Consumer Court Decision: अगर आप ट्रेन में RAC टिकट पर सफर कर रहे हैं, तो आपको भी अलग बेडरोल पाने का अधिकार है। दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में भारतीय रेलवे को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए यात्री को ₹25,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह फैसला उन लाखों रेल यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है जो यात्रा के दौरान सुविधाओं की कमी का सामना करते हैं।
RAC यात्री को मिला सिर्फ एक बेडरोल, शुरू हुआ विवाद
मामला प्रयागराज से नई दिल्ली की यात्रा का है। शिकायतकर्ता ने 25 अक्टूबर 2022 को टिकट बुक कराया था और 28 अक्टूबर 2022 को यात्रा की। उनका टिकट कन्फर्म नहीं हुआ और RAC (Reservation Against Cancellation) में रहा।
RAC व्यवस्था के तहत एक बर्थ पर दो यात्रियों को यात्रा करनी होती है। लेकिन यात्रा के दौरान दोनों यात्रियों के लिए रेलवे की ओर से केवल एक कंबल, एक तकिया और दो चादरें उपलब्ध कराई गईं। इसके अलावा हैंड टॉवेल भी नहीं दिया गया।
जब यात्री ने ट्रेन अटेंडेंट से दूसरा कंबल और तकिया मांगा, तो उसे जवाब मिला कि “एक सीट पर सिर्फ एक ही बेडरोल देने का नियम है।”
ट्विटर पर शिकायत के बाद भी नहीं मिला समाधान
यात्री ने तत्काल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब X) पर रेलवे से शिकायत की। शिकायत के बाद रेलवे ने PNR नंबर मांगा और विवरण मिलने पर केवल एक हैंड टॉवेल उपलब्ध कराया गया।
हालांकि, अतिरिक्त कंबल, तकिया या चादर नहीं दी गई। बाद में रेलवे की ओर से सोशल मीडिया पर शिकायत का समाधान होने का दावा भी किया गया, जबकि वास्तविक समस्या जस की तस बनी रही।
यात्री ने यात्रा के दौरान टीटीई (TTE) से भी शिकायत की और शिकायत पुस्तिका (Complaint Book) मांगी, लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद दिल्ली पहुंचकर उन्होंने लिखित शिकायत दर्ज कराई।
उपभोक्ता आयोग पहुंचा मामला
रेलवे से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर यात्री ने दिल्ली उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (Delhi Consumer Disputes Redressal Commission) में मामला दायर किया।
सुनवाई के दौरान उत्तर रेलवे ने कहा कि:
- यह मामला नॉर्थ सेंट्रल रेलवे, प्रयागराज के अधिकार क्षेत्र का है।
- यात्रियों को रेलवे के नियमों के अनुसार बेडरोल उपलब्ध कराए जाते हैं।
- अतिरिक्त कंबल उपलब्धता के आधार पर दिया जाता है।
- बेडरोल वितरण का कार्य ठेकेदार के माध्यम से कराया जाता है।
रेलवे बोर्ड के नियम क्या कहते हैं?
सुनवाई के दौरान आयोग ने रेलवे बोर्ड के 23 सितंबर 2009 के सर्कुलर का हवाला दिया। इस सर्कुलर के अनुसार:
RAC यात्रियों को भी अलग-अलग पूरा बेडरोल दिया जाना अनिवार्य है।
एक मानक बेडरोल में शामिल होते हैं:
- एक कंबल
- एक तकिया
- तकिये का कवर
- दो चादरें
- एक हैंड टॉवेल
आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता को नियमों के बावजूद दूसरे यात्री के साथ कंबल साझा करने के लिए मजबूर किया गया, जो रेलवे की स्पष्ट लापरवाही है।
रेलवे की दलील नहीं आई काम
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि रेलवे ने बेडरोल उपलब्ध नहीं कराने के लिए संबंधित ठेकेदार पर ₹1,000 का जुर्माना लगाया था।
लेकिन आयोग ने कहा कि:
- इसकी जानकारी यात्री को नहीं दी गई।
- यात्री को किसी प्रकार का मुआवजा भी नहीं दिया गया।
- रेलवे यह साबित नहीं कर सका कि शिकायतकर्ता को अलग बेडरोल उपलब्ध कराया गया था।
इसी आधार पर आयोग ने रेलवे को सेवा में कमी (Deficiency in Service) का दोषी माना।
कोर्ट ने रेलवे पर लगाया ₹25,000 का हर्जाना
दिल्ली उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष मोनिका अग्रवाल श्रीवास्तव तथा सदस्य राजेंद्र धर और रितु गरोडिया की पीठ ने आदेश दिया कि रेलवे:
- ₹20,000 मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक असुविधा के लिए मुआवजे के रूप में दे।
- ₹5,000 मुकदमे के खर्च के रूप में अलग से अदा करे।
इस प्रकार शिकायतकर्ता को कुल ₹25,000 का भुगतान किया जाएगा।
60 दिनों में भुगतान का आदेश
आयोग ने रेलवे को निर्देश दिया कि आदेश जारी होने के 60 दिनों के भीतर मुआवजे की पूरी राशि शिकायतकर्ता को दी जाए।
यदि निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो रेलवे को 7% वार्षिक ब्याज के साथ राशि का भुगतान करना होगा।
रेल यात्रियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला उन सभी यात्रियों के लिए एक मिसाल है जो यात्रा के दौरान रेलवे की खराब सेवाओं का सामना करते हैं। इससे साफ हो गया है कि:
- RAC यात्री भी पूर्ण बेडरोल पाने के हकदार हैं।
- रेलवे नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
- सेवा में कमी होने पर उपभोक्ता आयोग से न्याय और मुआवजा दोनों मिल सकता है।
निष्कर्ष
भारतीय रेलवे हर दिन करोड़ों यात्रियों को सेवा देती है, लेकिन यदि निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं तो यात्री अपने अधिकारों के लिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटा सकते हैं। दिल्ली उपभोक्ता आयोग का यह फैसला बताता है कि RAC टिकट होने का मतलब सुविधाओं में कटौती नहीं है। रेलवे बोर्ड के नियम सभी यात्रियों पर समान रूप से लागू होते हैं और उनका पालन न करने पर रेलवे को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।


