EPF Retirement Investment: रिटायरमेंट के बाद EPF की बड़ी रकम को सिर्फ एक जगह रखने के बजाय SCSS, डेट फंड, बैंक FD और सीमित इक्विटी में संतुलित तरीके से निवेश किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक सही एसेट एलोकेशन और SWP जैसी रणनीति से नियमित आय के साथ महंगाई से बचाव भी किया जा सकता है।
रिटायरमेंट के समय नौकरी से मिलने वाली नियमित सैलरी बंद हो जाती है, लेकिन घर का खर्च, मेडिकल जरूरतें, बच्चों या परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियां और महंगाई जारी रहती है। ऐसे में Employees’ Provident Fund यानी EPF में जमा रकम को सिर्फ सुरक्षित रखना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि इस कॉर्पस से लंबे समय तक नियमित आय भी तैयार की जाए।
कई सैलरीड कर्मचारियों के लिए EPF रिटायरमेंट कॉर्पस का बड़ा हिस्सा होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि रिटायरमेंट के बाद इस रकम को कहां निवेश किया जाए? क्या पूरा पैसा सुरक्षित निवेश में रखा जाए या महंगाई से मुकाबला करने के लिए कुछ हिस्सा इक्विटी में भी लगाया जाए? एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसका जवाब व्यक्ति की उम्र, खर्च, जोखिम लेने की क्षमता और कुल कॉर्पस पर निर्भर करता है।
रिटायरमेंट के बाद EPF पर ब्याज का क्या होता है?
रिटायरमेंट के बाद EPF बैलेंस पर ब्याज को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक EPF से जुड़ी ब्याज व्यवस्था में रिटायरमेंट की उम्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अगर कोई व्यक्ति 58 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो निर्धारित नियमों के तहत उसके EPF खाते में जमा रकम पर एक सीमित अवधि तक ब्याज मिलता रह सकता है। वहीं कम उम्र में रिटायरमेंट लेने की स्थिति में ब्याज का लाभ निर्धारित उम्र की सीमा तक ही मिलता है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति 57 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो ब्याज का लाभ निर्धारित सीमा तक मिल सकता है। इसी तरह 55 साल या 45 साल की उम्र में रिटायर होने वाले व्यक्ति के मामले में भी ब्याज की अवधि नियमों के अनुसार तय होती है।
इसलिए रिटायरमेंट के बाद लंबे समय तक केवल EPF बैलेंस पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे आय स्रोत तैयार करना जरूरी हो जाता है।
सिर्फ EPF पर निर्भर रहना क्यों सही नहीं?
रिटायरमेंट के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि निवेश सुरक्षित भी रहे और उससे नियमित कैश फ्लो भी आता रहे। EPF मुख्य रूप से रिटायरमेंट के लिए बचत बनाने का साधन है। यह जरूरी नहीं कि रिटायरमेंट के बाद आपकी हर महीने की आय की जरूरत को अकेले पूरा कर दे।
इसके अलावा महंगाई भी एक बड़ा जोखिम है। आज अगर किसी परिवार का मासिक खर्च 50,000 रुपये है, तो आने वाले 15-20 वर्षों में यही खर्च काफी ज्यादा हो सकता है। इसलिए पोर्टफोलियो में कुछ ऐसे निवेश भी होने चाहिए, जिनमें लंबे समय में पूंजी बढ़ने की संभावना हो।
SCSS और बैंक FD से बनाएं सुरक्षित आय
रिटायरमेंट के बाद पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर आय देने वाले साधनों में रखा जा सकता है। Senior Citizens’ Savings Scheme यानी SCSS ऐसे निवेशकों के लिए एक विकल्प है जो नियमित ब्याज आय और सरकारी समर्थन वाले साधन को प्राथमिकता देते हैं।
इसके अलावा बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट यानी FD भी रिटायरमेंट पोर्टफोलियो का हिस्सा हो सकता है। FD का फायदा यह है कि इसमें रिटर्न पहले से निर्धारित होता है और निवेश को समझना आसान होता है।
हालांकि किसी भी निवेश का चयन करने से पहले ब्याज दर, टैक्स, लॉक-इन अवधि और निकासी की शर्तों को समझना जरूरी है।
डेट फंड से मिल सकती है लिक्विडिटी
रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में डेट म्यूचुअल फंड भी भूमिका निभा सकते हैं। इनका इस्तेमाल उन निवेशकों के लिए किया जा सकता है जिन्हें अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले निवेश के साथ कुछ लिक्विडिटी चाहिए।
डेट निवेश से जरूरत के अनुसार पैसे निकालने की सुविधा मिल सकती है। हालांकि डेट फंड पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होते। इसलिए फंड का चयन करते समय क्रेडिट क्वालिटी, अवधि, ब्याज दर जोखिम और निवेशक की जरूरत को ध्यान में रखना चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद इक्विटी से पूरी तरह दूरी बनाना जरूरी नहीं
रिटायरमेंट के बाद कई निवेशक इक्विटी से पूरी तरह दूर रहना चाहते हैं। इसका कारण बाजार में होने वाला उतार-चढ़ाव है। लेकिन लंबी अवधि में इक्विटी से पूरी तरह बाहर रहने का दूसरा जोखिम महंगाई है।
अगर पूरा पैसा ऐसे साधनों में रखा जाए जहां रिटर्न महंगाई से थोड़ा ही ज्यादा हो, तो समय के साथ निवेश की वास्तविक क्रय शक्ति कम हो सकती है।
इसी वजह से विशेषज्ञ रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में सीमित इक्विटी रखने की सलाह देते हैं। जोखिम क्षमता के अनुसार लार्ज-कैप, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड जैसे विकल्पों के जरिए पोर्टफोलियो में 15-20 फीसदी तक इक्विटी का हिस्सा रखा जा सकता है।
यहां उद्देश्य तेज रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि लंबे समय में कॉर्पस को महंगाई से आगे बढ़ाने की कोशिश करना होता है।
3 करोड़ रुपये के कॉर्पस को कैसे बांट सकते हैं?
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास रिटायरमेंट के समय 3 करोड़ रुपये का कुल कॉर्पस है। ऐसे में पूरा पैसा एक ही साधन में लगाने के बजाय अलग-अलग एसेट क्लास में बांटने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
एक सामान्य उदाहरण के तौर पर पोर्टफोलियो को इस तरह व्यवस्थित किया जा सकता है:
- 40-50 फीसदी: EPF, SCSS, FD और अन्य फिक्स्ड इनकम साधन
- 30-35 फीसदी: डेट आधारित निवेश
- 15-20 फीसदी: इक्विटी, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड
- छोटा हिस्सा: इमरजेंसी फंड और तुरंत जरूरत के लिए लिक्विड पैसा
यह केवल एक उदाहरण है। वास्तविक एसेट एलोकेशन निवेशक की उम्र, मासिक खर्च, पेंशन, अन्य आय स्रोत, टैक्स स्थिति और जोखिम क्षमता के आधार पर अलग हो सकता है।
एकमुश्त EPF रकम को सीधे इक्विटी में लगाने से बचें
रिटायरमेंट के समय अगर बड़ी रकम हाथ में आती है, तो उसे एक साथ बाजार में निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है। खासकर तब जब बाजार ऊंचे स्तर पर हो।
ऐसी स्थिति में Systematic Transfer Plan यानी STP का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें बड़ी रकम को पहले अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले डेट या लिक्विड फंड में रखा जाता है और फिर एक निश्चित अवधि में धीरे-धीरे इक्विटी या हाइब्रिड फंड में ट्रांसफर किया जाता है।
उदाहरण के लिए, निवेशक 6 से 12 महीनों में चरणबद्ध तरीके से इक्विटी में पैसा ट्रांसफर कर सकता है। इससे एक ही दिन में पूरा निवेश करने का जोखिम कम किया जा सकता है।
हर महीने नियमित कमाई के लिए SWP
रिटायरमेंट के बाद नियमित कैश फ्लो तैयार करने के लिए Systematic Withdrawal Plan यानी SWP का इस्तेमाल किया जा सकता है।
SWP में निवेशक अपने म्यूचुअल फंड निवेश से तय अंतराल पर एक निश्चित रकम निकालता है। इस तरह निवेश से नियमित आय बनाई जा सकती है।
हालांकि SWP को इस तरह तय करना चाहिए कि हर साल निकाली जाने वाली रकम पोर्टफोलियो की लंबी अवधि की क्षमता के अनुरूप हो। जरूरत से ज्यादा निकासी करने पर बाजार में गिरावट के दौरान कॉर्पस तेजी से घट सकता है।
1-2 साल का खर्च अलग रखना समझदारी
रिटायरमेंट के बाद बाजार में गिरावट सबसे ज्यादा नुकसान तब कर सकती है जब निवेशक को गिरते बाजार में भी अपने खर्च के लिए इक्विटी बेचनी पड़े।
