नई दिल्ली, 14 अप्रैल:
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने सोमवार को ‘नारी शक्ति वंदन’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संकेत दिया कि भारत 21वीं सदी के सबसे बड़े फैसलों में से एक लेने जा रहा है, जो महिलाओं को समर्पित होगा। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि संसद जल्द ही ऐसा कदम उठाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई गति मिल सकती है।
हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) जैसे दो अलग-अलग मुद्दों को एक साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति बन रही है।
पीएम मोदी का संदेश: “संसद नया इतिहास रचने के करीब”
Narendra Modi ने अपने संबोधन में कहा कि देश दशकों से जिस फैसले का इंतजार कर रहा था, वह अब पूरा होने के करीब है। उनके अनुसार, यह केवल एक विधायी बदलाव नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
प्रधानमंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि सामाजिक न्याय केवल नारे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे शासन की कार्यप्रणाली का हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें और अपने जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद करें।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: क्या है इसका महत्व
प्रधानमंत्री ने 2023 में पारित Nari Shakti Vandan Act का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून महिलाओं के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करता है।
यह अधिनियम लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण के मुद्दे को कानूनी रूप देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। हालांकि, इसके लागू होने की समयसीमा और प्रक्रिया को लेकर अब भी स्पष्टता और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता बनी हुई है।
महिला आरक्षण का लंबा इतिहास
भारत में महिलाओं के लिए विधायिकाओं में आरक्षण की मांग नई नहीं है। यह मुद्दा पिछले कई दशकों से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है, लेकिन विभिन्न सरकारों के दौरान इसे लागू करने में कई तरह की बाधाएं सामने आईं।
2023 में इस अधिनियम के पारित होने के बाद उम्मीद जगी थी कि अब महिलाओं की भागीदारी को संस्थागत रूप से बढ़ावा मिलेगा। लेकिन इसके क्रियान्वयन को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के कारण यह मुद्दा फिर से जटिल हो गया है।
परिसीमन (Delimitation) क्या है और विवाद क्यों?
परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या तय करना। भारत में आखिरी बार व्यापक परिसीमन 2008 में हुआ था।
यदि अब नए सिरे से परिसीमन होता है, तो कई राज्यों में सीटों की संख्या बदल सकती है। यही कारण है कि यह मुद्दा संवेदनशील बन गया है, क्योंकि इससे राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
विपक्ष का आरोप: “दो अलग मुद्दों को मिलाया जा रहा”
तेलंगाना के मुख्यमंत्री A. Revanth Reddy ने इस मुद्दे पर सरकार की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महिला आरक्षण और परिसीमन को एक साथ जोड़ना सही नहीं है, क्योंकि दोनों के प्रभाव अलग-अलग हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से पेश कर रही है और विपक्ष को महिला आरक्षण के खिलाफ दिखाने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, महिला आरक्षण का समर्थन सभी दल करते हैं, लेकिन परिसीमन को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं।
दक्षिण बनाम उत्तर बहस: प्रतिनिधित्व का सवाल
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि इससे उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है।
A. Revanth Reddy ने कहा कि यदि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों को अपेक्षाकृत कम लाभ होगा।
इस मुद्दे पर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने केंद्र सरकार से विस्तृत चर्चा की मांग भी की है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी: जमीनी स्तर से संसद तक
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि देश में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि लाखों महिलाएं पंचायत और स्थानीय निकायों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं और कई राज्यों में उनकी भागीदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
उन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि यह भागीदारी स्थानीय स्तर से आगे बढ़कर संसद और विधानसभाओं तक पहुंचे।
आर्थिक और सामाजिक असर: क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह मुद्दा केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। अगर महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो इसका असर नीति निर्माण पर भी पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय और घरेलू अध्ययनों में यह सामने आया है कि जहां महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बेहतर फैसले लिए जाते हैं।
इसलिए महिला आरक्षण को केवल राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का माध्यम भी माना जा रहा है।
असली चुनौती: सहमति कैसे बने?
दरअसल, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे जटिल मुद्दों पर राजनीतिक सहमति कैसे बनाई जाए।
एक तरफ सरकार इसे ऐतिहासिक फैसला बताकर आगे बढ़ाना चाहती है, वहीं विपक्ष यह सुनिश्चित करना चाहता है कि इससे किसी क्षेत्र या राज्य के साथ असमानता न हो।
यही कारण है कि आने वाले संसद सत्र में इस मुद्दे पर गहन बहस होने की संभावना है।
आगे क्या?
16 अप्रैल से शुरू होने वाला संसद का विशेष सत्र इस पूरे मुद्दे के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
इस दौरान यह स्पष्ट होगा कि सरकार इस प्रस्ताव को किस रूप में आगे बढ़ाती है और क्या विपक्ष के साथ किसी तरह की सहमति बन पाती है।
देशभर की निगाहें अब इसी पर टिकी हैं कि यह बहुप्रतीक्षित फैसला किस दिशा में जाता है।
निष्कर्ष
“नारी शक्ति को समर्पित बड़े फैसले” का संकेत भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत हो सकता है।
हालांकि, महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों को लेकर उठ रहे सवाल यह बताते हैं कि यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी।
अगर इस पर व्यापक सहमति बनती है, तो यह न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है।
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