भारत में महंगाई और ऊर्जा संकट का असर अब सीधे आम यात्रियों की जेब और रेलवे प्लेटफॉर्म पर मिलने वाले खाने-पीने की चीजों तक पहुंच गया है। एक ओर जहां एलपीजी (LPG) के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रेलवे स्टेशनों पर वर्षों से स्थिर रेट पर बिकने वाले फूड आइटम अब वेंडर्स के लिए घाटे का सौदा बनते जा रहे हैं।
हालात ऐसे हैं कि ₹5 की चाय और ₹10 की कॉफी जैसी दरों पर अब कारोबार करना लगभग असंभव माना जा रहा है। इसी बीच कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतें ₹3,071 तक पहुंचने के बाद रेलवे फूड वेंडर्स ने सरकार से तत्काल रेट रिवीजन की मांग की है।
LPG कीमतों में भारी उछाल, वेंडर्स पर सीधा असर
देश में ऊर्जा कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। हाल ही में कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में एक ही दिन में लगभग ₹1,000 तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे रेलवे प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले लाइसेंसी वेंडर्स पर भारी दबाव बढ़ गया है।
वर्तमान में 19 किलो का कमर्शियल LPG सिलेंडर दिल्ली में लगभग ₹3,071.50 तक पहुंच गया है, जबकि कुछ क्षेत्रों में 14 किलो के छोटे सिलेंडर की कीमत ₹2,000 से ₹5,000 के बीच पहुंचने की रिपोर्ट है। यह स्थिति छोटे कारोबारियों के लिए गंभीर संकट बन चुकी है।
रेलवे फूड वेंडर्स क्यों परेशान हैं?
रेलवे स्टेशनों पर फूड स्टॉल, ट्रॉली और ढाबा चलाने वाले लाइसेंसी वेंडर्स का कहना है कि उनके लिए तय रेट 2012 से अब तक अपडेट नहीं किए गए हैं। जबकि पिछले एक दशक में लागत कई गुना बढ़ चुकी है। वेंडर्स के अनुसार उनकी लागत संरचना कुछ इस प्रकार है:
- 18% GST
- 5% सेल्स टैक्स
- लगभग 12% लाइसेंस फीस
- 10–15% कमीशन
- अतिरिक्त स्थानीय कर
इन सब खर्चों के बाद उनके पास लाभ का मार्जिन लगभग 30% के आसपास ही बचता है, जो लगातार घट रहा है।
₹5 की चाय कैसे बन गई असंभव गणित?
रेलवे प्लेटफॉर्म पर आज भी कई जगह चाय ₹5 और कॉफी ₹10 की कीमत पर उपलब्ध है, लेकिन वेंडर्स का कहना है कि इस दर पर अब कारोबार चलाना लगभग असंभव हो गया है। इसका मुख्य कारण लगातार बढ़ती लागत है, जिसमें LPG की कीमतों में तेज़ उछाल, दूध, चीनी और मसालों जैसे कच्चे माल की बढ़ती महंगाई, टैक्स और लाइसेंस फीस का भारी दबाव, साथ ही ट्रांसपोर्ट और स्टाफ खर्च में लगातार बढ़ोतरी शामिल है। इन सभी खर्चों के बढ़ने के कारण वास्तविक उत्पादन लागत बिक्री मूल्य से काफी अधिक हो चुकी है, जिससे वेंडर्स को लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है।
वेंडर्स का बड़ा दावा: 40% कारोबार पहले ही प्रभावित
रेलवे खान-पान लाइसेंसी वेलफेयर एसोसिएशन के अनुसार, देशभर में लगभग 20% से 30% ढाबे और फूड यूनिट पहले ही बंद हो चुके हैं। कई वेंडर्स ने अपनी यूनिट्स को 20% से 50% तक सरेंडर करने के लिए आवेदन भी दे दिया है।
एसोसिएशन का कहना है कि कोविड के बाद से ही कारोबार पूरी तरह से रिकवर नहीं हो पाया है, और अब ऊर्जा संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
पश्चिम एशिया संकट और महंगाई का कनेक्शन
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर पड़ा है। इसी कारण भारत में भी LPG और ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता देखी जा रही है।
इसका प्रभाव केवल घरेलू गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि कमर्शियल सप्लाई चेन पर भी पड़ा है, जिससे रेलवे जैसे बड़े सार्वजनिक नेटवर्क प्रभावित हो रहे हैं।
2012 से नहीं हुआ रेट रिवीजन
रेलवे वेंडर्स की सबसे बड़ी समस्या यह है कि खान-पान की दरें साल 2012 से अब तक लगभग स्थिर बनी हुई हैं, जिसमें चाय ₹5, पानी की बोतल और स्नैक्स जैसी वस्तुएं बेहद कम कीमतों पर ही बेची जा रही हैं और इस दौरान किसी भी तरह का आधिकारिक मूल्य संशोधन नहीं किया गया है। जबकि इसी अवधि में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है, क्योंकि LPG की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं, खाद्य सामग्री के दामों में लगातार बढ़ोतरी हुई है और कुल मिलाकर ऑपरेशनल कॉस्ट भी काफी हद तक बढ़ गई है, जिससे वेंडर्स के लिए मौजूदा रेट पर काम करना बेहद मुश्किल हो गया है।
सरकार से क्या मांग की जा रही है?
वेंडर्स और एसोसिएशन ने सरकार से निम्न मांगें रखी हैं:
- रेलवे फूड आइटम्स की दरों का तत्काल रिवीजन
- लाइसेंस फीस में अस्थायी राहत
- टैक्स स्ट्रक्चर में राहत
- महामारी जैसी स्थिति में विशेष छूट नीति
उनका कहना है कि अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ तो रेलवे फूड सप्लाई सिस्टम गंभीर संकट में आ सकता है।
निष्कर्ष: यात्रियों और वेंडर्स दोनों पर असर
₹3071 तक पहुंचा LPG सिलेंडर केवल एक कीमत का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक बड़े आर्थिक दबाव का संकेत है। इसका सीधा असर रेलवे जैसे विशाल सार्वजनिक सिस्टम पर पड़ रहा है, जहां करोड़ों यात्री रोजाना निर्भर हैं।
अगर सरकार और रेलवे प्रशासन जल्द ही रेट रिवीजन और नीति सुधार नहीं करता, तो आने वाले समय में न सिर्फ वेंडर्स का कारोबार प्रभावित होगा, बल्कि यात्रियों को भी महंगे और सीमित विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है।
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