Crude Oil Price Today: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव जारी है। मई 2026 की शुरुआत में जहां ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड में तेज उछाल देखने को मिला, वहीं अब कीमतों में कुछ नरमी आई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता अभी भी भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार इस समय अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। गुरुवार, 14 मई 2026 को कच्चे तेल की कीमत लगभग 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करती दिखी। बाजार के आंकड़ों के अनुसार क्रूड ऑयल का भाव 106.20 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा, जो पिछले सत्र की तुलना में 0.27 डॉलर अधिक है। हालांकि महीने की शुरुआत की तुलना में तेल की कीमतों में कुछ गिरावट दर्ज की गई है।
मई 2026 के दौरान कच्चे तेल में बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। 4 मई को क्रूड ऑयल की कीमत 113.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो इस महीने का सबसे ऊंचा स्तर रहा। इसके बाद बाजार में मुनाफावसूली, सप्लाई आशंकाओं में थोड़ी राहत और वैश्विक मांग को लेकर चिंता के कारण कीमतों में गिरावट देखने को मिली। 7 मई को कच्चा तेल 100.63 डॉलर तक फिसल गया था। इसके बावजूद पूरे महीने में बाजार पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाया है।
क्यों बढ़ी थी कच्चे तेल की कीमत?
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल बाजार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण निवेशकों में यह डर पैदा हुआ कि कहीं वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित न हो जाए। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर भी बाजार में चिंता बढ़ी।
दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई इसी समुद्री रास्ते से होती है। यदि इस मार्ग पर किसी तरह का सैन्य या लॉजिस्टिक संकट पैदा होता है तो तेल की वैश्विक सप्लाई बाधित हो सकती है। यही वजह रही कि मई की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।
इसके अलावा ओपेक प्लस देशों की उत्पादन नीति भी बाजार को प्रभावित कर रही है। सऊदी अरब और रूस जैसे बड़े उत्पादक देशों ने पहले ही उत्पादन नियंत्रण की रणनीति अपनाई हुई है। इससे सप्लाई सीमित रहने की आशंका बनी हुई है।
अब कीमतों में नरमी क्यों आई?
विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती घबराहट के बाद बाजार ने कुछ राहत महसूस की है। कई देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग बढ़ाने के संकेत दिए हैं। वहीं अमेरिका में तेल उत्पादन मजबूत बना हुआ है।
इसके साथ ही वैश्विक आर्थिक वृद्धि को लेकर चिंता भी बढ़ी है। चीन, यूरोप और अमेरिका में औद्योगिक गतिविधियों की गति उम्मीद से कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है। यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है तो तेल की मांग भी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि मई के दूसरे सप्ताह में कीमतों में कुछ गिरावट देखने को मिली।
हालांकि बाजार विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि तेल की कीमतें अभी पूरी तरह सुरक्षित दायरे में नहीं पहुंची हैं। किसी भी नए सैन्य घटनाक्रम या सप्लाई व्यवधान से कीमतें फिर उछल सकती हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल का भाव?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
यदि कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती है तो:
- पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं
- परिवहन लागत बढ़ सकती है
- महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है
- सरकार का आयात बिल बढ़ सकता है
- रुपये पर दबाव आ सकता है
हाल के दिनों में रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। ऐसे में महंगे कच्चे तेल का दोहरा असर भारत पर पड़ सकता है क्योंकि तेल आयात डॉलर में होता है।
पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे?
फिलहाल सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। लेकिन ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि यदि वैश्विक तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत में ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार, रुपये की स्थिति, टैक्स और रिफाइनिंग लागत का संयुक्त असर पड़ता है। कई राज्यों में पहले से ही वैट ऊंचा है। ऐसे में यदि क्रूड महंगा बना रहता है तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल आम लोगों पर सीधा बोझ डालने से बचना चाहती है क्योंकि इससे महंगाई और उपभोक्ता खर्च दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। इसके प्रभाव कई उद्योगों तक पहुंचते हैं।
एविएशन सेक्टर
एटीएफ यानी विमान ईंधन महंगा होने से एयरलाइंस की लागत बढ़ती है। इससे हवाई किराए प्रभावित हो सकते हैं।
लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट
डीजल आधारित ट्रांसपोर्ट महंगा होने पर माल ढुलाई लागत बढ़ जाती है। इसका असर खाद्य वस्तुओं से लेकर ई-कॉमर्स तक पर पड़ सकता है।
केमिकल और प्लास्टिक इंडस्ट्री
कई पेट्रोकेमिकल उत्पाद सीधे कच्चे तेल पर आधारित होते हैं। तेल महंगा होने से इन उद्योगों की लागत भी बढ़ती है।
FMCG और कृषि
पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
क्या फिर 120 डॉलर तक जा सकता है तेल?
अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंक और ऊर्जा एजेंसियां फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या तेल सप्लाई प्रभावित होती है तो कीमतें फिर 110-120 डॉलर के दायरे में जा सकती हैं।
हालांकि दूसरी तरफ अमेरिका और अन्य देशों का उत्पादन बढ़ने की संभावना कीमतों को सीमित भी कर सकती है। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह तेल बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
भारत सरकार के सामने क्या चुनौती?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखना है। सरकार एक तरफ रूस, अमेरिका और मध्य-पूर्व के देशों से सस्ते विकल्प तलाश रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू महंगाई को नियंत्रण में रखना भी जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल कीमतों में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है तो सरकार को टैक्स कटौती, रणनीतिक तेल भंडार उपयोग और वैकल्पिक सप्लाई चैन जैसे कदमों पर विचार करना पड़ सकता है।
क्या आम लोगों को चिंता करनी चाहिए?
फिलहाल देश में तेल की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है और सरकार लगातार स्थिति पर नजर रख रही है। लेकिन वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता आने वाले महीनों में भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और उपभोक्ता खर्च पर असर डाल सकती है।
यही वजह है कि कच्चे तेल की हर छोटी-बड़ी हलचल अब केवल कमोडिटी बाजार की खबर नहीं रह गई है, बल्कि यह आम आदमी की जेब, सरकार की आर्थिक नीति और देश की ऊर्जा सुरक्षा से सीधे जुड़ा मुद्दा बन चुकी है।
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