रुपये में ऐतिहासिक गिरावट और महंगे कच्चे तेल ने बिगाड़ा बाजार का मूड
घरेलू शेयर बाजार में लगातार दो कारोबारी सत्रों की तेजी के बाद शुक्रवार को गिरावट दर्ज की गई। दिन की शुरुआत जरूर सकारात्मक रही थी, लेकिन कारोबार के आखिरी घंटे में बिकवाली तेज हो गई और बाजार लाल निशान में बंद हुआ। इस बीच भारतीय रुपये ने भी नया रिकॉर्ड बना दिया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 96 के स्तर के पार निकल गया, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई।
बीएसई सेंसेक्स 160.73 अंक यानी 0.21 फीसदी गिरकर 75,237.99 अंक पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 46.10 अंक यानी 0.19 फीसदी टूटकर 23,643.50 अंक पर आ गया। विदेशी बाजारों से मिले कमजोर संकेत, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और रुपये में ऐतिहासिक गिरावट ने घरेलू बाजार की धारणा पर दबाव बनाया।
डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
शुक्रवार के कारोबार के दौरान रुपया एक समय 50 पैसे टूटकर 96.14 प्रति डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का ऑल टाइम लो स्तर माना जा रहा है। हालांकि अंत में इसमें कुछ रिकवरी आई और यह 95.96 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, लेकिन फिर भी यह पिछले बंद स्तर के मुकाबले करीब 0.2 फीसदी कमजोर रहा।
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और अमेरिकी डॉलर की मजबूती की वजह से रुपये पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर रुपये और देश के चालू खाते पर पड़ता है।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत फिर उछल गई। कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 2.74 फीसदी की तेजी के साथ 108.6 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर बढ़ती आशंकाओं ने तेल बाजार को अस्थिर बना दिया है।
ऊंचे कच्चे तेल का असर केवल रुपये तक सीमित नहीं रहता। इससे पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, परिवहन लागत बढ़ती है और महंगाई पर दबाव बनता है। यही वजह है कि निवेशक फिलहाल सतर्क नजर आ रहे हैं।
सेंसेक्स में किन शेयरों पर दबाव रहा?
बीएसई सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 16 गिरावट के साथ बंद हुए। सबसे ज्यादा कमजोरी टाटा स्टील में देखने को मिली, जो करीब 1.97 फीसदी टूट गया। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, अल्ट्राटेक सीमेंट, एसबीआई, महिंद्रा एंड महिंद्रा, लार्सन एंड टुब्रो, ट्रेंट, एक्सिस बैंक और एशियन पेंट्स जैसे दिग्गज शेयरों में भी बिकवाली रही।
मेटल और ऑयल एंड गैस सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव देखा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और महंगे कच्चे तेल के कारण इन सेक्टरों में निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
आईटी शेयरों ने संभाला बाजार
जहां एक तरफ बाजार पर दबाव था, वहीं आईटी सेक्टर ने कुछ राहत दी। सेंसेक्स में इन्फोसिस सबसे ज्यादा 2.08 फीसदी चढ़ा। इसके अलावा टेक महिंद्रा, पावरग्रिड, अडानी पोर्ट्स, मारुति सुजुकी, भारती एयरटेल और कोटक महिंद्रा बैंक में भी तेजी रही।
डॉलर मजबूत होने का फायदा आमतौर पर आईटी कंपनियों को मिलता है क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा में आता है। यही वजह रही कि रुपये में कमजोरी के बीच आईटी शेयरों में खरीदारी देखने को मिली।
ब्रॉडर मार्केट भी दबाव में
केवल बड़ी कंपनियों तक ही गिरावट सीमित नहीं रही। व्यापक बाजार यानी मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी दर्ज की गई।
- निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.45 फीसदी गिरावट
- निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.61 फीसदी कमजोरी
सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो:
- निफ्टी मेटल में सबसे ज्यादा गिरावट
- निफ्टी रियल्टी और ऑयल एंड गैस इंडेक्स भी दबाव में
- निफ्टी आईटी और मीडिया इंडेक्स में बढ़त
यह संकेत देता है कि निवेशक फिलहाल जोखिम वाले सेक्टरों से दूरी बना रहे हैं और चुनिंदा डिफेंसिव सेक्टरों में पैसा लगा रहे हैं।
विदेशी निवेशकों का रुख बदला
बाजार में एक राहत की बात यह रही कि विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) गुरुवार को नेट बायर रहे। एक्सचेंज डेटा के मुताबिक उन्होंने करीब 187 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इससे पहले लगातार सात कारोबारी सत्रों तक विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे थे।
हालांकि बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल एक दिन की खरीदारी से ट्रेंड बदलना तय नहीं माना जा सकता। जब तक रुपये में स्थिरता नहीं आती और कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित नहीं होतीं, तब तक विदेशी निवेशकों का रुख सतर्क बना रह सकता है।
एशियाई बाजारों से भी मिले कमजोर संकेत
घरेलू बाजार पर एशियाई बाजारों की कमजोरी का भी असर पड़ा। जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग के प्रमुख इंडेक्स लाल निशान में कारोबार करते दिखे। निवेशकों की चिंता का बड़ा कारण पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक महंगाई को लेकर बढ़ती आशंकाएं हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर भी बाजार सतर्क बना हुआ है। यदि अमेरिका में दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो उभरते बाजारों से पूंजी निकासी बढ़ सकती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या संकेत?
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक तीन बड़े फैक्टर्स तय करेंगे:
- कच्चे तेल की कीमतें
- डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल
- विदेशी निवेशकों का रुख
यदि ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के ऊपर टिकता है और रुपया लगातार कमजोर होता है, तो भारतीय बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है। वहीं अगर वैश्विक तनाव कम होता है और तेल में नरमी आती है तो बाजार में फिर रिकवरी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल निवेशकों को सतर्क रणनीति अपनाने और अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले शेयरों में सीमित एक्सपोजर रखने की सलाह दी जा रही है।
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