पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडरा रहे खतरे ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के सबसे अहम तेल और गैस व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने के बाद भारत अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने के लिए एक बड़े रणनीतिक प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है। सरकार ओमान से गुजरात तक समुद्र के नीचे लगभग 2000 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना पर फिर से गंभीरता से विचार कर रही है।
इस मेगा प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब ₹40,000 करोड़ बताई जा रही है। यदि इसे अंतिम मंजूरी मिलती है तो यह पाइपलाइन अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए खाड़ी देशों की गैस को सीधे भारत तक पहुंचाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा को पूरी तरह बदल सकता है और भविष्य में तेल-गैस संकट के असर को काफी हद तक कम कर सकता है।
क्यों अहम है यह पाइपलाइन प्रोजेक्ट?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। भारत करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है जबकि एलपीजी और प्राकृतिक गैस की जरूरतों के लिए भी खाड़ी देशों पर भारी निर्भरता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत के तेल और गैस आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां हाल के महीनों में युद्ध और सैन्य तनाव के कारण लगातार खतरा बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20-25 फीसदी हिस्सा होर्मुज से गुजरता है। भारत के लिए यह मार्ग रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यदि यह रूट लंबे समय तक प्रभावित होता है तो भारत में ईंधन संकट गहरा सकता है।
इसी खतरे को देखते हुए भारत अब वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति नेटवर्क तैयार करना चाहता है।
ओमान से गुजरात तक कैसे पहुंचेगी गैस?
प्रस्तावित योजना के अनुसार, यह पाइपलाइन ओमान के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए गुजरात के समुद्री तट तक पहुंचेगी। इस पाइपलाइन नेटवर्क की लंबाई लगभग 2000 किलोमीटर होगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पाइपलाइन 3000 से 3450 मीटर तक की समुद्री गहराई से गुजर सकती है। यह दुनिया की सबसे गहरी अंडरसी गैस पाइपलाइनों में से एक हो सकती है। पाइपलाइन राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों से दूर रखी जाएगी।
इस प्रोजेक्ट का मकसद सिर्फ ओमान से गैस लाना नहीं है, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र के गैस भंडार तक भारत की सीधी पहुंच बनाना है।
किन देशों की गैस तक पहुंच बनेगी?
यदि यह परियोजना सफल होती है तो भारत को कई बड़े गैस उत्पादक देशों तक सीधी पहुंच मिल सकती है ओमान, UAE, कतर, सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे क्षेत्र में लगभग 2500 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस भंडार मौजूद हैं। ऐसे में भारत भविष्य में LNG आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है।
LNG की तुलना में पाइपलाइन क्यों बेहतर?
फिलहाल भारत बड़ी मात्रा में LNG यानी Liquefied Natural Gas आयात करता है। LNG को जहाजों के जरिए लाया जाता है, जिसके लिए महंगे टर्मिनल चाहिए, री-गैसिफिकेशन लागत लगती है, शिपिंग लागत ज्यादा होती है, युद्ध या समुद्री संकट का जोखिम रहता है जबकि पाइपलाइन गैस:
- अपेक्षाकृत सस्ती पड़ सकती है
- लंबे समय तक स्थिर सप्लाई देती है
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करती है
- समुद्री व्यापार बाधा का असर कम करती है
सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यह पाइपलाइन भारत को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर लंबे समय तक गैस उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।
होर्मुज संकट ने क्यों बढ़ाई चिंता?
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव बढ़ने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य पर सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है।
तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने का असर अब भारत में भी दिखने लगा है CNG कीमतों में बढ़ोतरी, दूध और खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ना, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ना, उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ना महानगर गैस ने हाल ही में महाराष्ट्र में CNG की कीमतों में प्रति किलो ₹2 की बढ़ोतरी की है। वहीं कई कंपनियों ने डीजल और गैस महंगी होने का हवाला देते हुए अपने उत्पादों के दाम बढ़ाए हैं।
भारत में गैस की मांग तेजी से बढ़ रही
भारत आने वाले वर्षों में प्राकृतिक गैस की खपत तेजी से बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। सरकार का लक्ष्य ऊर्जा मिश्रण में गैस की हिस्सेदारी बढ़ाना है।
रिपोर्ट्स के अनुसार मौजूदा गैस खपत: 190-195 mmscmd, 2030 तक अनुमानित मांग: 290-300 mmscmd
LNG आयात भी इस दशक के अंत तक 180-200 mmscmd तक पहुंच सकता है।
यानी भारत को भविष्य के लिए बड़े और स्थिर गैस सप्लाई नेटवर्क की जरूरत होगी। यही वजह है कि सरकार अब पुराने अंडरसी पाइपलाइन प्रस्ताव को फिर से सक्रिय कर रही है।
कौन-कौन सी कंपनियां कर रही हैं काम?
रिपोर्ट्स के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय इस परियोजना के लिए विस्तृत फिजिबिलिटी असेसमेंट तैयार करवाने की योजना बना रहा है। इसके लिए कई सरकारी कंपनियों को शामिल किया जा सकता है: GAIL, Engineers India Limited, Indian Oil Corporation इसके अलावा SAGE नाम की कंपनी पहले ही इस रूट पर परीक्षण कार्य कर चुकी है।
बताया जा रहा है कि:
- करीब 3000 मीटर गहराई पर टेस्ट पाइपलाइन बिछाई जा चुकी है
- इस परीक्षण पर लगभग ₹25 करोड़ खर्च हुए
- समुद्र तल की तकनीकी स्थिति का अध्ययन किया गया
सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
हालांकि प्रोजेक्ट रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं।
1. गहरी समुद्री तकनीक
3450 मीटर गहराई पर पाइपलाइन बिछाना तकनीकी रूप से बेहद जटिल काम है।
2. भारी लागत
₹40,000 करोड़ का निवेश आसान नहीं होगा। सरकार और कंपनियों को लंबी अवधि की आर्थिक योजना बनानी होगी।
3. भू-राजनीतिक जोखिम
मिडिल ईस्ट की राजनीति हमेशा अस्थिर रही है। ऐसे में लंबी अवधि के गैस समझौते अहम होंगे।
4. पर्यावरणीय मंजूरी
समुद्र के नीचे इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर्यावरणीय मंजूरी और सुरक्षा मानकों से भी जुड़ा होगा।
कितने समय में पूरा हो सकता है प्रोजेक्ट?
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक यदि इस परियोजना को मंजूरी मिलती है तो इसे पूरा होने में 5 से 7 साल का समय लग सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक गैस पाइपलाइन नहीं बल्कि भारत की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का आधार बन सकता है। यदि यह प्रोजेक्ट सफल रहता है तो भारत भविष्य में तेल और गैस संकट के दौरान कम प्रभावित होगा।
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