Rajasthan News: रेगिस्तान का नाम सुनते ही आंखों के सामने रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले और सूखी जमीन की तस्वीर उभरती है। लेकिन राजस्थान के जैसलमेर में रहने वाले सुमेर सिंह भाटी ने अपने प्रयासों से थार रेगिस्तान की एक बड़ी तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभाई है। पारंपरिक ऊंट पालक सुमेर सिंह ने स्थानीय लोगों को साथ लेकर पवित्र घास के मैदानों यानी ओरणों के संरक्षण की मुहिम चलाई। उनके प्रयासों से करीब 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र को बचाने में मदद मिली और यहां की प्राकृतिक पारिस्थितिकी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ।
कौन हैं सुमेर सिंह भाटी?
राजस्थान के जैसलमेर निवासी सुमेर सिंह भाटी पारंपरिक ऊंट पालक हैं। थार के प्राकृतिक वातावरण और यहां रहने वाले पशुपालक समुदायों के साथ उनका गहरा जुड़ाव रहा है। वर्षों से उन्होंने देखा कि कई पारंपरिक चरागाह और ओरण धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर पशुओं के चरने की जमीन, वन्यजीवों और स्थानीय लोगों की आजीविका पर पड़ सकता था।
इसी चिंता ने उन्हें संरक्षण की मुहिम शुरू करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को साथ जोड़ा और ओरणों को बचाने के लिए लोगों के बीच जागरूकता फैलानी शुरू की।
20 गांवों को साथ लेकर शुरू किया अभियान
सुमेर सिंह भाटी ने करीब 20 गांवों के लोगों को एकजुट किया और पारंपरिक घास के मैदानों को बचाने के लिए अभियान चलाया। उन्होंने लोगों को समझाया कि ओरण केवल चरागाह नहीं हैं, बल्कि ये थार के पर्यावरण, वन्यजीवों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र हैं।
ओरण संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए उन्होंने जैसलमेर से जयपुर तक ‘सेव ओरण पदयात्रा’ भी निकाली। इस पहल का उद्देश्य लोगों और प्रशासन का ध्यान इन पारंपरिक प्राकृतिक क्षेत्रों की ओर आकर्षित करना था।
10,000 हेक्टेयर ओरण को बचाने में मिली मदद
सुमेर सिंह भाटी और स्थानीय ग्रामीणों के प्रयासों से देगराई माता ओरण के करीब 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र के संरक्षण में मदद मिली। संरक्षण के प्रयासों के बाद इस क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति और घास के मैदानों को सुरक्षित रखने की दिशा में काम आगे बढ़ा।
ओरणों के संरक्षण का फायदा केवल पर्यावरण को ही नहीं मिलता। ये क्षेत्र स्थानीय पशुपालकों के लिए प्राकृतिक चरागाह का काम करते हैं। ऐसे इलाकों के सुरक्षित रहने से ऊंट, भेड़ और बकरियों जैसे पशुओं के लिए चरने की जगह बनी रहती है, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका को सहारा मिलता है।
थार के पर्यावरण में ऊंटों की भी अहम भूमिका
थार रेगिस्तान में ऊंट सदियों से स्थानीय जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। लेकिन ऊंटों का महत्व केवल पशुपालन तक सीमित नहीं है। वे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का भी हिस्सा हैं।
ऊंट प्राकृतिक घास और वनस्पतियों पर निर्भर रहते हैं और चराई की प्रक्रिया के जरिए पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देते हैं। साथ ही, उनके माध्यम से पौधों के बीज एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकते हैं।
ओरणों के संरक्षण से ऐसे प्राकृतिक चरागाह सुरक्षित रहते हैं, जहां बड़ी संख्या में पशु चर सकते हैं। इससे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के साथ ही पशुपालक समुदायों की आजीविका को भी मजबूती मिलती है।
गोडावण और कैराकल जैसे वन्यजीवों के लिए भी काम
सुमेर सिंह भाटी की संरक्षण मुहिम का दायरा केवल घास के मैदानों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने थार के दुर्लभ वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण को लेकर भी काम किया है।
थार में पाए जाने वाले दुर्लभ गोडावण (Great Indian Bustard) के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना भी ऐसे प्रयासों का हिस्सा रहा है। इसके अलावा, जैसलमेर क्षेत्र में पाई जाने वाली दुर्लभ जंगली बिल्ली कैराकल के बारे में भी लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने में योगदान दिया गया।
प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहने से इन दुर्लभ प्रजातियों को भी बेहतर वातावरण मिल सकता है।
पेड़ लगाने से आगे है पर्यावरण संरक्षण
सुमेर सिंह भाटी की कहानी पर्यावरण संरक्षण को देखने का एक अलग नजरिया देती है। पर्यावरण बचाने का मतलब सिर्फ अधिक से अधिक पेड़ लगाना नहीं है। घास के मैदान, पारंपरिक चरागाह, जल स्रोत और प्राकृतिक आवास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
थार के ओरण स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने के साथ-साथ पशुपालकों की अर्थव्यवस्था से भी जुड़े हैं। इन क्षेत्रों का संरक्षण मिट्टी, पानी, वनस्पतियों और वन्यजीवों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
सुमेर सिंह भाटी और ग्रामीणों की पहल यह संदेश देती है कि स्थानीय समुदाय अगर अपनी प्राकृतिक विरासत की रक्षा के लिए एकजुट हो जाएं, तो रेगिस्तान जैसे चुनौतीपूर्ण इलाके में भी बड़ा बदलाव संभव है।


