दुनिया की नई जंग अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रह गई है। आने वाले वर्षों में जिस चीज पर सबसे ज्यादा रणनीतिक लड़ाई होने वाली है, वह है लिथियम, रेयर अर्थ मेटल्स और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), सोलर एनर्जी, सेमीकंडक्टर, डिफेंस टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक—हर सेक्टर की नींव अब इन्हीं खनिजों पर टिकी है। इसी बीच भारत और रूस एक ऐसी बड़ी डील की तैयारी में हैं, जो एशिया के जियोपॉलिटिकल समीकरणों को बदल सकती है।
नई दिल्ली। भारत और रूस जल्द ही क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर बड़ा समझौता कर सकते हैं। यह प्रस्तावित डील लिथियम, रेयर अर्थ मेटल्स, प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन सहयोग पर केंद्रित होगी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के बीच इस समझौते पर अगले दो महीनों के भीतर हस्ताक्षर हो सकते हैं। भारत ने इस संबंध में प्रस्तावित मसौदा रूस के साथ साझा भी कर दिया है।
इस डील का सबसे बड़ा मकसद चीन पर निर्भरता कम करना और भारत की क्लीन एनर्जी तथा हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग योजनाओं के लिए दीर्घकालिक सप्लाई सुनिश्चित करना है।
क्यों अचानक इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
कुछ साल पहले तक आम लोगों के लिए लिथियम और रेयर अर्थ मेटल्स केवल तकनीकी शब्द थे। लेकिन अब यही खनिज दुनिया की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक ताकत तय कर रहे हैं।
लिथियम इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरियों का सबसे अहम हिस्सा है। इसके बिना EV इंडस्ट्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वहीं रेयर अर्थ मेटल्स का इस्तेमाल विंड टर्बाइन, फाइटर जेट्स, मिसाइल सिस्टम, मोबाइल फोन, चिप्स, डेटा सेंटर और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स में होता है।
दुनिया जैसे-जैसे पेट्रोल-डीजल आधारित अर्थव्यवस्था से ग्रीन एनर्जी मॉडल की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इन खनिजों की मांग विस्फोटक गति से बढ़ रही है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि आने वाले दशक में लिथियम की वैश्विक मांग कई गुना बढ़ सकती है। ऐसे में जिन देशों के पास इन खनिजों की सप्लाई और प्रोसेसिंग क्षमता होगी, वही भविष्य की औद्योगिक ताकत बनेंगे।
चीन क्यों है सबसे बड़ा खिलाड़ी?
फिलहाल क्रिटिकल मिनरल्स की दुनिया में चीन का दबदबा लगभग एकाधिकार जैसा है। चीन सिर्फ खनन में ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी में भी दुनिया से काफी आगे है।
वैश्विक रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा चीन के पास है। कई देशों के पास खनिज तो हैं, लेकिन उन्हें प्रोसेस कर उपयोगी मटेरियल में बदलने की टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत जैसे देश अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत के लिए यह चिंता और बड़ी इसलिए है क्योंकि देश तेजी से EV और क्लीन एनर्जी सेक्टर में निवेश बढ़ा रहा है। अगर कच्चे माल की सप्लाई चीन के नियंत्रण में रहती है, तो भविष्य में भारत की इंडस्ट्रियल ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।
रूस के पास कितना बड़ा खनिज भंडार है?
रूस प्राकृतिक संसाधनों के मामले में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता है। रूस के प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय के अनुसार देश में लगभग 2.85 करोड़ मीट्रिक टन रेयर अर्थ मेटल्स और 6.50 करोड़ मीट्रिक टन से ज्यादा रेयर मेटल्स मौजूद हैं।
हालांकि रूस की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी प्रोसेसिंग क्षमता है। देश के पास पर्याप्त आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर उत्पादन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। यही वजह है कि रूस अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस सालाना लगभग 3000 टन रेयर अर्थ की खपत करता है, लेकिन उसका घरेलू उत्पादन सिर्फ 50 टन के आसपास है। यानी 98% जरूरत आयात से पूरी होती है।
लिथियम के मामले में भी रूस पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। रूस अभी तक अपनी लगभग पूरी लिथियम जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। ऐसे में भारत और रूस की साझेदारी दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद मानी जा रही है।
भारत को इस डील से क्या फायदा होगा?
