नई दिल्ली। देश में दालों की पैदावार में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद बाजार में कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बनी हुई हैं। सरकारी हस्तक्षेप और बफर स्टॉक बढ़ने के बाद भी तुअर, चना, उड़द, मसूर और मूंग जैसी प्रमुख दालें MSP से 4% से 14% तक कम कीमत पर बिक रही हैं।
यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए दाल उत्पादन को लगातार प्रोत्साहित कर रही है।
MSP से नीचे चल रही प्रमुख दालों की कीमतें
मंडियों से मिले ताज़ा आंकड़ों के अनुसार दालों के भाव MSP स्तर से लगातार नीचे बने हुए हैं।
- चना: ₹5200 प्रति क्विंटल (MSP ₹5875)
- तुअर: लगभग 6% नीचे
- मसूर: करीब 11% कम
- उड़द: लगभग 4% कम
- मूंग: कमजोर मांग के कारण दबाव में
दाल उत्पादन का लगभग 50% हिस्सा चने से आता है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में पर्याप्त मांग नहीं दिख रही है।
क्यों गिर रहे हैं दालों के दाम?
विशेषज्ञों के अनुसार कीमतों में गिरावट के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं:
1. अधिक उत्पादन और आवक
इस साल अनुकूल कृषि परिस्थितियों और बढ़े हुए रकबे के कारण उत्पादन में तेज वृद्धि हुई है।
2. कमजोर मांग
घरेलू स्तर पर खपत स्थिर है, लेकिन बढ़ती आपूर्ति के मुकाबले मांग कम पड़ रही है।
3. बफर स्टॉक का दबाव
सरकार के पास पहले से ही भारी स्टॉक मौजूद है, जिससे बाजार में अतिरिक्त सप्लाई बनी हुई है।
सरकार के पास 26.9 लाख टन दालों का बफर स्टॉक
उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार सरकारी एजेंसियों — NAFED और NCCF — के पास भारी मात्रा में दालों का स्टॉक मौजूद है:
- चना: 11 लाख टन
- तुअर: 7.5 लाख टन
- मसूर: 3.6 लाख टन
- मूंग: 4 लाख टन
- उड़द: 33,402 टन
सरकार का उद्देश्य इस स्टॉक के जरिए बाजार में कीमतों को स्थिर रखना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को मजबूत करना है।
राज्यों को सरकार की सलाह
सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे:
- PM-POSHAN
- ICDS
- Public Distribution System
जैसी योजनाओं के लिए दालें खुले बाजार से न खरीदें, बल्कि केंद्रीय बफर स्टॉक से लें।
इससे:
- खरीद लागत घटेगी
- सरकारी स्टॉक का बेहतर उपयोग होगा
- लंबी टेंडर प्रक्रिया से बचा जा सकेगा
दालों के दाम किस पर निर्भर करेंगे?
कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह गिरावट स्थायी नहीं है।
मयूर ग्लोबल कॉर्पोरेशन के हर्षा राय के अनुसार:
“कीमतों में यह दबाव अस्थायी है। जैसे ही आवक कम होगी, बाजार में सुधार देखने को मिलेगा।”
विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में दालों की कीमतें मुख्य रूप से इन कारकों पर निर्भर करेंगी:
- मानसून की स्थिति
- खरीफ उत्पादन
- सरकारी खरीद नीति
- आयात-निर्यात संतुलन
कृषि और महंगाई पर असर
दालें भारतीय खाद्य महंगाई (CPI) का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए:
- कीमतों में गिरावट से उपभोक्ताओं को राहत मिलती है
- लेकिन किसानों की आय पर दबाव बढ़ता है
- सरकार को MSP और बाजार संतुलन बनाए रखने में चुनौती आती है
निष्कर्ष
दालों के बाजार में मौजूदा स्थिति एक सप्लाई-साइड ओवरहैंग को दर्शाती है, जहां उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन मांग उसी गति से नहीं बढ़ी। सरकार का बफर स्टॉक हस्तक्षेप फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने में सफल नहीं दिख रहा है।
आने वाले महीनों में मानसून और सरकारी खरीद नीति यह तय करेगी कि दालों का बाजार स्थिर होता है या और दबाव में जाता है।
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