CWG 2026: हरियाणा की पैरा एथलीट शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में इतिहास रच दिया है। 40 साल की उम्र में उन्होंने महिलाओं की शॉट पुट F57 कैटेगरी में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को पहला पैरा एथलेटिक्स गोल्ड मेडल दिलाया। लेकिन यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि संघर्ष, हिम्मत और कभी हार न मानने वाली सोच की कहानी है।
शर्मिला धनखड़ ने सोमवार (27 जुलाई) को महिलाओं के शॉट पुट F57 इवेंट में 9.81 मीटर का सीजन का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत के लिए पैरा एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मेडल जीतने का गौरव हासिल किया।
उनकी इस जीत ने भारत के 20 साल लंबे इंतजार को खत्म कर दिया। इससे पहले भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल नहीं मिला था।
बचपन में पोलियो ने बदली जिंदगी, लेकिन हौसला नहीं टूटा
शर्मिला धनखड़ का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता खेती करते थे, जबकि उनकी मां नेत्रहीन थीं। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था, लेकिन मुश्किल हालात में भी उन्होंने जीवन आगे बढ़ाया।
महज 2 साल की उम्र में पोलियो ने शर्मिला की जिंदगी बदल दी। गांव में समय पर इलाज नहीं मिल पाने के कारण उनका बायां पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। शारीरिक परेशानी के बावजूद शर्मिला ने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं माना।
बचपन से ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया।
कम उम्र में शादी और दहेज प्रताड़ना का दर्द
शर्मिला की जिंदगी में मुश्किल दौर यहीं खत्म नहीं हुआ। कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई। शादी के बाद उन्हें ससुराल में दहेज की मांग को लेकर कथित तौर पर लंबे समय तक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
हालात इतने खराब हो गए कि करीब 25 साल की उम्र में वह अपनी दो बेटियों के साथ ससुराल छोड़कर मायके लौट आईं।
इसके बाद उनकी जिंदगी में एक नई शुरुआत हुई। बाद में उनकी शादी अजीत सिंह से हुई। परिवार और पति के सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। इसी दौरान उन्होंने खेल को अपना करियर बनाने का फैसला किया।
34 साल की उम्र में शुरू किया खेल करियर
जहां ज्यादातर खिलाड़ी बचपन से ही ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं, वहीं शर्मिला धनखड़ ने 34 साल की उम्र में पैरा एथलेटिक्स की शुरुआत की।
उन्होंने F57 कैटेगरी में शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में हिस्सा लेना शुरू किया। कम समय में ही उन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर देश की शीर्ष पैरा एथलीटों में जगह बना ली।
साल 2021 में पैरा नेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने अपने पहले बड़े टूर्नामेंट में ही शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 7.40 मीटर का थ्रो कर गोल्ड मेडल जीता और राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में ऐतिहासिक प्रदर्शन
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में शर्मिला ने अपने अनुभव और आत्मविश्वास का शानदार प्रदर्शन किया। महिलाओं के शॉट पुट F57 इवेंट में उनका 9.81 मीटर का थ्रो सबसे बेहतर रहा और उन्होंने गोल्ड मेडल जीत लिया।
F57 कैटेगरी उन खिलाड़ियों के लिए होती है जिनके निचले अंगों में कमजोरी, अंगों की कमी या मांसपेशियों की ताकत कम होती है।
शिल्पा शैला को मिला ब्रॉन्ज, भारत ने जीते दो मेडल
इसी इवेंट में भारत की एक और खिलाड़ी शिल्पा शैला ने भी पदक जीता। शुरुआत में विवाद के बाद आधिकारिक समीक्षा की गई, जिसके बाद शिल्पा को ब्रॉन्ज मेडल प्रदान किया गया।
शिल्पा ने 7.26 मीटर का अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया था। इस तरह भारत ने इस इवेंट में गोल्ड और ब्रॉन्ज सहित दो पदक अपने नाम किए।
मेडल स्टैंडिंग में बदलाव के बाद शिल्पा ने शर्मिला के साथ इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाया।
शर्मिला धनखड़ के प्रमुख उपलब्धियां
- कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: महिलाओं के शॉट पुट F57 में गोल्ड मेडल, 9.81 मीटर थ्रो
- 2026 फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (दुबई): शॉट पुट में गोल्ड और डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज
- 2025 इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (बेंगलुरु): 9.77 मीटर थ्रो के साथ गोल्ड मेडल
- 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स (बर्मिंघम): 8.43 मीटर थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड, पदक से मामूली अंतर से चूकीं
- 2023 एशियन पैरा गेम्स (हांगझोउ): चौथा स्थान
संघर्ष से सफलता तक का सफर बनी प्रेरणा
शर्मिला धनखड़ की कहानी उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो जीवन में मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। पोलियो, आर्थिक तंगी, पारिवारिक परेशानियों और उम्र की बाधाओं को पार करते हुए उन्होंने साबित कर दिया कि सफलता के लिए सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और लगातार मेहनत जरूरी होती है।
40 साल की उम्र में देश के लिए इतिहास रचना बताता है कि सपनों को पूरा करने के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बन सकती। शर्मिला धनखड़ आज सिर्फ एक गोल्ड मेडल विजेता नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी हैं।


