नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमला मंदिर से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। इस मामले की सुनवाई कर रही नौ जजों की संविधान पीठ ने आस्था, धर्म और संविधान के बीच संतुलन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जिनका कानूनी और सामाजिक दोनों स्तर पर गहरा असर माना जा रहा है।
सुनवाई के पांचवें दिन अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भी धार्मिक आस्था से जुड़े मामलों पर निर्णय लिया जाए, तो न्यायाधीशों को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर केवल संविधान और “अंतरात्मा की स्वतंत्रता” के आधार पर फैसला करना चाहिए।
सबरीमला केस क्यों है इतना अहम?
सबरीमला मामला लंबे समय से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की सबसे बड़ी कानूनी बहसों में से एक रहा है।
मामला मुख्य रूप से केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा है, जिस पर 2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद से लगातार पुनर्विचार याचिकाएं दायर की जा रही हैं।
यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि:
- क्या धार्मिक परंपराएं संवैधानिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं?
- क्या अदालतें धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा कर सकती हैं?
- और क्या “essential religious practice” की परिभाषा न्यायपालिका तय कर सकती है?
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की अहम टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान नौ जजों की संविधान पीठ ने कई महत्वपूर्ण सवालों और टिप्पणियों के जरिए इस बहस को नई दिशा दी।
🏛️ जजों की भूमिका पर स्पष्ट संदेश
अदालत ने कहा कि:
“न्यायाधीशों को किसी भी मामले में निर्णय लेते समय अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को अलग रखना चाहिए और केवल संविधानिक ढांचे के अनुसार निर्णय देना चाहिए।”
इस टिप्पणी का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि न्यायपालिका की भूमिका धार्मिक भावनाओं से प्रभावित नहीं हो सकती।
“धर्म और अंतरात्मा एक ही चीज नहीं हैं”
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या “धर्म” और “अंतरात्मा की स्वतंत्रता” को एक ही स्तर पर रखा जा सकता है।
इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सवाल किया कि क्या अंतरात्मा की स्वतंत्रता को धर्म के दायरे में सीमित किया जाना चाहिए या यह उससे व्यापक अवधारणा है।
यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि संविधान केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी समान महत्व देता है।
“संवैधानिक संतुलन सबसे ऊपर होना चाहिए”
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने सुनवाई के दौरान कहा कि संवैधानिक अदालतों को धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर व्यापक संवैधानिक संतुलन पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी न्यायाधीश के लिए संभव है कि वह धार्मिक भावनाओं और संवैधानिक जिम्मेदारियों को एक ही तराजू पर रखकर निर्णय दे सके।
उनकी टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि:
- न्यायपालिका का आधार धर्म नहीं, संविधान है
- फैसले व्यक्तिगत आस्था से नहीं, कानूनी सिद्धांतों से होने चाहिए
अनुच्छेद 25 और 26 पर बहस
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 हैं, जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थानों के अधिकारों से संबंधित हैं।
अदालत इन बिंदुओं की समीक्षा कर रही है:
- धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है?
- क्या राज्य धार्मिक प्रथाओं को नियंत्रित कर सकता है?
- और “essential religious practice” की व्याख्या कौन करेगा?
वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और अन्य पक्षों ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 केवल धर्म के पालन की स्वतंत्रता नहीं देता, बल्कि यह धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने की भी अनुमति देता है।
“न्यायालय का काम समाज को विभाजित करना नहीं, संतुलित करना है”
सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि किसी विशेष व्याख्या से समाज में विभाजन पैदा हो सकता है या नहीं।
इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि भारत जैसे विविध देश में न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह संतुलन बनाए रखे, न कि विभाजन को बढ़ावा दे।
धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा पर बड़ा सवाल
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि धार्मिक परंपराओं की न्यायिक समीक्षा संभव है, लेकिन यह संवैधानिक ढांचे के भीतर होनी चाहिए।
यह बहस इस सवाल को भी जन्म देती है कि:
- क्या अदालतें तय कर सकती हैं कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “आवश्यक” है और कौन-सी नहीं?
- या यह केवल धार्मिक समुदायों का अधिकार है?
विशेषज्ञों की नजर में यह टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला सिर्फ सबरीमला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्म और कानून के संबंध को परिभाषित करने वाला एक ऐतिहासिक निर्णय बन सकता है।
इस टिप्पणी के संभावित प्रभाव:
- भविष्य में धार्मिक मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और स्पष्ट होगा
- संवैधानिक नैतिकता को प्राथमिकता मिलेगी
- धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या पर नई बहस शुरू होगी
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ द्वारा की गई यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था में धर्म और संविधान के संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है।
यह स्पष्ट करता है कि अदालतें आस्था का सम्मान करती हैं, लेकिन उनके निर्णय केवल संविधान और कानूनी सिद्धांतों पर आधारित होंगे।
सबरीमला मामला फिलहाल भले ही विचाराधीन हो, लेकिन इसकी बहस आने वाले वर्षों तक भारत के संवैधानिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करती रहेगी।
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