नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों ने दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच दुनिया भर के देश, ऊर्जा कंपनियां और शिपिंग ऑपरेटर बड़े पैमाने पर सुपरटैंकरों का ऑर्डर दे रहे हैं। स्थिति यह है कि वैश्विक शिपयार्ड्स में इस समय 262 सुपरटैंकर निर्माणाधीन हैं, जो इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।
शिपिंग उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या अक्टूबर 2008 के पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ चुकी है। उस समय वैश्विक आर्थिक उछाल के दौरान 255 सुपरटैंकर निर्माणाधीन थे। अब करीब 18 साल बाद एक बार फिर उद्योग उसी तरह के निवेश चक्र में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है।
क्या होते हैं सुपरटैंकर और क्यों बढ़ी है उनकी मांग
सुपरटैंकर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में आते हैं—वेरी लार्ज क्रूड कैरियर (VLCC) और अल्ट्रा लार्ज क्रूड कैरियर (ULCC)। एक सामान्य VLCC लगभग 20 लाख बैरल कच्चा तेल एक साथ ले जाने में सक्षम होता है। यही वजह है कि लंबी दूरी पर तेल परिवहन के लिए इन्हें सबसे किफायती विकल्प माना जाता है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद कई देशों ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) बढ़ाने की योजना बनाई है। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को आशंका है कि यदि किसी बड़े संघर्ष के कारण सप्लाई बाधित होती है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसी जोखिम से बचने के लिए बड़ी मात्रा में तेल खरीदकर भंडारण की रणनीति अपनाई जा रही है।
यही वजह है कि तेल परिवहन क्षमता बढ़ाने के लिए सुपरटैंकरों की मांग तेजी से बढ़ी है।
दो साल में 1000 फीसदी उछाल ने चौंकाया
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, दो वर्ष पहले की तुलना में सुपरटैंकर ऑर्डर बुक में लगभग 1000 फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि केवल तेल की मौजूदा मांग का परिणाम नहीं है बल्कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं का भी संकेत है।
कोविड महामारी के बाद वैश्विक सप्लाई चेन में आई बाधाओं, रूस-यूक्रेन संघर्ष, लाल सागर संकट और अब ईरान से जुड़े तनाव ने दुनिया को यह सिखाया है कि ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान किसी भी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी कारण तेल आयातक देश अब केवल तेल खरीदने पर ही नहीं बल्कि उसके सुरक्षित और तेज परिवहन पर भी निवेश कर रहे हैं।
चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का दबदबा
सुपरटैंकर निर्माण उद्योग पर पूर्वी एशिया के तीन देशों—चीन, दक्षिण कोरिया और जापान—का लगभग पूर्ण नियंत्रण है। वैश्विक स्तर पर बनने वाले अधिकांश VLCC और ULCC इन्हीं देशों के शिपयार्ड्स में तैयार होते हैं।
चीन वर्तमान में टैंकर निर्माण और स्वामित्व दोनों मामलों में दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। चीन की सरकारी और निजी शिपबिल्डिंग कंपनियां बड़े पैमाने पर कम लागत में जहाज बनाने की क्षमता रखती हैं। इसके अलावा चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति के तहत भी बड़े टैंकर बेड़े का विस्तार कर रहा है।
दक्षिण कोरिया की कंपनियां तकनीकी रूप से अत्याधुनिक जहाजों के निर्माण के लिए जानी जाती हैं। इनमें प्रमुख रूप से Samsung Heavy Industries, Hanwha Ocean और HD Hyundai Heavy Industries शामिल हैं। ये कंपनियां उच्च दक्षता वाले आधुनिक सुपरटैंकर बनाने में विशेषज्ञ मानी जाती हैं।
वहीं जापान के शिपयार्ड अपनी गुणवत्ता, टिकाऊ डिजाइन और इंजीनियरिंग क्षमता के कारण वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान रखते हैं।
शिपिंग कंपनियों को क्यों दिख रहा बड़ा मौका
तेल परिवहन उद्योग में कमाई का बड़ा हिस्सा फ्रेट रेट्स पर निर्भर करता है। जब तेल की मांग बढ़ती है और उपलब्ध जहाजों की संख्या सीमित होती है, तब टैंकर ऑपरेटर अधिक किराया वसूल सकते हैं।
ईरान संकट और मध्य पूर्व में बढ़ते जोखिम के कारण कई जहाज अब लंबा मार्ग अपनाने को मजबूर हैं। इससे यात्रा समय बढ़ रहा है और उपलब्ध जहाजों की प्रभावी संख्या घट रही है। ऐसी स्थिति में फ्रेट रेट्स बढ़ने की संभावना रहती है।
शिपिंग कंपनियां मान रही हैं कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा व्यापार के नए मार्ग विकसित होंगे, जिससे बड़े टैंकरों की जरूरत और बढ़ सकती है। इसी उम्मीद में कंपनियां नए जहाजों पर भारी निवेश कर रही हैं।
भारत पर क्या होगा असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में वैश्विक शिपिंग बाजार में होने वाले बदलाव का सीधा असर भारत पर भी पड़ता है।
यदि सुपरटैंकरों की संख्या बढ़ती है तो लंबी अवधि में तेल परिवहन की लागत स्थिर रह सकती है। इससे आयातकों को फायदा होगा। हालांकि अल्पकाल में भू-राजनीतिक तनाव और ऊंचे फ्रेट रेट्स के कारण तेल आयात महंगा बना रह सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भी अपनी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण क्षमता बढ़ाने और समुद्री ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा।
क्या फिर दोहराएगा 2008 वाला चक्र
2008 में भी बड़े पैमाने पर सुपरटैंकर ऑर्डर दिए गए थे। बाद में जब वैश्विक आर्थिक गतिविधियां धीमी हुईं तो बाजार में जहाजों की अधिकता हो गई। इसके परिणामस्वरूप फ्रेट रेट्स गिर गए और कई टैंकर कंपनियों की आय प्रभावित हुई।
इस बार स्थिति कुछ अलग है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा, भू-राजनीतिक जोखिम और सप्लाई चेन विविधीकरण जैसे कारक मांग को समर्थन दे रहे हैं। फिर भी विश्लेषकों का मानना है कि यदि बहुत अधिक जहाज एक साथ बाजार में आ जाते हैं तो भविष्य में ओवरसप्लाई का जोखिम पैदा हो सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि सुपरटैंकर उद्योग एक नए निवेश चक्र में प्रवेश कर चुका है और 262 निर्माणाधीन जहाज इस बात का संकेत हैं कि दुनिया आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को पहले से कहीं अधिक गंभीरता से ले रही है।