भारत का सबसे बड़ा लक्ष्य सप्लाई सिक्योरिटी है। आने वाले वर्षों में देश इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, बैटरी स्टोरेज, सोलर एनर्जी और सेमीकंडक्टर सेक्टर में भारी निवेश करने जा रहा है। इन सभी सेक्टरों के लिए क्रिटिकल मिनरल्स जरूरी हैं।
अगर भारत रूस के साथ दीर्घकालिक समझौता कर लेता है, तो उसे कई बड़े फायदे मिल सकते हैं:
- लिथियम और रेयर अर्थ की स्थिर सप्लाई
- चीन पर निर्भरता में कमी
- प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी तक पहुंच
- घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूती
- EV बैटरी लागत में दीर्घकालिक स्थिरता
- रणनीतिक खनिज भंडारण क्षमता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब सिर्फ खनिज खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता। सरकार चाहती है कि भारत पूरी वैल्यू चेन—खनन से लेकर प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक—में अपनी उपस्थिति मजबूत करे।
माली प्रोजेक्ट पर फिर से नजर
सूत्रों के अनुसार भारत पश्चिम अफ्रीकी देश माली में रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) के लिथियम एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट में दोबारा शामिल होने पर विचार कर सकता है।
पहले भारत ने सुरक्षा कारणों से इस परियोजना से दूरी बना ली थी। लेकिन अगर वहां राजनीतिक हालात स्थिर होते हैं, तो भारत दोबारा इस प्रोजेक्ट में निवेश कर सकता है।
यह संकेत देता है कि भारत अब अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और रूस जैसे क्षेत्रों में आक्रामक तरीके से खनिज संपत्तियों तक पहुंच बनाने की रणनीति अपना रहा है।
सिर्फ रूस ही नहीं, दुनिया भर में सक्रिय है भारत
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। सरकार पहले ही अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ कई समझौते कर चुकी है।
इसके अलावा:
- पेरू और चिली के साथ बातचीत जारी है
- भारत ने रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग के लिए 2500 करोड़ रुपये का इंसेंटिव प्रोग्राम तैयार किया है
- कई सरकारी कंपनियों को विदेशी खनिज संपत्तियों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है
दरअसल भारत समझ चुका है कि आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा का मतलब सिर्फ तेल भंडार नहीं, बल्कि लिथियम और रेयर अर्थ तक पहुंच भी होगा।
क्यों बेहद अहम है यह डील?
यह समझौता सिर्फ खनिजों की सप्लाई तक सीमित नहीं है। यह भारत की भविष्य की औद्योगिक और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
अगर भारत समय रहते अपनी सप्लाई चेन मजबूत नहीं करता, तो भविष्य में:
- EV सेक्टर महंगा हो सकता है
- बैटरी उत्पादन प्रभावित हो सकता है
- सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग बाधित हो सकती है
- चीन पर निर्भरता और बढ़ सकती है
यही वजह है कि भारत सरकार ने 2023 में 20 से ज्यादा खनिजों को “क्रिटिकल मिनरल्स” घोषित किया था।
वैश्विक राजनीति में क्या बदल सकता है?
भारत-रूस डील का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक सप्लाई चेन राजनीति में भी बदलाव आ सकता है। अमेरिका और यूरोप पहले ही चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क बनाने में जुटे हैं।
भारत अगर रूस, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और अफ्रीकी देशों के साथ मजबूत खनिज गठबंधन बना लेता है, तो वह आने वाले दशक में क्लीन एनर्जी और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बन सकता है।
आगे क्या?
अब बाजार और उद्योग जगत की नजर इस बात पर रहेगी कि भारत और रूस के बीच यह समझौता किन शर्तों पर होता है। अगर इसमें प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी और संयुक्त निवेश जैसे प्रावधान शामिल होते हैं, तो यह भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।
क्योंकि आने वाले समय में दुनिया की असली ताकत सिर्फ तेल के कुओं से नहीं, बल्कि लिथियम और रेयर अर्थ के भंडार से तय होने वाली है।
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