पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब सिर्फ क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। कच्चे तेल की सप्लाई पर बढ़ते दबाव, होर्मुज स्ट्रेट में संकट और OPEC देशों के गिरते उत्पादन ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हड़कंप मचा दिया है। इसी बीच दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी Saudi Aramco ने चेतावनी दी है कि वैश्विक क्रूड ऑयल स्टॉक तेजी से “लो लेवल” की तरफ बढ़ रहा है।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार देशवासियों से तेल बचाने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने और अनावश्यक ईंधन खपत कम करने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो आने वाले महीनों में दुनिया को गंभीर ऊर्जा संकट और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है।
OPEC का उत्पादन 26 साल के सबसे निचले स्तर पर
Reuters के सर्वे के मुताबिक अप्रैल 2026 में OPEC देशों का औसत तेल उत्पादन घटकर 20.04 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। यह साल 2000 के बाद सबसे कम स्तर माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में उत्पादन करीब 8,30,000 बैरल प्रतिदिन घटा और कई बड़े उत्पादक देशों का निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट केवल उत्पादन में कमी नहीं बल्कि वैश्विक सप्लाई संकट का संकेत है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना दुनिया की सबसे बड़ी चिंता?
होर्मुज स्ट्रेट इस समय वैश्विक ऊर्जा बाजार का सबसे संवेदनशील इलाका बन चुका है। दुनिया के कुल कच्चे तेल का करीब 20% हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। लेकिन ईरान युद्ध के बाद जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, सप्लाई चेन बाधित हुई और कई देशों का निर्यात रुक गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक 1 अरब बैरल से ज्यादा तेल सप्लाई प्रभावित हो चुकी है। कुवैत जैसी अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर हैं। यही वजह है कि अप्रैल में कुवैत का तेल निर्यात लगभग शून्य पर पहुंच गया।
Saudi Aramco ने क्यों दिया बड़ा अलर्ट?
दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी Saudi Aramco ने चेतावनी दी है कि वैश्विक क्रूड स्टॉक तेजी से खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सप्लाई बाधित रही और उत्पादन इसी तरह कम होता रहा तो दुनिया को ऊर्जा संकट, ईंधन महंगाई और सप्लाई शॉक का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि कई देशों ने ऊर्जा बचत अभियान, Work From Home और फ्यूल खपत कम करने जैसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
PM मोदी तेल बचाने की अपील क्यों कर रहे हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में पश्चिम एशिया संकट को कोरोना महामारी के बाद “दशक का सबसे बड़ा संकट” बताया। उन्होंने देशवासियों से तेल बचाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, कारपूलिंग करने, अनावश्यक विदेशी यात्राएं टालने और ऊर्जा खपत कम करने की अपील की। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार, रुपये की कीमत, महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
किन देशों का उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ?
अप्रैल में Saudi Arabia, Iraq और Kuwait जैसे बड़े उत्पादकों का उत्पादन और निर्यात प्रभावित हुआ। Saudi Arabia का उत्पादन गिरकर 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक Saudi oil infrastructure पर हमलों और सप्लाई बाधाओं की वजह से उत्पादन प्रभावित हुआ। हालांकि Saudi Arabia अभी East-West Pipeline के जरिए लाल सागर से तेल निर्यात कर रहा है।
UAE कैसे बचा रहा सप्लाई?
इस संकट के बीच UAE की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दी। UAE Strait of Hormuz को bypass करके Fujairah Port के जरिए तेल निर्यात कर रहा है। इसी वजह से UAE का उत्पादन 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक बना हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक UAE अगले साल तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन क्षमता तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है।
Venezuela और Libya कितना संभाल पाए संकट?
अप्रैल में Venezuela और Libya ने उत्पादन बढ़ाया जरूर, लेकिन इससे होर्मुज स्ट्रेट से प्रभावित सप्लाई की भरपाई नहीं हो सकी। Venezuela का निर्यात 1.23 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो 2018 के बाद सबसे ज्यादा है। वहीं Libya का उत्पादन 1.43 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुंचा, जो 10 साल का उच्चतम स्तर माना जा रहा है।
कच्चे तेल की कीमतें कितनी बढ़ीं?
हाल के दिनों में Brent Crude 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। फिलहाल भी Brent Crude 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी गई हैं, लेकिन तेल कंपनियों पर भारी दबाव बढ़ रहा है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, LPG कीमतें बढ़ सकती हैं, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ सकता है और महंगाई में तेजी आ सकती है। यही वजह है कि सरकार अभी से ईंधन बचत, ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत नियंत्रण पर जोर दे रही है।
क्या दुनिया नए ऊर्जा संकट की तरफ बढ़ रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात 1970s Oil Shock और 2022 Energy Crisis जैसी परिस्थितियों की याद दिला रहे हैं। अगर होर्मुज स्ट्रेट संकट और पश्चिम एशिया युद्ध लंबा खिंचता है तो दुनिया को आने वाले महीनों में गंभीर ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
Oil Market Snapshot
| फैक्टर | मौजूदा स्थिति |
|---|---|
| OPEC उत्पादन | 26 साल के न्यूनतम स्तर पर |
| Brent Crude | करीब $105 प्रति बैरल |
| प्रभावित सप्लाई | 1 अरब बैरल से ज्यादा |
| भारत का तेल आयात | 80% से अधिक |
| होर्मुज स्ट्रेट | ग्लोबल सप्लाई का 20% |
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