भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दूध पैदा करने वाला देश है। देश का डेयरी सेक्टर करोड़ों किसानों की आजीविका का आधार है और लगातार बढ़ते उत्पादन के साथ भारत की वैश्विक डेयरी पावर के रूप में स्थिति भी मजबूत हो रही है। इसके बावजूद एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है। दुनिया के कुल दूध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है, लेकिन ग्लोबल मिल्क एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी आधी फीसदी से भी कम है।
यानी भारत दूध उत्पादन में दुनिया में नंबर-1 है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय डेयरी कारोबार में उसकी मौजूदगी बेहद सीमित है। यही अंतर अब नीति-निर्माताओं और डेयरी उद्योग के लिए बड़ा सवाल बन गया है कि आखिर इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता का फायदा भारत वैश्विक बाजार में क्यों नहीं उठा पा रहा है?
भारत में लगातार बढ़ रहा है दूध उत्पादन
भारत का दूध उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में देश में करीब 210 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ था, जो 2024-25 तक बढ़कर लगभग 248 मिलियन टन पहुंच गया।
भारत की सबसे बड़ी ताकत इसका विशाल घरेलू बाजार भी है। देश में पैदा होने वाले दूध का बड़ा हिस्सा घरेलू खपत में ही इस्तेमाल हो जाता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दूध तथा डेयरी उत्पादों की मांग लगातार बनी हुई है।
2023-24 में ग्रामीण भारत में दूध की प्रति व्यक्ति मासिक खपत लगभग 5.085 लीटर थी, जबकि शहरी इलाकों में यह करीब 5.686 लीटर रही। हालांकि वैश्विक तुलना में भारत की प्रति व्यक्ति खपत अभी भी कई विकसित डेयरी बाजारों से काफी कम है।
मसलन, डेनमार्क में प्रति व्यक्ति सालाना दूध की खपत करीब 395.68 किलोग्राम बताई जाती है। इससे पता चलता है कि भारत के सामने केवल एक्सपोर्ट बढ़ाने की ही संभावना नहीं है, बल्कि घरेलू डेयरी बाजार में भी मांग बढ़ने की काफी गुंजाइश है।
2026 में भी मजबूत रहेगी भारत की स्थिति
अमेरिकी कृषि विभाग यानी USDA के अनुमान के मुताबिक 2026 में भारत दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में गाय के दूध का उत्पादन 2025 के लगभग 103.2 मिलियन टन से बढ़कर 2026 में 105.4 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं दूध देने वाली गायों की संख्या करीब 62.5 मिलियन तक पहुंच सकती है।
घरेलू स्तर पर 2026 में तरल दूध की खपत करीब 93 मिलियन टन रहने का अनुमान है। इसके अलावा प्रोसेस्ड डेयरी उत्पादों का बाजार भी बढ़ रहा है।
मक्खन का उत्पादन 2026 में करीब 7.44 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि 2025 में यह लगभग 7.19 मिलियन टन था। घरेलू मक्खन खपत भी करीब 7.39 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है।
इससे साफ है कि भारत के पास उत्पादन और घरेलू मांग दोनों का मजबूत आधार मौजूद है। फिर भी वैश्विक एक्सपोर्ट मार्केट में भारत पीछे है।
100 अरब डॉलर के ग्लोबल डेयरी बाजार में भारत कहां?
