भारत में औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक जमीन की उपलब्धता और उससे जुड़ी जटिल प्रक्रियाएं रही हैं। कई बड़े निवेश प्रोजेक्ट सिर्फ इसलिए अटक जाते हैं क्योंकि जमीन अधिग्रहण, उपयोग परिवर्तन और मंजूरी की प्रक्रिया बेहद लंबी और अलग-अलग राज्यों में अलग नियमों के कारण जटिल हो जाती है।
इसी समस्या को दूर करने के लिए अब कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) ने एक बड़ा और दूरगामी प्रस्ताव रखा है, जो आने वाले समय में भारत की औद्योगिक जमीन नीति को पूरी तरह बदल सकता है। CII ने सुझाव दिया है कि देश में एक ऐसी केंद्रीय संस्था बनाई जाए जो GST की तरह पूरे देश में एक समान औद्योगिक जमीन प्रणाली लागू करे। इस संस्था को National Industrial Land Council (NILC) नाम दिया गया है।
CII का मानना है कि अगर भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है तो जमीन से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और तेज बनाना जरूरी है। वर्तमान व्यवस्था में निवेशकों को अलग-अलग राज्यों में अलग नियमों का सामना करना पड़ता है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।
जमीन प्रणाली में सबसे बड़ी समस्या क्या है
भारत में औद्योगिक जमीन से जुड़ी प्रक्रिया कई चरणों में होती है, और हर चरण में देरी की संभावना रहती है। जमीन की खोज से लेकर उसके उपयोग की अनुमति तक की प्रक्रिया अक्सर कई महीनों से लेकर वर्षों तक खिंच जाती है।
CII के अनुसार सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश में जमीन से जुड़ा डेटा एकीकृत नहीं है। कई राज्यों में भूमि बैंक मौजूद हैं, लेकिन वे अपडेट नहीं होते या उनमें पूरी जानकारी नहीं होती। निवेशक को यह समझने में समय लगता है कि कौन सी जमीन वास्तव में उपयोग के लिए उपलब्ध है और उस पर कौन से नियम लागू हैं।
इसके अलावा जमीन उपयोग बदलने यानी Change of Land Use की प्रक्रिया भी बहुत धीमी है, जो कई मामलों में 6 से 18 महीने तक चल जाती है। इसी तरह जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी 18 से 36 महीने तक खिंच जाती है, जिससे परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है और निवेशक अन्य देशों की ओर रुख कर लेते हैं।
NILC क्या है और यह कैसे काम करेगा
CII के प्रस्ताव के अनुसार National Industrial Land Council एक केंद्रीय स्तर की संस्था होगी, जो पूरे देश में औद्योगिक जमीन से जुड़े नियमों को नियंत्रित और मानकीकृत करेगी। यह संस्था DPIIT जैसे मंत्रालय के अंतर्गत काम करेगी।
इस मॉडल में राज्यों की भूमिका खत्म नहीं होगी, बल्कि उन्हें State Land Authority (SLA) के रूप में कार्य करना होगा। हालांकि सभी राज्यों को NILC द्वारा तय किए गए मानकों और डिजिटल सिस्टम का पालन करना अनिवार्य होगा।
इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पूरे देश में जमीन से जुड़ी प्रक्रिया एक जैसी हो, पारदर्शी हो और तय समय सीमा के भीतर पूरी हो।
डिजिटल सिस्टम और GIS आधारित भूमि बैंक का प्रस्ताव
CII के प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर है। इसके तहत एक राष्ट्रीय GIS आधारित Land Bank बनाने की बात कही गई है, जिसमें देश की सभी औद्योगिक जमीनों का डिजिटल रिकॉर्ड होगा।
इस सिस्टम में जमीन की लोकेशन, उपयोग, उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी स्थिति की जानकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। इससे निवेशकों को अलग-अलग विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
इसके साथ ही एक single-window digital system बनाने का सुझाव दिया गया है, जहां आवेदन से लेकर मंजूरी तक की पूरी प्रक्रिया एक ही जगह पूरी हो सकेगी। इससे समय की बचत होगी और प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी।
जमीन आवंटन और अधिग्रहण में बड़े बदलाव की जरूरत
CII का मानना है कि जमीन आवंटन की प्रक्रिया को पूरी तरह समयबद्ध करना जरूरी है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जमीन आवंटन के बाद 15 दिनों के भीतर उसका वास्तविक कब्जा निवेशक को मिल जाना चाहिए।
इसके अलावा सभी नियम जैसे FAR, कीमत और उपयोग की शर्तें पहले से स्पष्ट होनी चाहिए ताकि बाद में किसी प्रकार की अनिश्चितता न रहे।
जमीन अधिग्रहण के लिए भी एक fast-track system का सुझाव दिया गया है, जिसमें social impact assessment की प्रक्रिया को अधिकतम 6 महीने में पूरा किया जाए। साथ ही land pooling मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही गई है ताकि विवाद कम हों।
आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो भारत में औद्योगिक निवेश के लिए माहौल काफी बदल सकता है। अभी सबसे बड़ी समस्या अनिश्चितता और देरी की है, जिसे यह मॉडल काफी हद तक खत्म कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकृत भूमि नीति से:
निवेश तेजी से बढ़ सकता है, क्योंकि निवेशकों को स्पष्ट और पारदर्शी सिस्टम मिलेगा
परियोजनाओं के शुरू होने का समय कम होगा
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत घटेगी
और भारत की ग्लोबल प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी
इसके अलावा राज्यों के बीच नीति असमानता भी कम हो सकती है, जिससे पूरे देश में औद्योगिक विकास समान रूप से आगे बढ़ सकता है।
चुनौतियां भी कम नहीं हैं
हालांकि यह प्रस्ताव बहुत महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा। जमीन राज्य सूची का विषय है, इसलिए हर राज्य की अपनी नीति और प्राथमिकताएं होती हैं।
केंद्र और राज्यों के बीच सहमति बनाना इस मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह लागू करने के लिए मजबूत तकनीकी और प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: क्या यह भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है
CII का यह प्रस्ताव सिर्फ एक प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि भारत की औद्योगिक नीति को पूरी तरह बदलने का प्रयास है। अगर National Industrial Land Council को सही तरीके से लागू किया जाता है तो यह भारत में निवेश की गति को कई गुना बढ़ा सकता है।
यह मॉडल भारत को उन देशों की श्रेणी में ला सकता है जहां जमीन और निवेश प्रक्रिया तेज, पारदर्शी और निवेशक-हितैषी होती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस प्रस्ताव को किस स्तर पर अपनाती है।
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