नई दिल्ली। भारतीय निर्यातकों (Exporters) के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका ने ‘ट्रंप टैरिफ’ के तहत वसूले गए 10 अरब डॉलर (करीब ₹94,649 करोड़) से अधिक की राशि वापस करना शुरू कर दिया है। अमेरिकी अदालत द्वारा इन टैरिफ को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद अब रिफंड की प्रक्रिया तेज हो गई है।
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा उन भारतीय कंपनियों को मिलेगा जिनके उत्पादों पर 2025 में भारी आयात शुल्क लगाया गया था। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, लेदर और जेम्स-ज्वेलरी जैसे क्षेत्रों के निर्यातकों को इससे सीधी राहत मिलने की उम्मीद है।
कैसे लगा था ‘ट्रंप टैरिफ’?
अप्रैल 2025 में अमेरिका ने एक विशेष व्यापार नीति लागू की थी, जिसका उद्देश्य उन देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाना था जिनका अमेरिका के साथ बड़ा व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) था।
इसके तहत 7 अगस्त 2025 को भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया। इसके बाद 27 अगस्त 2025 को रूस से कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25% शुल्क और लगाया गया। इस तरह कई भारतीय उत्पादों पर कुल प्रभावी शुल्क 50% तक पहुंच गया।
इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हुई और अमेरिकी बाजार में उनकी लागत बढ़ गई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बदली तस्वीर
20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इन अतिरिक्त शुल्कों को असंवैधानिक करार दिया। अदालत के फैसले के बाद उन सभी टैरिफ की वापसी का रास्ता साफ हो गया जो अगस्त 2025 से फरवरी 2026 के बीच वसूले गए थे।
इसके बाद अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) ने रिफंड प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रशासनिक निर्देश जारी किए। अब धीरे-धीरे प्रभावित कंपनियों के खातों में राशि पहुंचनी शुरू हो गई है।
RBI ने भी दूर की बड़ी बाधा
रिफंड की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
कई भारतीय बैंकों की अमेरिका में शाखाएं नहीं हैं, जिससे विदेशी भुगतान प्राप्त करने में दिक्कत आ रही थी। RBI ने स्पष्ट किया है कि ऐसे बैंक अमेरिका में कार्यरत किसी अन्य बैंक के माध्यम से स्पेशल कलेक्शन अकाउंट खोलकर यह राशि प्राप्त कर सकते हैं।
इस फैसले से रिफंड ट्रांसफर की प्रक्रिया काफी आसान हो गई है।
डिजिटल पेमेंट कंपनियां भी आईं आगे
रिपोर्ट के अनुसार कई डिजिटल पेमेंट गेटवे और फिनटेक कंपनियों ने भी कम लागत पर अंतरराष्ट्रीय फंड ट्रांसफर की सुविधा उपलब्ध करानी शुरू कर दी है। इससे छोटे और मध्यम निर्यातकों को तेजी से पैसा मिलने में मदद मिलेगी।
हालांकि बड़ी रकम वाले मामलों में अभी कुछ समय लग सकता है क्योंकि दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया जारी है।
अभी भी बनी हुई हैं कुछ चुनौतियां
विशेषज्ञों का कहना है कि सभी निर्यातकों को रिफंड प्राप्त करने में समान आसानी नहीं होगी। जिन कंपनियों ने फ्रेट फॉरवर्डर्स या अमेरिकी आयातकों के माध्यम से ड्यूटी का भुगतान किया था, उनके मामलों में रिफंड शेयरिंग और दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर बातचीत जारी है।
यानी कुछ मामलों में अंतिम भुगतान मिलने में अभी समय लग सकता है।
भारतीय निर्यात क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
करीब ₹94,649 करोड़ की यह राशि भारतीय निर्यात उद्योग के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है। इससे कंपनियों की नकदी स्थिति (Cash Flow) बेहतर होगी, निर्यात गतिविधियों को गति मिलेगी और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिलेगी।
विशेष रूप से MSME निर्यातकों के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अतिरिक्त टैरिफ के कारण उनकी लागत और मार्जिन पर काफी दबाव पड़ा था।
अब अमेरिकी अदालत के फैसले और रिफंड प्रक्रिया के शुरू होने से भारतीय निर्यातकों को बड़ी वित्तीय राहत मिलने की उम्मीद है।


