केरल के चर्चित Sabarimala Temple से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। Hindu Shree Foundation ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर मंदिरों की स्वायत्तता और धार्मिक परंपराओं की रक्षा की मांग की है।
यह मामला अब Supreme Court of India की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद सबरीमाला मंदिर की उस पारंपरिक प्रथा से जुड़ा है, जिसमें 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। इस प्रथा को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) के बाद यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना।
Hindu Shree Foundation की मांग
फाउंडेशन ने अपनी याचिका में कहा है कि:
- “Essential Religious Practice” (आवश्यक धार्मिक प्रथा) का निर्धारण अदालत नहीं, बल्कि संबंधित धर्म और उसके अनुयायी करें
- अदालतों को धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप से बचना चाहिए
- संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने मामलों का संचालन करने का अधिकार देते हैं
फाउंडेशन का कहना है कि
“किसी भी धार्मिक प्रथा को बाहर के लोग भले ही तर्कहीन समझें, लेकिन अगर वह समुदाय के लिए आवश्यक है, तो उसे मान्यता मिलनी चाहिए।”
PIL पर भी उठाए सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि:
- जो व्यक्ति किसी धर्म या संप्रदाय से संबंधित नहीं है, उसे उसकी परंपराओं को चुनौती देने का अधिकार नहीं होना चाहिए
- PIL का दुरुपयोग “बाहरी लोगों” द्वारा नहीं किया जाना चाहिए
फाउंडेशन ने चेतावनी दी कि अगर यह सीमा तय नहीं की गई, तो कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक प्रथा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है।
न्यायपालिका बनाम धार्मिक स्वतंत्रता
फाउंडेशन ने यह भी तर्क दिया कि “Essential Religious Practices” टेस्ट संविधान में स्पष्ट रूप से नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका द्वारा विकसित किया गया सिद्धांत है।
इससे धार्मिक आस्था को “तार्किक” बनाने का खतरा पैदा होता है, जो संविधान की भावना के विपरीत हो सकता है।
जस्टिस इंदु मल्होत्रा का हवाला
फाउंडेशन ने इस मामले में Indu Malhotra के ऐतिहासिक असहमति (dissent) का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अदालतों को धार्मिक मान्यताओं पर “सेक्युलर लॉजिक” नहीं थोपना चाहिए।
निष्कर्ष
सबरीमाला केस अब सिर्फ एक मंदिर या परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, न्यायिक हस्तक्षेप और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा मुद्दा बन गया है।
आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि भारत में धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता और न्यायपालिका की भूमिका के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।
Also Read:


