नई दिल्ली: लाल सागर संकट को बिना किसी स्थायी समाधान के 1,000 दिन पूरे हो गए हैं। आर्थिक थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक, यह संकट अब महज क्षेत्रीय सुरक्षा समस्या नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक व्यापार के लिए लंबे समय का जोखिम बन चुका है। सैन्य कार्रवाई मिसाइलों और हमलों को रोक सकती है, लेकिन इससे व्यापारिक भरोसा तुरंत बहाल नहीं होता।
GTRI ने कहा है कि समुद्री व्यापार के महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स पर बढ़ती असुरक्षा को भारत को लॉन्ग-टर्म ट्रेड रिस्क के तौर पर देखना चाहिए। इसके लिए घरेलू शिपिंग क्षमता, ट्रेड फाइनेंस, नौसैनिक सुरक्षा और वैकल्पिक परिवहन गलियारों को मजबूत करना जरूरी है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी परेशानी?
लाल सागर हिंद महासागर और भूमध्य सागर के बीच एक बेहद अहम समुद्री कड़ी है। एशिया से यूरोप जाने वाले जहाज आमतौर पर अरब सागर, अदन की खाड़ी, लाल सागर और स्वेज नहर से होते हुए भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं।
यह समुद्री मार्ग भारत को यूरोप, ब्रिटेन और उत्तरी अफ्रीका समेत कई बड़े बाजारों से जोड़ता है। ऐसे में लाल सागर में लंबे समय से जारी असुरक्षा का सीधा असर भारतीय निर्यातकों और आयातकों पर पड़ा है।
GTRI के अनुसार, संकट के कारण यूरोप, ब्रिटेन, उत्तरी अफ्रीका और अमेरिका के पूर्वी तट के साथ भारत का व्यापार धीमा और महंगा हुआ है। बढ़ी हुई माल ढुलाई, बीमा और वर्किंग कैपिटल लागत का सबसे ज्यादा दबाव छोटे और मध्यम निर्यातकों यानी MSMEs पर पड़ा है।
नवंबर 2023 से बिगड़े हालात
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए लाल सागर का यह संकट नवंबर 2023 से गंभीर हुआ। इजरायल-हमास युद्ध के बीच यमन स्थित हूती विद्रोहियों ने फिलिस्तीनियों के समर्थन में लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कमर्शियल कार्गो जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया।
हमलों के खतरे को देखते हुए दुनिया की कई प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने लाल सागर और स्वेज नहर से गुजरने के बजाय अपने जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना शुरू कर दिया।
इस वैकल्पिक रूट ने यात्राओं में हजारों नॉटिकल मील की दूरी जोड़ दी। नतीजतन भारत-यूरोप व्यापार के लिए ट्रांजिट टाइम, माल ढुलाई खर्च और बीमा प्रीमियम में बड़ा इजाफा हुआ।
15 अगस्त को पूरे हुए संकट के 1,000 दिन
GTRI ने बताया कि लाल सागर शिपिंग संकट ने 15 अगस्त को 1,000 दिन पूरे कर लिए। थिंक टैंक के मुताबिक, जो समस्या शुरुआत में एक क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौती थी, वह अब वैश्विक व्यापार के लिए दीर्घकालिक बाधा बन गई है।
पश्चिम एशिया में व्यापक अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष ने स्थिति को और जटिल बनाया है। इससे क्षेत्र के दूसरे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ी है।
स्वेज नहर का ट्रैफिक अब भी सामान्य से काफी नीचे
GTRI के मुताबिक, प्रमुख कंटेनर शिपिंग कंपनियां अभी भी एशिया-यूरोप और एशिया-अमेरिका के पूर्वी तट के बीच अपने अधिकांश ट्रैफिक को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेज रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, स्वेज नहर का ट्रैफिक संकट से पहले के स्तर की तुलना में करीब 60-70 फीसदी नीचे बना हुआ है। अफ्रीका के रास्ते जहाजों को भेजने से वैश्विक कंटेनर क्षमता का अनुमानित 5-7 फीसदी हिस्सा अतिरिक्त रूप से इस्तेमाल होता है।
कई समुद्री यात्राओं में करीब 10-14 दिन का अतिरिक्त समय लग रहा है। इसका असर केवल जहाजों के ईंधन खर्च पर नहीं पड़ता, बल्कि माल की डिलीवरी, इन्वेंट्री और कंपनियों की कार्यशील पूंजी पर भी पड़ता है।
माल ढुलाई दरें 25-40 फीसदी तक ज्यादा
GTRI के अनुसार, माल ढुलाई की दरें सामान्य स्तर की तुलना में करीब 25-40 फीसदी ऊपर बनी हुई हैं। इसके अलावा शिपिंग कंपनियों को वॉर-रिस्क इंश्योरेंस का अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ रहा है।
थिंक टैंक का अनुमान है कि कुछ जहाजों के लिए स्वेज नहर और बाकी के लिए केप ऑफ गुड होप का इस्तेमाल करने वाला यह दो-रूट सिस्टम 2027 तक भी जारी रह सकता है।
भारत-यूरोप व्यापार के लिए क्यों अहम है लाल सागर?
