए उपलब्ध पाम ऑयल की मात्रा घट सकती है।

यदि वैश्विक बाजार में सप्लाई कम होती है तो भारत जैसे बड़े आयातक देशों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पाम ऑयल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है और इसका सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर दिखाई देगा।


रुपया कमजोर, इसलिए आयात और महंगा

खाद्य तेल संकट का एक बड़ा कारण भारतीय रुपये की कमजोरी भी है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया। डॉलर मजबूत होने का असर सीधे आयात बिल पर पड़ता है क्योंकि खाद्य तेल का भुगतान डॉलर में किया जाता है।

मान लीजिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत स्थिर भी रहे, तब भी कमजोर रुपया, अधिक डॉलर भुगतान, और ऊंचा फ्रेट कॉस्ट भारत के आयात बिल को बढ़ा देता है। इसका असर आखिरकार रिफाइंड तेल, पैकेज्ड फूड, स्नैक्स, होटल इंडस्ट्री, और FMCG कंपनियों की लागत पर पड़ता है।


भारतीयों की बढ़ती खपत ने भी बढ़ाई परेशानी

भारत में पिछले छह दशकों में खाद्य तेल की खपत तेजी से बढ़ी है। डेटा के अनुसार:

  • 1960 के दशक में प्रति व्यक्ति सालाना तेल खपत लगभग 3.2 किलो थी,
  • जो अब बढ़कर करीब 19.7 किलो तक पहुंच गई है।

यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी चिंता भी है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) प्रति व्यक्ति सालाना लगभग 10 किलो खाद्य तेल की खपत की सलाह देता है। यानी वर्तमान खपत स्वास्थ्य मानकों से लगभग दोगुनी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी जीवनशैली, प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड, और डीप फ्राइड उत्पादों की बढ़ती मांग ने खाद्य तेल की खपत को तेजी से बढ़ाया है।


सरकार का क्या है प्लान?

सरकार अब खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर तेजी से काम कर रही है।लक्ष्य रखा गया है कि:

2030-31 तक भारत खाद्य तेल में 72% आत्मनिर्भर बने।

इसके लिए सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, और अन्य तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने की योजना बनाई गई है। करीब 21,000 करोड़ रुपये के निवेश के जरिए उत्पादन को 39 मिलियन टन से बढ़ाकर लगभग 69.7 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार बेहतर बीज, सिंचाई, MSP समर्थन, और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी फोकस बढ़ा रही है।


लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब भी मानसून

भारत के तिलहन उत्पादन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसका बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। करीब 76% तिलहन क्षेत्र वर्षा आधारित कृषि पर टिका है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो उत्पादन घट सकता है, आयात बढ़ सकता है, और कीमतें फिर उछाल मार सकती हैं।

मौसम एजेंसियों के शुरुआती अनुमानों में 2026 का मानसून सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताई गई है। अगर ऐसा होता है तो सरकार के लिए खाद्य तेल आयात बिल नियंत्रित करना और मुश्किल हो सकता है।


आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

यदि वैश्विक बाजार में खाद्य तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका असर सीधे रसोई तक पहुंचेगा। महंगा हो सकता है सरसों तेल, सोया तेल, पाम ऑयल, पैकेज्ड स्नैक्स, बिस्किट, नमकीन, रेस्टोरेंट फूड, और फास्ट फूड। इसके अलावा खाद्य महंगाई बढ़ने से RBI पर दबाव, ब्याज दरों पर असर, और घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ देखने को मिल सकता है।


क्या भारत आत्मनिर्भर बन पाएगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पूरी तरह खाद्य तेल आयात से मुक्त होना आसान नहीं है। इसके पीछे सीमित कृषि भूमि, बढ़ती आबादी, बदलती खानपान आदतें, और कम उत्पादकता जैसे कई कारण हैं। हालांकि यदि बेहतर कृषि तकनीक, हाई-यील्ड बीज, सिंचाई विस्तार, और उपभोक्ता स्तर पर तेल खपत में संतुलन पर काम किया जाए तो आने वाले वर्षों में आयात निर्भरता कम की जा सकती है।

फिलहाल साफ संकेत यही हैं कि भारत के लिए आने वाले समय में असली आर्थिक चुनौती सिर्फ पेट्रोल-डीजल नहीं बल्कि रसोई का तेल भी बनने जा रहा है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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