2025 में ग्लोबल मिल्क एक्सपोर्ट की वैल्यू करीब 36.4 अरब डॉलर रही। अगर दूध के साथ अन्य प्रमुख डेयरी उत्पादों को भी शामिल किया जाए तो वैश्विक डेयरी ट्रेड का आकार करीब 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाता है।
दूध के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, बेल्जियम और अमेरिका जैसे देश सबसे आगे हैं। 2025 में इन पांच देशों की संयुक्त हिस्सेदारी ग्लोबल मिल्क एक्सपोर्ट में 53 फीसदी से ज्यादा थी।
वहीं भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक होने के बावजूद इस बाजार में बहुत छोटी हिस्सेदारी रखता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में उत्पादित अधिकांश दूध देश के भीतर ही खप जाता है।
दुनिया के प्रमुख दूध निर्यातक
| रैंक | देश | दूध निर्यात मूल्य | वैश्विक हिस्सेदारी |
|---|---|---|---|
| 1 | न्यूजीलैंड | $7.7 अरब | 21.2% |
| 2 | नीदरलैंड | $3.5 अरब | 9.5% |
| 3 | जर्मनी | $3.3 अरब | 9.2% |
| 4 | बेल्जियम | $2.6 अरब | 7.2% |
| 5 | अमेरिका | $2.3 अरब | 6.3% |
| 6 | फ्रांस | $2.0 अरब | 5.6% |
| 7 | पोलैंड | $1.3 अरब | 3.5% |
| 8 | ऑस्ट्रेलिया | $1.2 अरब | 3.4% |
| 9 | यूनाइटेड किंगडम | $968.8 मिलियन | 2.7% |
| 10 | आयरलैंड | $926.4 मिलियन | 2.5% |
यह आंकड़ा भारत के सामने मौजूद अवसर को दिखाता है। उत्पादन के मामले में भारत शीर्ष पर है, लेकिन एक्सपोर्ट वैल्यू में वह प्रमुख निर्यातक देशों से काफी पीछे है।
असली चुनौती सिर्फ उत्पादन नहीं, क्वालिटी और प्रोडक्टिविटी है
भारत के डेयरी सेक्टर की संरचना दुनिया के कई विकसित डेयरी बाजारों से अलग है। भारत में करीब 80 मिलियन छोटे और सीमांत किसान डेयरी गतिविधियों से जुड़े हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है जिनके पास केवल कुछ पशु हैं।
दूसरी तरफ विकसित देशों में डेयरी उत्पादन का बड़ा हिस्सा बड़े कमर्शियल फार्मों से आता है। इसका सीधा असर उत्पादन की लागत, क्वालिटी कंट्रोल, प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट क्षमता पर पड़ता है।
यही वजह है कि भारत के लिए केवल दूध का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। अगर देश को ग्लोबल डेयरी एक्सपोर्ट में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करनी है तो प्रति पशु उत्पादकता, दूध की गुणवत्ता, फूड सेफ्टी, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर एक साथ काम करना होगा।
FTA से खुल सकते हैं ग्लोबल बाजार के दरवाजे
भारत ने हाल के वर्षों में कई देशों और व्यापारिक समूहों के साथ Free Trade Agreements यानी FTAs पर जोर बढ़ाया है। लेकिन डेयरी सेक्टर को लेकर भारत का रुख काफी सतर्क रहा है।
इसकी वजह साफ है। अगर सस्ते विदेशी डेयरी उत्पाद बड़ी मात्रा में भारत में आने लगते हैं तो घरेलू दूध की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। इसका सीधा असर छोटे किसानों की आय पर पड़ सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को FTA के मामले में संतुलित रणनीति अपनाने की जरूरत है। शॉर्ट टर्म में घरेलू किसानों को अचानक बढ़ने वाले आयात से सुरक्षा दी जानी चाहिए, लेकिन लॉन्ग टर्म में इन्हीं व्यापार समझौतों का इस्तेमाल भारतीय डेयरी सेक्टर को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में किया जा सकता है।
कैसे ग्लोबल डेयरी पावर बन सकता है भारत?
