Iran-US War Update: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा दावा सामने आया है। Financial Times की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और बढ़ाते हैं, तो तेहरान यूरोप में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने पर विचार कर सकता है। रिपोर्ट में ईरानी सरकार के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी यूरोप में मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाओं का आकलन संभावित लक्ष्यों के तौर पर किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बुल्गारिया और साइप्रस को लेकर ईरान की खास चिंता सामने आई है। बुल्गारिया के बेजमर एयर बेस पर अमेरिका के KC-135 टैंकर विमानों की अस्थायी तैनाती को लेकर ईरान पहले ही आपत्ति जता चुका है। वहीं साइप्रस में मौजूद ब्रिटिश सैन्य ठिकाने भी तेहरान की निगाह में हैं। जुलाई में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दोनों देशों के अधिकारियों से सैन्य ठिकानों के अमेरिकी इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई थी।
यूरोप में किन ठिकानों को लेकर बढ़ी चिंता?
Financial Times के अनुसार, ईरानी सैन्य अधिकारियों ने दक्षिण-पूर्वी यूरोप में अमेरिकी सैन्य सुविधाओं पर संभावित हमले के विकल्पों का आकलन किया है। इनमें बुल्गारिया की सैन्य सुविधाएं शामिल हैं। रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब बुल्गारिया ने अमेरिकी ईंधन भरने वाले विमानों के लिए बेजमर एयर बेस के इस्तेमाल की अनुमति दी है।
बुल्गारिया की संसद ने जुलाई में बेजमर एयर बेस पर आठ तक अमेरिकी KC-135 टैंकर विमानों और करीब 250 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की अस्थायी तैनाती को मंजूरी दी थी। हालांकि सोफिया ने स्पष्ट किया था कि वहां आक्रामक हथियार तैनात नहीं किए जाएंगे और इससे बुल्गारिया सीधे सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनता।
ईरान ने इसके बावजूद इसे गंभीरता से लिया है। तेहरान की ओर से पहले ही उन देशों को चेतावनी दी गई है जो ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए अपनी जमीन या सैन्य सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं।
साइप्रस भी क्यों बना संभावित निशाना?
ईरान की चिंता सिर्फ बुल्गारिया तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में साइप्रस का भी जिक्र किया गया है। वहां ब्रिटेन के दो संप्रभु सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें RAF Akrotiri सबसे महत्वपूर्ण है।
मार्च 2026 में इस ब्रिटिश एयर बेस के पास ड्रोन हमले हुए थे। ब्रिटिश और अन्य अधिकारियों ने उस समय इसे ईरान या ईरान समर्थित तत्वों से जोड़कर देखा था। बाद में ईरान की ओर से ब्रिटेन को चेतावनी भी दी गई कि यदि ब्रिटिश ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में होता है, तो उन्हें संभावित सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी संभावित लक्ष्य का आकलन किया जाना और वास्तव में उस पर हमला करने का फैसला होना अलग-अलग बातें हैं। अभी उपलब्ध रिपोर्ट में ईरान की ओर से यूरोप में किसी नए हमले का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।
होर्मुज की समुद्री इंटरनेट केबल भी निशाने पर?
रिपोर्ट में एक और गंभीर संभावना का उल्लेख किया गया है। ईरानी सैन्य बलों ने होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्र के नीचे मौजूद फाइबर-ऑप्टिक केबलों को निशाना बनाने की संभावना का भी आकलन किया है।
ये केबल अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट और डेटा संचार के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर इनमें बड़े स्तर पर व्यवधान पैदा होता है, तो इसका असर केवल सैन्य संचार पर नहीं बल्कि वैश्विक इंटरनेट और डेटा ट्रैफिक पर भी पड़ सकता है। Financial Times के मुताबिक, इस तरह के विकल्पों पर विचार करना तेहरान की रणनीति के विस्तार को दर्शाता है।
ईरान पहले भी यूरोप से बाहर लंबी दूरी का लक्ष्य साध चुका है
ईरान की लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता को लेकर चिंता मार्च में भी सामने आई थी। उस दौरान ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया में अमेरिकी-ब्रिटिश सैन्य अड्डे की दिशा में बैलिस्टिक मिसाइलें दागने की कोशिश की थी। मिसाइलें अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचीं, लेकिन इस घटना ने ईरान की संभावित लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को लेकर यूरोप में चिंता बढ़ा दी।
डिएगो गार्सिया ईरान से करीब 4,000 किलोमीटर दूर है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस घटना से यह संकेत मिला कि ईरान की मिसाइल क्षमता उसके पारंपरिक क्षेत्रीय दायरे से आगे भी खतरा पैदा कर सकती है, हालांकि लंबी दूरी पर सटीक और बड़े पैमाने पर हमला करने की उसकी क्षमता अभी सीमित मानी जाती है।
क्या ईरान यूरोप पर बड़े पैमाने पर हमला कर सकता है?
यही इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है। विशेषज्ञों का आकलन है कि ईरान के पास लंबी दूरी तक हमला करने की कुछ क्षमता जरूर है, लेकिन पूरे यूरोप में बड़े पैमाने पर सैन्य लक्ष्यों को लगातार निशाना बनाने की उसकी क्षमता सीमित है।
इसका मतलब यह नहीं है कि यूरोप को खतरे को नजरअंदाज करना चाहिए। बल्कि चिंता इस बात की है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष दोबारा बड़े स्तर पर बढ़ता है, तो ईरान अपने जवाब को मध्य पूर्व तक सीमित रखने के बजाय अमेरिकी सैन्य नेटवर्क से जुड़े दूर के ठिकानों को भी निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव क्यों फिर बढ़ रहा है?
अमेरिका और ईरान के बीच हालिया तनाव के पीछे युद्धविराम और बातचीत के प्रयासों के कमजोर पड़ने की भूमिका अहम है। Financial Times की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान में कई लोग फिर से बड़े सैन्य टकराव की आशंका को गंभीरता से ले रहे हैं। ऐसे माहौल में ईरानी सुरक्षा और सैन्य प्रतिष्ठान अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के दायरे को बढ़ाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
इसी बीच, ईरान ने उन यूरोपीय देशों पर दबाव बढ़ाया है जिनके सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल अमेरिका कर सकता है। जुलाई में ईरानी विदेश मंत्री ने बुल्गारिया और साइप्रस दोनों से इस मुद्दे पर बातचीत की थी।
यूरोप के लिए क्या है सबसे बड़ा खतरा?
फिलहाल सबसे बड़ा खतरा सीधे तौर पर पूरे यूरोप पर मिसाइलों की बौछार से ज्यादा क्षेत्रीय युद्ध के फैलने का है। अगर अमेरिकी सैन्य अभियान बढ़ता है और ईरान यूरोप में अमेरिकी ठिकानों को जवाबी कार्रवाई का हिस्सा बनाता है, तो NATO देशों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा साइबर हमले, ड्रोन हमले, समुद्री बुनियादी ढांचे को नुकसान और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े ऊर्जा एवं संचार मार्गों में व्यवधान जैसी घटनाएं भी संघर्ष का दायरा बढ़ा सकती हैं।
फिलहाल यूरोप में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की बात एक संभावित ईरानी विकल्प के रूप में सामने आई है, न कि किसी घोषित सैन्य अभियान के रूप में। लेकिन अगर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव फिर बड़े युद्ध में बदलता है, तो इसका असर मध्य पूर्व से निकलकर यूरोप तक पहुंचने की आशंका जरूर बढ़ सकती है।


