भारत के मध्य प्रदेश के तीन किशोरों ने अपने माता-पिता को वैक्सीन के रखरखाव की समस्या से जूझते देखा। बिजली की कमी वाले इलाकों में वैक्सीन को सही तापमान पर रखने की चुनौती का समाधान खोजने के लिए उन्होंने बिना बिजली चलने वाला एक खास कूलिंग बॉक्स तैयार किया। इस इनोवेशन के लिए उन्हें Earth Prize 2025 का एशिया क्षेत्रीय पुरस्कार मिला और 12,500 डॉलर की पुरस्कार राशि हासिल हुई।
भारत को प्रतिभाओं की भूमि कहा जाता है और मध्य प्रदेश के तीन किशोरों ने अपनी अनोखी खोज से इसे एक बार फिर साबित किया है। इंदौर के ध्रुव चौधरी, मिथ्रन लधानिया और मृदुल जैन ने अपने माता-पिता को फार्मेसी के क्षेत्र में काम करते हुए वैक्सीन के रखरखाव की समस्या से जूझते देखा। खासकर उन ग्रामीण इलाकों में जहां बिजली की उपलब्धता सीमित है, वैक्सीन को लंबे समय तक सही तापमान पर रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
तीनों किशोरों ने इसी समस्या का समाधान खोजने का फैसला किया। उनकी मेहनत का नतीजा ‘थर्मावॉल्ट’ (Thermavault) के रूप में सामने आया। यह एक इंसुलेटेड कूलिंग बॉक्स है, जिसे पारंपरिक फ्रिज की तरह बिजली, बैटरी या बर्फ की जरूरत नहीं पड़ती। इसकी खासियत यह है कि इसे एक विशेष नमक-आधारित कूलिंग सिस्टम से ठंडा किया जाता है।
इस इनोवेशन के लिए ध्रुव चौधरी, मिथ्रन लधानिया और मृदुल जैन ने Earth Prize 2025 का एशिया क्षेत्रीय पुरस्कार जीता। इस उपलब्धि के साथ उन्हें 12,500 डॉलर यानी करीब ₹10 लाख की पुरस्कार राशि मिली। तीनों ने इस राशि का इस्तेमाल थर्मावॉल्ट की करीब 200 यूनिट तैयार करने और उनकी टेस्टिंग के लिए 120 अस्पतालों तक भेजने की योजना बनाई है।
कोविड-19 महामारी के दौरान आया आइडिया
थर्मावॉल्ट बनाने का विचार तीनों किशोरों को कोविड-19 महामारी के दौरान आया। उस समय उन्होंने अपने माता-पिता के काम के दौरान वैक्सीन को स्टोर करने में आने वाली परेशानियों को करीब से देखा।
समस्या सिर्फ वैक्सीन उपलब्ध कराने की नहीं थी। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में वैक्सीन पहुंचने के बाद उन्हें निर्धारित तापमान पर सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी था। जिन जगहों पर लगातार बिजली उपलब्ध नहीं थी, वहां यह काम और मुश्किल हो जाता था।
तीनों किशोरों ने इसी समस्या को एक अवसर के रूप में देखा। उनका उद्देश्य ऐसी कूलिंग तकनीक तैयार करना था जिसे बिजली की उपलब्धता पर निर्भर न रहना पड़े। इस तरह उन्होंने एक ऐसा सिस्टम विकसित करने पर काम शुरू किया, जो रासायनिक प्रक्रिया के जरिए ठंडक पैदा कर सके।
सही नमक की खोज बनी सबसे बड़ी चुनौती
थर्मावॉल्ट के पीछे इस्तेमाल किया गया विज्ञान मूल रूप से घोलने के दौरान होने वाली एंडोथर्मिक प्रक्रिया पर आधारित है। कुछ पदार्थ पानी में घुलते समय अपने आसपास से गर्मी अवशोषित करते हैं। इससे आसपास का तापमान कम हो जाता है और कूलिंग प्रभाव पैदा होता है।
लेकिन सही पदार्थ का चुनाव आसान नहीं था।
ध्रुव, मिथ्रन और मृदुल ने करीब 150 अलग-अलग नमक और रासायनिक यौगिकों की जानकारी जुटाई। इसके बाद उन्होंने विकल्पों की संख्या घटाकर करीब 20 की और अलग-अलग पदार्थों के साथ प्रयोग किए। इसके लिए उन्होंने IIT में लैब स्पेस का भी इस्तेमाल किया।
शुरुआती प्रयोगों में उन्हें ऐसा कोई एक नमक नहीं मिला जो उनकी जरूरत के मुताबिक पर्याप्त कूलिंग कर सके। आखिरकार उनकी तलाश उन्हें उनकी नौवीं कक्षा की साइंस की किताब तक वापस ले आई।
उनके प्रयोग में अमोनियम क्लोराइड और बेरियम हाइड्रॉक्साइड ऑक्टाहाइड्रेट महत्वपूर्ण साबित हुए। अमोनियम क्लोराइड अकेले इस्तेमाल करने पर लगभग 2 से 6 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान बनाए रखने में मदद करता था। यह तापमान कई वैक्सीन के भंडारण के लिए उपयोगी हो सकता है।
बाद में बेरियम हाइड्रॉक्साइड ऑक्टाहाइड्रेट को शामिल करने से सिस्टम सब-जीरो तापमान तक पहुंचने में सक्षम हुआ। इससे तकनीक के संभावित इस्तेमाल का दायरा वैक्सीन के अलावा ऑर्गन ट्रांसपोर्ट जैसी जरूरतों तक भी बढ़ गया।
सूत्रों के मुताबिक, सही फॉर्मूला मिलने के करीब तीन महीने बाद तीनों ने काम करने वाला प्रोटोटाइप तैयार कर लिया। इसके बाद उन्होंने इंदौर के आसपास के अस्पतालों में इसकी टेस्टिंग शुरू की।
थर्मावॉल्ट के अंदर क्या है?
