प्रधानमंत्री Narendra Modi 15 मई को चार यूरोपीय देशों की पांच दिवसीय यात्रा पर रवाना होने वाले हैं, लेकिन इस दौरे का सबसे अहम पड़ाव यूरोप नहीं बल्कि खाड़ी देश United Arab Emirates माना जा रहा है। मोदी कुछ घंटों के लिए यूएई में रुकेंगे, जहां भारत और यूएई के बीच ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े दो महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। इन समझौतों का संबंध एलपीजी सप्लाई और स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व से बताया जा रहा है।
यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई पर दबाव बढ़ा है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।
सिर्फ स्टॉपओवर नहीं, भारत की एनर्जी रणनीति का हिस्सा
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी का यूएई में लगभग तीन घंटे का ठहराव पूरी तरह ऊर्जा सुरक्षा पर केंद्रित रहेगा। माना जा रहा है कि इस दौरान दोनों देशों के बीच एलपीजी सप्लाई को लेकर दीर्घकालिक समझौता और भारत के स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व को मजबूत करने से जुड़ी साझेदारी पर चर्चा हो सकती है।
भारत पिछले कुछ वर्षों से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब ईरान संघर्ष ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। यही वजह है कि यूएई अब भारत की ऊर्जा रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनता जा रहा है।
क्यों अहम है यूएई?
United Arab Emirates भारत के लिए सिर्फ एक खाड़ी सहयोगी नहीं बल्कि एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार भी है। यूएई भारत के लिए कच्चे तेल का चौथा सबसे बड़ा सप्लायर है। इसके अलावा एलपीजी और एलएनजी सप्लाई में भी उसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में यूएई की सबसे बड़ी ताकत उसका फुजैरा पोर्ट है। दरअसल, ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, लेकिन यूएई ने गल्फ ऑफ ओमान स्थित फुजैरा पोर्ट के जरिए तेल निर्यात जारी रखा है। यही कारण है कि अप्रैल में जहां कई खाड़ी देशों का उत्पादन प्रभावित हुआ, वहीं यूएई का निर्यात अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा।
यही वजह है कि भारत अब यूएई के साथ लंबी अवधि की ऊर्जा साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है ताकि वैश्विक संकट की स्थिति में सप्लाई बाधित न हो।
भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन चुका है ऊर्जा संकट?
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को ढाई महीने से अधिक समय हो चुका है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है। इससे भारत की तेल आयात लागत बढ़ी है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ता है क्योंकि:
- पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं
- सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ता है
- महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है
- चालू खाता घाटा प्रभावित होता है
- रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ सकता है
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से पेट्रोल और डीजल बचाने की अपील भी की थी। इसे सरकार की बढ़ती चिंता के संकेत के तौर पर देखा गया।
स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत लंबे समय से अपने स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व को मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि वैश्विक सप्लाई अचानक बाधित हो जाए तो देश के पास कुछ हफ्तों तक का तेल भंडार उपलब्ध रहे।
माना जा रहा है कि यूएई के साथ होने वाला संभावित समझौता इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे भारत को भविष्य में सस्ते दाम पर तेल स्टोर करने और संकट के समय सप्लाई बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर भारत यूएई के साथ दीर्घकालिक एलपीजी और क्रूड सप्लाई व्यवस्था मजबूत करता है तो घरेलू बाजार में एलपीजी संकट और कीमतों में अचानक उछाल का जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यूएई बढ़ा रहा है तेल उत्पादन
यूएई फिलहाल रोजाना लगभग 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल तेल उत्पादन कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश अगले साल तक उत्पादन क्षमता को 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की तैयारी में है।
विशेष बात यह है कि यूएई ने हाल के समय में ओपेक प्लस की उत्पादन सीमाओं से अलग अपनी स्वतंत्र रणनीति अपनाने के संकेत दिए हैं। इससे भारत जैसे आयातक देशों को भविष्य में अधिक स्थिर सप्लाई मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
भारत-यूएई रिश्तों का आर्थिक महत्व
भारत और यूएई के रिश्ते अब सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सहयोग तेजी से बढ़ा है। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।
यूएई में 45 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जो इसे भारतीय प्रवासियों के लिए सबसे बड़े केंद्रों में से एक बनाता है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्तों को भारत की विदेश नीति में रणनीतिक महत्व दिया जाता है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी यूएई के राष्ट्रपति Mohamed bin Zayed Al Nahyan के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग और आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
क्या भारत को मिलेगी राहत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत और यूएई के बीच प्रस्तावित समझौते सफल रहते हैं तो इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। एलपीजी सप्लाई स्थिर रहने से घरेलू बाजार में दबाव कम हो सकता है। साथ ही स्ट्रैटजिक रिजर्व मजबूत होने से वैश्विक संकट का असर सीमित किया जा सकेगा।
हालांकि, पूरी राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया का तनाव कितने समय तक जारी रहता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट में हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। ऐसे में भारत के लिए यूएई जैसे भरोसेमंद साझेदारों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
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