भारत के लिए अगला बड़ा लक्ष्य केवल ज्यादा दूध पैदा करना नहीं बल्कि ज्यादा मूल्य वाले डेयरी उत्पादों का निर्यात बढ़ाना होना चाहिए।
इसके लिए कई स्तरों पर सुधार की जरूरत होगी।
1. प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ाना
भारत में बड़ी संख्या में पशु होने के बावजूद प्रति पशु उत्पादकता को और बढ़ाने की गुंजाइश है। वैज्ञानिक ब्रीडिंग, बेहतर जेनेटिक्स, संतुलित पशु आहार और बेहतर पोषण के जरिए इसमें सुधार किया जा सकता है।
2. पशु स्वास्थ्य पर ज्यादा निवेश
प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, वैक्सीनेशन, बीमारी की समय पर पहचान और बेहतर डिजीज मैनेजमेंट से पशुओं की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। स्वस्थ पशु लंबे समय तक बेहतर उत्पादन दे सकते हैं।
3. कोल्ड चेन और मिल्क कलेक्शन मजबूत करना
डेयरी एक्सपोर्ट के लिए दूध की गुणवत्ता को उत्पादन केंद्र से प्रोसेसिंग प्लांट और फिर पोर्ट तक बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए आधुनिक मिल्क कलेक्शन सेंटर, चिलिंग यूनिट और मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क की जरूरत होगी।
4. प्रोसेस्ड डेयरी उत्पादों पर फोकस
भारत अगर केवल तरल दूध के बजाय चीज, बटर, मिल्क पाउडर, व्हे, प्रोटीन आधारित उत्पाद और अन्य वैल्यू-एडेड डेयरी प्रोडक्ट्स पर ध्यान देता है तो एक्सपोर्ट से ज्यादा कमाई की संभावना बन सकती है।
5. इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड
ग्लोबल बाजार में जगह बनाने के लिए इंटरनेशनल क्वालिटी सर्टिफिकेशन, रेसिड्यू मॉनिटरिंग, फूड सेफ्टी और डिजिटल ट्रेसेबिलिटी बेहद महत्वपूर्ण हैं। विदेशी खरीदारों के लिए केवल कम कीमत पर्याप्त नहीं होती, उन्हें लगातार एक जैसी क्वालिटी और सुरक्षित उत्पाद चाहिए।
किसानों की सुरक्षा और एक्सपोर्ट, दोनों जरूरी
डेयरी सेक्टर में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ देश को अपने करोड़ों छोटे किसानों की आय और आजीविका की रक्षा करनी है, तो दूसरी तरफ भारतीय डेयरी कंपनियों को ग्लोबल बाजार में प्रतिस्पर्धा करने लायक भी बनाना है।
अगर अचानक आयात खोल दिया गया तो इसका असर घरेलू दूध की कीमतों और किसानों की आय पर पड़ सकता है। लेकिन लंबे समय तक भारतीय डेयरी उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से अलग रखने से भी सेक्टर की उत्पादकता और गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाएगा।
इसलिए बेहतर रणनीति यह हो सकती है कि भारत पहले घरेलू डेयरी इकोसिस्टम को मजबूत करे और फिर FTAs के जरिए उन बाजारों में भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर पहुंच हासिल करे जहां भारतीय डेयरी उत्पाद प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ा मौका
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादन आधार है, विशाल घरेलू बाजार है और करोड़ों किसानों का डेयरी नेटवर्क है। अब जरूरत इस क्षमता को ग्लोबल वैल्यू चेन से जोड़ने की है।
जानकारों के मुताबिक वैज्ञानिक ब्रीडिंग, बेहतर न्यूट्रिशन, पशु स्वास्थ्य, आधुनिक प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन, क्वालिटी सर्टिफिकेशन और डिजिटल ट्रेसेबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश भारत की डेयरी इंडस्ट्री को अगले स्तर पर ले जा सकता है।
अगर भारत उत्पादन में अपनी नंबर-1 स्थिति को बेहतर प्रोडक्टिविटी और एक्सपोर्ट क्षमता में बदलने में सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में ग्लोबल डेयरी ट्रेड में उसकी हिस्सेदारी मौजूदा बेहद कम स्तर से काफी ऊपर जा सकती है।
यानी भारत के सामने चुनौती दूध पैदा करने की नहीं, बल्कि दुनिया को भारतीय दूध और उससे बने हाई-वैल्यू डेयरी उत्पाद बेचने की क्षमता विकसित करने की है। FTA इस बदलाव का जरिया बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए किसान हितों की सुरक्षा और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा—दोनों को साथ लेकर चलना होगा।