भारत और यूरोप के बीच होने वाले सामान के व्यापार का करीब 80 फीसदी हिस्सा सामान्य परिस्थितियों में लाल सागर के रास्ते से गुजरता है। इस कॉरिडोर से जुड़े बाजार भारत के कुल निर्यात का लगभग आधा और आयात का करीब 30 फीसदी हिस्सा रखते हैं।
इस संकट से ब्रिटेन, जर्मनी, नीदरलैंड, बेल्जियम, फ्रांस, इटली, स्पेन, ग्रीस, मिस्र, इजरायल, जॉर्डन, उत्तरी अफ्रीका और अमेरिका का पूर्वी तट जैसे बाजार खास तौर पर प्रभावित हुए हैं।
वहीं अमेरिका के पश्चिमी तट पर इसका असर अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि वहां जाने वाला काफी माल प्रशांत महासागर के रास्ते जाता है। इसी तरह यूएई, ओमान और कतर के साथ व्यापार के लिए स्वेज नहर पर निर्भरता नहीं है। हालांकि, क्षेत्रीय असुरक्षा के कारण इन मार्गों पर भी बीमा लागत और सुरक्षा जोखिम बढ़े हैं।
कुछ रूट पर माल ढुलाई 200-400% तक बढ़ी
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, संकट के सबसे गंभीर दौर में कुछ भारत-यूरोप और भारत-अमेरिका रूट पर माल ढुलाई की दरें 200-400 फीसदी तक बढ़ गई थीं।
लंबे रूट की वजह से ईंधन, माल ढुलाई, बीमा और इन्वेंट्री की लागत बढ़ी। साथ ही भुगतान में देरी हुई और कई निर्यातकों की वर्किंग कैपिटल कई हफ्तों तक फंसी रही।
इसका असर खास तौर पर उन कारोबारों पर पड़ा जिनका मार्जिन पहले से कम है और जिनके लिए परिवहन लागत में मामूली बढ़ोतरी भी मुनाफे को प्रभावित कर सकती है।
MSME एक्सपोर्टर्स पर सबसे ज्यादा असर
GTRI के अनुसार, छोटे और मध्यम निर्यातक इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, रसायन, चमड़ा, कालीन, चावल, मसाले, अंगूर और समुद्री उत्पाद जैसे सेक्टरों में लागत बढ़ने का दबाव ज्यादा है।
इनमें से कई उत्पाद कम मार्जिन वाले होते हैं। ऐसे में माल ढुलाई और बीमा की लागत बढ़ने पर निर्यातकों के लिए अपनी कीमतें प्रतिस्पर्धी बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
भारत को अब क्या करना चाहिए?
GTRI का कहना है कि 1,000 दिनों का यह संकट एक महत्वपूर्ण सबक देता है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण शिपिंग में होने वाली बाधाएं सामान्य बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट, सरकारी सहायता योजनाओं और इन्वेंट्री साइकिल से कहीं ज्यादा लंबे समय तक चल सकती हैं।
ऐसे में भारत को समुद्री असुरक्षा को अस्थायी समस्या मानने के बजाय बार-बार सामने आने वाले व्यापारिक जोखिम के रूप में देखना चाहिए।
इसके लिए देश को घरेलू शिपिंग क्षमता बढ़ाने, निर्यातकों के लिए ट्रेड फाइनेंस मजबूत करने, समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक निगरानी बढ़ाने तथा वैकल्पिक परिवहन गलियारों को विकसित करने पर ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष: लाल सागर संकट के 1,000 दिन पूरे होना भारत के लिए केवल भू-राजनीतिक चिंता नहीं है। यह भारतीय व्यापार, निर्यातकों की लागत, सप्लाई चेन और वर्किंग कैपिटल पर पड़ने वाले लंबे असर का संकेत है। अगर समुद्री व्यापार के इन महत्वपूर्ण रास्तों में असुरक्षा बनी रहती है, तो भारत को अपनी व्यापार रणनीति में वैकल्पिक रूट और मजबूत घरेलू लॉजिस्टिक्स को स्थायी प्राथमिकता देनी होगी।


