नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बीच केंद्र सरकार ने डीजल और विमान ईंधन (ATF) के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार का यह कदम देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव के बीच घरेलू हितों की रक्षा के उद्देश्य से उठाया गया है।
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार नई दरें 16 जून से लागू हो गई हैं और 30 जून तक प्रभावी रहेंगी। हालांकि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर किसी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया गया है। इससे आम उपभोक्ताओं पर तत्काल कोई अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना नहीं है।
डीजल और ATF पर कितना बढ़ा टैक्स?
सरकार ने डीजल के निर्यात पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) को 13.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 14 रुपये प्रति लीटर कर दिया है। वहीं विमान ईंधन (ATF) के निर्यात पर यह शुल्क 9.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 12.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।
पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह पहले की तरह 1.5 रुपये प्रति लीटर बना हुआ है।
| ईंधन | पुरानी दर | नई दर |
|---|---|---|
| डीजल | ₹13.5 प्रति लीटर | ₹14 प्रति लीटर |
| ATF | ₹9.5 प्रति लीटर | ₹12.5 प्रति लीटर |
| पेट्रोल | ₹1.5 प्रति लीटर | ₹1.5 प्रति लीटर |
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य देश में डीजल और विमान ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अधिक होती हैं, तब तेल कंपनियां अधिक मुनाफे के लिए निर्यात बढ़ा सकती हैं। इससे घरेलू बाजार में आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा रहता है।
इसी स्थिति से बचने के लिए सरकार समय-समय पर विंडफॉल टैक्स में बदलाव करती है। वित्त मंत्रालय हर 15 दिन में इसकी समीक्षा करता है और वैश्विक तेल कीमतों के आधार पर नई दरें तय करता है।
क्या होता है विंडफॉल टैक्स?
विंडफॉल टैक्स वह अतिरिक्त कर होता है जो सरकार उन कंपनियों पर लगाती है जिन्हें अचानक और असामान्य रूप से अधिक मुनाफा होने लगता है। तेल और गैस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल आने पर कंपनियों को अतिरिक्त लाभ मिलता है। ऐसे में सरकार इस लाभ का एक हिस्सा कर के रूप में वसूलती है।
भारत ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के दौरान इस व्यवस्था को लागू किया था ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की कमी न हो और कीमतें नियंत्रण में बनी रहें।
ईरान-अमेरिका समझौते की खबर से गिरे तेल के दाम
सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली। इसकी प्रमुख वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की खबर रही। बाजार को उम्मीद है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है तो वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है, जिससे तेल की कीमतों पर दबाव रहेगा।
हालांकि मंगलवार को कीमतों में हल्की रिकवरी देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड 0.23 फीसदी की बढ़त के साथ 83.36 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। वहीं भारतीय बास्केट (Indian Basket Crude) की कीमत 6.89 फीसदी गिरकर 86.77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।
एयरलाइन और तेल कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर?
ATF पर निर्यात शुल्क बढ़ने से विमान ईंधन का निर्यात महंगा हो जाएगा। इससे तेल कंपनियों के निर्यात मार्जिन पर कुछ असर पड़ सकता है। वहीं डीजल निर्यात करने वाली कंपनियों को भी अतिरिक्त टैक्स देना होगा।
हालांकि घरेलू बाजार के लिए यह कदम सकारात्मक माना जा रहा है क्योंकि इससे देश में ईंधन की उपलब्धता मजबूत रहेगी और भविष्य में सप्लाई संबंधी जोखिम कम होंगे।
आगे क्या देखना होगा?
अब बाजार की नजर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और सरकार की अगली समीक्षा पर रहेगी। यदि वैश्विक कीमतों में और गिरावट आती है तो सरकार अगले पखवाड़े में विंडफॉल टैक्स की दरों में बदलाव कर सकती है। दूसरी ओर यदि पश्चिम एशिया में फिर से तनाव बढ़ता है तो सरकार घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए और सख्त कदम उठा सकती है।
फिलहाल सरकार का यह फैसला साफ संकेत देता है कि वह घरेलू ईंधन सुरक्षा और बाजार स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।


