नई दिल्ली। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी की थाली में रोज शामिल होने वाला चावल अब वैश्विक चिंता का विषय बनता जा रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की ताजा रिपोर्ट ने संकेत दिए हैं कि साल 2026-27 में वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह पिछले करीब 11 वर्षों में पहली बार होगा जब दुनिया में चावल की पैदावार घटेगी।
इस रिपोर्ट ने एशियाई देशों समेत पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासकर ऐसे समय में जब पहले से ही ऊर्जा संकट, उर्वरकों की महंगाई, जलवायु परिवर्तन और युद्ध जैसी परिस्थितियां कृषि क्षेत्र पर दबाव बना रही हैं। चावल केवल भोजन नहीं है, बल्कि भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, फिलीपींस और अफ्रीका के कई देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का आधार भी है।
538 मिलियन टन पर सिमट सकती है पैदावार
USDA के अनुसार 2026-27 सीजन में वैश्विक चावल उत्पादन करीब 538 मिलियन टन रहने का अनुमान है। पिछले वर्षों की तुलना में यह गिरावट छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है क्योंकि दुनिया में चावल की मांग लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल उत्पादन घटने की नहीं है, बल्कि खपत और व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं। ऐसे में उत्पादन में मामूली गिरावट भी वैश्विक भंडार को तेजी से कम कर सकती है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत, म्यांमार और अमेरिका जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में उत्पादन घटने की आशंका सबसे ज्यादा है। अमेरिका में किसानों ने बढ़ती लागत और कम मुनाफे के कारण धान की बुवाई घटाई है। वहां उत्पादन में करीब 15 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया गया है।
ईरान युद्ध और बढ़ती लागत ने बिगाड़ा समीकरण
वैश्विक कृषि बाजार इस समय केवल मौसम पर निर्भर नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव भी फसलों की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। ईरान क्षेत्र में जारी तनाव और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता ने उर्वरक और डीजल की कीमतों को बढ़ा दिया है।
धान की खेती में सिंचाई, बिजली और उर्वरक की भारी जरूरत होती है। ऐसे में लागत बढ़ने का सीधा असर किसानों के फैसलों पर पड़ रहा है। एशिया के कई देशों में किसान इस बार कम बुवाई करने पर विचार कर रहे हैं क्योंकि उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है जबकि कई क्षेत्रों में सरकारी समर्थन पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो आने वाले महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति और तेज हो सकती है।
भारत पर मंडरा रहा अल नीनो का खतरा
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। इसलिए यहां की फसल में किसी भी तरह की गिरावट का असर सीधे वैश्विक बाजार पर पड़ता है।
मौसम वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी है कि इस साल मानसून पर अल नीनो का असर दिखाई दे सकता है। अल नीनो की स्थिति में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका रहती है, जिससे धान की खेती प्रभावित हो सकती है।
भारत में धान की खेती बड़े पैमाने पर मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। अगर जून से सितंबर के बीच पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक बाजार भारत की मानसून रिपोर्ट पर करीबी नजर रखे हुए हैं।
कीमतों में तेजी शुरू
चावल की संभावित कमी का असर अब बाजार में दिखाई देने लगा है। एशिया में बेंचमार्क माने जाने वाले थाई व्हाइट राइस की थोक कीमतों में मार्च के अंत से अब तक करीब 15 प्रतिशत की तेजी आ चुकी है।
वहीं शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) में चावल के वायदा भाव पिछले सप्ताह करीब 8 प्रतिशत उछले। यह दो वर्षों में सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त मानी जा रही है।
फिलीपींस, इंडोनेशिया और कुछ अफ्रीकी देशों में खाद्य मुद्रास्फीति पहले से बढ़ने लगी है क्योंकि वहां बड़ी मात्रा में चावल आयात किया जाता है। अगर उत्पादन संकट गहराया तो आने वाले महीनों में कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं।
भारत के सामने क्या बड़ी चुनौती होगी?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती घरेलू जरूरत और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखना होगी। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई बार घरेलू महंगाई नियंत्रित करने के लिए चावल निर्यात पर प्रतिबंध या शुल्क लगाए थे।
अगर इस बार उत्पादन कमजोर रहा और वैश्विक मांग बढ़ी, तो सरकार को फिर से निर्यात नीति पर कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं। इससे एक तरफ घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन दूसरी ओर वैश्विक बाजार में आपूर्ति संकट और गहरा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास फिलहाल पर्याप्त सरकारी भंडार मौजूद है, लेकिन लगातार कमजोर मानसून और बढ़ती मांग स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना सकती है।
गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर
संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियां पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि खाद्य संकट का सबसे बड़ा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ सकता है।
अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में करोड़ों लोग सस्ते आयातित चावल पर निर्भर हैं। अगर वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो वहां खाद्य असुरक्षा और गरीबी बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया अभी गेहूं, तेल और ऊर्जा महंगाई से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई है और अब चावल संकट नई चुनौती बनकर सामने आ सकता है।
क्या सचमुच थाली से दूर होगा भात?
फिलहाल स्थिति इतनी गंभीर नहीं है कि चावल बाजार से गायब हो जाए, लेकिन कीमतों में तेजी और आपूर्ति पर दबाव की आशंका जरूर बढ़ गई है।
अगर मानसून सामान्य रहा और प्रमुख उत्पादक देशों में हालात सुधरे तो संकट को काफी हद तक टाला जा सकता है। लेकिन अगर मौसम और भू-राजनीतिक परिस्थितियां खराब रहीं तो आने वाले महीनों में चावल आम लोगों की थाली पर महंगा असर जरूर डाल सकता है।
दुनिया के लिए यह केवल कृषि संकट नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, महंगाई और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा आर्थिक मुद्दा बनता जा रहा है।
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