थर्मावॉल्ट का डिजाइन देखने में काफी सरल है, लेकिन इसके अंदर की तकनीक इसे खास बनाती है।
इसमें एक इंसुलेटेड प्लास्टिक बाहरी शेल होता है। इसके अंदर कॉपर की लाइनिंग लगाई गई है, जहां वैक्सीन या अन्य संवेदनशील मेडिकल सामग्री रखी जा सकती है।
प्लास्टिक और कॉपर की परतों के बीच पानी और चुने गए रासायनिक पदार्थों से तैयार किया गया कूलिंग सॉल्यूशन मौजूद रहता है। जब यह मिश्रण प्रतिक्रिया करता है तो आसपास की गर्मी को अवशोषित करता है और बॉक्स के अंदर का तापमान कम होने लगता है।
यही प्रक्रिया थर्मावॉल्ट को पारंपरिक बिजली वाले फ्रिज से अलग बनाती है। जहां सामान्य रेफ्रिजरेटर को लगातार बिजली की जरूरत होती है, वहीं इस सिस्टम में कूलिंग के लिए रासायनिक ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए क्यों अहम है यह खोज?
भारत समेत दुनिया के कई देशों में वैक्सीन और अन्य तापमान-संवेदनशील मेडिकल उत्पादों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड चेन की जरूरत होती है। वैक्सीन को निर्माता से अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के दौरान निर्धारित तापमान बनाए रखना जरूरी होता है।
बिजली की अनियमित उपलब्धता वाले इलाकों में यही व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। बिजली जाने पर बैकअप बैटरी या जनरेटर की जरूरत पड़ सकती है, जबकि बर्फ आधारित व्यवस्था में भी लगातार निगरानी और सप्लाई की आवश्यकता होती है।
थर्मावॉल्ट जैसी तकनीक का उद्देश्य इसी समस्या को कम करना है। अगर इसका बड़े स्तर पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जाता है तो दूरदराज के स्वास्थ्य केंद्रों तक वैक्सीन और अन्य तापमान-संवेदनशील मेडिकल सामग्री पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
पुरस्कार राशि से आगे बढ़ेगा प्रोजेक्ट
Earth Prize 2025 में एशिया क्षेत्र से जीत हासिल करना तीनों किशोरों के लिए बड़ी उपलब्धि है। लेकिन उनका लक्ष्य केवल पुरस्कार जीतना नहीं है। वे अपने प्रोटोटाइप को ज्यादा बड़े स्तर पर टेस्ट करना चाहते हैं।
मिली 12,500 डॉलर की पुरस्कार राशि से करीब 200 थर्मावॉल्ट यूनिट तैयार करने और उन्हें लगभग 120 अस्पतालों में टेस्टिंग के लिए भेजने की योजना है। इससे वास्तविक परिस्थितियों में इसकी क्षमता, तापमान स्थिरता और उपयोगिता को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी।
ध्रुव, मिथ्रन और मृदुल की कहानी यह भी दिखाती है कि किसी बड़ी समस्या का समाधान हमेशा बड़ी प्रयोगशाला या महंगे उपकरणों से ही नहीं निकलता। कभी-कभी किसी समस्या को करीब से देखना, उसके पीछे की वजह समझना और लगातार प्रयोग करना ही एक उपयोगी इनोवेशन की शुरुआत बन सकता है।


