Maharashtra News: महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रामाबाई रणवीर ने अपनी बेटियों की पढ़ाई के लिए ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने मैराथन में हिस्सा लिया। दौड़ के दौरान चप्पल परेशानी बनी तो उसे उतारकर रामाबाई नंगे पांव दौड़ पड़ीं और आखिरकार रेस में पहला स्थान हासिल कर लिया। जीत के साथ उन्हें ₹3,000 की पुरस्कार राशि मिली, जिसे वह अपनी बेटियों की पढ़ाई पर खर्च करेंगी।
अंबाजोगाई की रहने वाली रामाबाई एक अकादमी में खाना बनाने का काम करती हैं। पति की मुंबई में एक हादसे में मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी पूरी तरह उनके कंधों पर आ गई। दो बेटियों की परवरिश से लेकर उनकी पढ़ाई तक, हर जिम्मेदारी रामाबाई अकेले संभाल रही हैं। आर्थिक परेशानियों के बीच भी उन्होंने बेटियों की शिक्षा को रुकने नहीं दिया।
बेटियों के भविष्य के लिए मैराथन में उतरने का फैसला
47-year-old Ramabai Ranveer from Ambajogai in Maharashtra’s Beed district won a marathon after running barefoot in a sari.
She removed her slippers when they began slipping during the race and went on to finish first, beating younger competitors in sports shoes.
She plans to… pic.twitter.com/vUj77RCeoP
— Salar News (@EnglishSalar) August 31, 2026 ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक, रामाबाई को स्थानीय स्तर पर आयोजित ‘अमृत दौड़’ मैराथन के बारे में पता चला। इस प्रतियोगिता में विजेता के लिए ₹3,000 की पुरस्कार राशि रखी गई थी। रामाबाई ने इसमें हिस्सा लेने का फैसला किया।
उनके लिए यह रकम सिर्फ एक इनाम नहीं थी। ₹3,000 से बेटियों की फीस, किताबें या पढ़ाई से जुड़ी दूसरी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती थी। यही उम्मीद उन्हें दौड़ के मैदान तक ले आई।
न स्पोर्ट्स शूज थे, न महंगी स्पोर्ट्स ड्रेस
रामाबाई के पास मैराथन के लिए न तो प्रोफेशनल रनिंग शूज थे और न ही कोई विशेष स्पोर्ट्स ड्रेस। वह साधारण साड़ी और चप्पल पहनकर प्रतियोगिता में पहुंचीं। उनके आसपास कई युवा प्रतिभागी आधुनिक रनिंग शूज और स्पोर्ट्स कपड़ों में नजर आ रहे थे।
सुविधाओं की कमी के बावजूद रामाबाई का आत्मविश्वास कम नहीं हुआ। उनके सामने लक्ष्य साफ था—रेस पूरी करनी है और जीत हासिल करनी है, ताकि मिलने वाली इनामी राशि बेटियों की पढ़ाई में काम आ सके।
चप्पल बनी रुकावट तो नंगे पांव दौड़ पड़ीं
रेस शुरू होने के बाद चप्पल के साथ दौड़ना रामाबाई के लिए मुश्किल होने लगा। चप्पल उनकी गति में बाधा बन रही थी। ऐसे में उन्होंने बिना देर किए चप्पल उतार दी और उसे हाथ में लेकर नंगे पांव दौड़ना शुरू कर दिया।
साधारण साड़ी में 47 साल की रामाबाई को सड़क पर नंगे पांव दौड़ते देखकर लोगों का ध्यान उनकी ओर गया। सामने कई युवा धावक थे और उनके पास बेहतर जूते व तैयारी थी। लेकिन रामाबाई ने अपनी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
सबसे पहले फिनिश लाइन पर पहुंचीं रामाबाई
रामाबाई ने दौड़ के दौरान अपनी रफ्तार बनाए रखी और आखिरकार सबसे पहले फिनिश लाइन पार कर ली। इस तरह उन्होंने मैराथन का पहला स्थान हासिल किया और ₹3,000 की पुरस्कार राशि अपने नाम की।
रकम भले ही बड़ी न हो, लेकिन रामाबाई के लिए इसका महत्व बहुत ज्यादा है। यह पैसा उनकी बेटियों की पढ़ाई की जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा।
पति की मौत के बाद अकेले संभाली परिवार की जिम्मेदारी
रामाबाई की कहानी केवल मैराथन जीतने तक सीमित नहीं है। पति की मौत के बाद उन्हें परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी खुद संभालनी पड़ी। वह काम करके घर चलाती हैं और साथ ही अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
ऐसे हालात में मैराथन में हिस्सा लेना और फिर उसे जीतना उनके दृढ़ संकल्प को दिखाता है। उन्होंने यह साबित किया कि संसाधनों की कमी किसी इंसान के हौसले से बड़ी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

रामाबाई के नंगे पांव मैराथन दौड़ने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में उनकी मेहनत और जज्बे को देखकर लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं। उनकी कहानी खास तौर पर इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने यह दौड़ सिर्फ जीत के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए लगाई थी।
रामाबाई रणवीर की यह कहानी बताती है कि मां के लिए बच्चों का भविष्य कितना बड़ा लक्ष्य हो सकता है। जिन परिस्थितियों में कई लोग हार मान लेते हैं, उन्हीं परिस्थितियों में रामाबाई ने आगे बढ़ने का रास्ता चुना। उनके लिए मैराथन की फिनिश लाइन सिर्फ एक रेस का अंत नहीं थी, बल्कि बेटियों के सपनों की ओर बढ़ाया गया एक और कदम थी।


