नई दिल्ली। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में हाल के दिनों में आई कमजोरी को लेकर बाजार और निवेशकों के बीच लगातार चर्चा बनी हुई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, सोने की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की मुनाफावसूली ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। इसी बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रुपये की चाल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों पर विस्तार से बात की है।
मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर कर्नाटक के देवनहल्ली में आयोजित कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सीतारमण ने कहा कि रुपये की विनिमय दर किसी एक कारण से नहीं बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों के संयुक्त प्रभाव से तय होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का उद्देश्य किसी निश्चित स्तर पर रुपये को बनाए रखना नहीं बल्कि बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना है।
कच्चे तेल का बढ़ता बिल क्यों बन रहा है चुनौती?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इससे ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। तेल कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है।
यही कारण है कि तेल की कीमतों में हर बड़ी उछाल भारतीय मुद्रा बाजार को प्रभावित करती है।
सोने का आयात भी बढ़ा रहा है डॉलर की मांग
वित्त मंत्री ने अपने बयान में सोने के आयात का भी विशेष उल्लेख किया। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड कंज्यूमर देशों में से एक है। शादी-ब्याह, त्योहारों और निवेश के रूप में सोने की मांग लगातार बनी रहती है।
जब अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में सोने की ओर भागते हैं। इसका असर भारत में भी दिखाई देता है। सोने की बढ़ती खरीदारी के लिए आयातकों को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा की मांग और बढ़ जाती है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार तेल और सोना दोनों ऐसे उत्पाद हैं जिनका आयात बिल बढ़ते ही रुपये पर दबाव स्वतः बढ़ जाता है।
पश्चिम एशिया संकट का रुपये से क्या संबंध?
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को प्रभावित किया है। निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर बढ़ते हैं।
भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है। इससे रुपया कमजोर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो तेल की कीमतों के साथ-साथ विदेशी निवेश प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों का असर
निर्मला सीतारमण ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को भी रुपये की चाल का महत्वपूर्ण कारक बताया।
जब फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाता है या बढ़ाने के संकेत देता है, तब वैश्विक निवेशकों को अमेरिकी बाजार ज्यादा आकर्षक लगने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका में निवेश करने लगते हैं।
इससे भारत सहित कई देशों की मुद्राओं पर दबाव आता है। रुपये की कमजोरी के पीछे यह भी एक बड़ा कारण माना जाता है।
एफआईआई और एफडीआई की निकासी कैसे डालती है असर?
विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) और विदेशी प्रत्यक्ष निवेशक (FDI) भारतीय बाजार में बड़े निवेशक हैं। जब ये निवेशक मुनाफावसूली करके अपना पैसा निकालते हैं तो उन्हें रुपये को डॉलर में बदलना पड़ता है।
इस प्रक्रिया में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है। वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिकी आर्थिक घटनाक्रमों और वैश्विक परिस्थितियों के कारण निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी विदेशी मुद्रा भंडार और विनिमय दर दोनों को प्रभावित कर सकती है।
RBI कब और कैसे करता है हस्तक्षेप?
वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि आरबीआई किसी तय विनिमय दर को बचाने के लिए बाजार में नहीं उतरता। उसका मुख्य उद्देश्य अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना होता है।
जब बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है और रुपया तेजी से कमजोर होने लगता है, तब आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर बाजार में तरलता उपलब्ध कराता है। इससे विनिमय दर में स्थिरता लाने में मदद मिलती है।
आरबीआई समय-समय पर इसी रणनीति का इस्तेमाल करता रहा है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केंद्रीय बैंक लंबे समय तक केवल हस्तक्षेप के भरोसे बाजार को नियंत्रित नहीं रख सकता।
उर्वरक आयात और सब्सिडी का भी असर
सीतारमण ने उर्वरक सब्सिडी का उदाहरण देते हुए बताया कि कोविड काल के बाद वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतें कई गुना बढ़ गई थीं। उस समय सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए भारी सब्सिडी दी।
उन्होंने कहा कि किसानों को आज भी लगभग 300 रुपये में उर्वरक की बोरी उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि आयातित उर्वरक की वास्तविक लागत कई गुना अधिक रही है। इससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है और विदेशी मुद्रा प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है।
क्या रुपये की कमजोरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है?
रुपये में गिरावट हमेशा नकारात्मक नहीं मानी जाती। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए फायदेमंद हो सकता है क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा में अधिक आय प्राप्त होती है।
हालांकि अत्यधिक कमजोरी कई चुनौतियां भी पैदा करती है। आयात महंगे हो जाते हैं, तेल का बिल बढ़ता है और महंगाई पर दबाव आ सकता है।
यही कारण है कि आरबीआई और सरकार दोनों विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता से बचने की कोशिश करते हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर क्या बोलीं वित्त मंत्री?
निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत पिछले कई वर्षों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हालिया जीडीपी आंकड़ों में विनिर्माण, कृषि, सेवाएं, लॉजिस्टिक्स और परिवहन जैसे क्षेत्रों में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक बुनियाद के कारण भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद बेहतर स्थिति में है। हालांकि विदेशी मुद्रा बाजार पर वैश्विक घटनाओं का असर पूरी तरह टाला नहीं जा सकता।
निष्कर्ष
रुपये में हाल की कमजोरी केवल एक कारण का परिणाम नहीं है। पश्चिम एशिया संकट, कच्चे तेल और सोने का बढ़ता आयात बिल, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां, विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक अनिश्चितता जैसे कई कारक मिलकर भारतीय मुद्रा पर दबाव बना रहे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार आरबीआई का फोकस किसी तय स्तर पर रुपये को बनाए रखना नहीं बल्कि बाजार में स्थिरता बनाए रखना है। आने वाले महीनों में तेल की कीमतें, विदेशी निवेश प्रवाह और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां रुपये की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।