इस जोखिम को कम करने के लिए विशेषज्ञ आमतौर पर एक से दो साल के जरूरी खर्च के बराबर रकम सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध साधनों में रखने की रणनीति बताते हैं।
मान लीजिए किसी परिवार का मासिक खर्च 75,000 रुपये है। ऐसे में कम से कम 9-18 महीने के खर्च के बराबर रकम को अपेक्षाकृत सुरक्षित साधनों में रखने से बाजार में अस्थायी गिरावट के दौरान इक्विटी निवेश बेचने की जरूरत कम हो सकती है।
4-5 फीसदी सालाना निकासी का नियम
रिटायरमेंट पोर्टफोलियो से कितनी रकम हर साल निकाली जाए, यह भी बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार 4-5 फीसदी सालाना निकासी को एक सामान्य शुरुआती संदर्भ के तौर पर देखा जा सकता है, हालांकि यह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित या उपयुक्त दर नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति के पास 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो 4 फीसदी के हिसाब से सालाना निकासी करीब 12 लाख रुपये होगी। 5 फीसदी के हिसाब से यह रकम करीब 15 लाख रुपये सालाना होगी।
लेकिन बाजार का प्रदर्शन, महंगाई, निवेश अवधि, टैक्स और व्यक्ति के खर्च के अनुसार यह दर बदल सकती है। खासकर रिटायरमेंट के शुरुआती वर्षों में बाजार में बड़ी गिरावट होने पर ज्यादा निकासी से कॉर्पस पर दबाव बढ़ सकता है।
बकेट स्ट्रैटेजी से संभालें रिटायरमेंट कॉर्पस
रिटायरमेंट के बाद बकेट स्ट्रैटेजी भी उपयोगी हो सकती है। इसमें निवेश को अलग-अलग समय की जरूरतों के हिसाब से बांटा जाता है।
पहला बकेट: अगले 1-2 साल के खर्च के लिए सुरक्षित और लिक्विड निवेश।
दूसरा बकेट: अगले कुछ वर्षों की आय के लिए डेट और अन्य अपेक्षाकृत स्थिर निवेश।
तीसरा बकेट: लंबी अवधि के लिए इक्विटी और ग्रोथ आधारित निवेश।
इस रणनीति से बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान लंबी अवधि वाले निवेश को तुरंत बेचने की जरूरत कम हो सकती है।
EPF के पैसे का निवेश करते समय इन गलतियों से बचें
रिटायरमेंट कॉर्पस को संभालते समय कुछ आम गलतियों से बचना जरूरी है।
पूरा पैसा एक जगह न लगाएं: एक ही निवेश साधन पर निर्भर रहने से जोखिम बढ़ सकता है।
पूरे पैसे को इक्विटी में न लगाएं: रिटायरमेंट के बाद नियमित आय की जरूरत होती है, इसलिए जोखिम क्षमता के अनुसार ही इक्विटी रखें।
इक्विटी से पूरी तरह बाहर भी न रहें: लंबी अवधि में महंगाई को मात देने के लिए कुछ ग्रोथ एसेट उपयोगी हो सकते हैं।
बहुत ज्यादा SWP न करें: जरूरत से ज्यादा निकासी से रिटायरमेंट कॉर्पस तेजी से घट सकता है।
इमरजेंसी फंड रखें: मेडिकल या अन्य अचानक आने वाले खर्चों के लिए अलग रकम रखना जरूरी है।
निष्कर्ष
रिटायरमेंट के बाद EPF की रकम का लक्ष्य सिर्फ पूंजी को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि सुरक्षा, नियमित आय, लिक्विडिटी और महंगाई से बचाव के बीच संतुलन बनाना होना चाहिए।
SCSS और FD जैसे साधनों से स्थिर आय, डेट निवेश से लिक्विडिटी और सीमित इक्विटी से लंबी अवधि की ग्रोथ हासिल करने की कोशिश की जा सकती है। वहीं SWP और बकेट स्ट्रैटेजी के जरिए बड़े रिटायरमेंट कॉर्पस को नियमित कैश फ्लो में बदला जा सकता है।
हालांकि किसी भी व्यक्ति के लिए 40-50 फीसदी या 15-20 फीसदी जैसा एक तय फॉर्मूला हर परिस्थिति में सही नहीं होता। निवेश से पहले अपनी उम्र, खर्च, अन्य आय, टैक्स और जोखिम क्षमता का आकलन करना जरूरी है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में निवेश से जुड़ी रणनीतियों और विशेषज्ञों के विचारों को सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। निवेश बाजार जोखिम के अधीन हैं। किसी भी निवेश का फैसला लेने से पहले SEBI-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार या योग्य वित्तीय विशेषज्ञ से अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार सलाह जरूर लें।


