ईरान युद्ध के बीच सरकार के लिए क्यों बढ़ी फंड जुटाने की जरूरत?
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध का असर अब भारत के सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल, एलपीजी और उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई तेजी के कारण केंद्र सरकार पर सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका बढ़ गई है। इसी बीच सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती दो महीनों में विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन के जरिए लगभग ₹20,000 करोड़ जुटाकर अपने सालाना लक्ष्य का करीब 25 प्रतिशत हासिल कर लिया है।
वित्त मंत्रालय और DIPAM (Department of Investment and Public Asset Management) के आंकड़ों के अनुसार, सरकार ने इस वित्त वर्ष के लिए ₹80,000 करोड़ का विनिवेश लक्ष्य रखा है। ऐसे में शुरुआती दो महीनों में लक्ष्य का एक-चौथाई हासिल होना सरकार के लिए राहत की खबर माना जा रहा है।
उर्वरक सब्सिडी बढ़ने का खतरा
ईरान युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। विशेष रूप से उर्वरक और प्राकृतिक गैस के बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। खाद मंत्रालय पहले ही मौजूदा बजट प्रावधान से अधिक सब्सिडी की आवश्यकता जता चुका है।
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए लगभग ₹1.7 लाख करोड़ का प्रावधान किया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी जारी रही तो यह राशि पर्याप्त नहीं रह सकती। यही कारण है कि सरकार अतिरिक्त राजस्व जुटाने के विकल्पों पर तेजी से काम कर रही है।
तेल और LPG सब्सिडी भी बढ़ा सकती है दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत की ऊर्जा लागत पर पड़ता है। केंद्र सरकार पहले भी एक्साइज ड्यूटी में कटौती और तेल विपणन कंपनियों को सहायता देकर उपभोक्ताओं पर बोझ कम करने की कोशिश कर चुकी है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो LPG सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है। इससे राजकोषीय दबाव और बढ़ेगा।
कहां से आया ₹20,000 करोड़?
सरकार ने दो प्रमुख माध्यमों से धन जुटाया है।
पहला, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बिक्री यानी विनिवेश।
दूसरा, सरकारी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण यानी Asset Monetisation।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार:
- विनिवेश से प्राप्त राशि: ₹12,166 करोड़
- एसेट मोनेटाइजेशन से प्राप्त राशि: ₹6,367 करोड़
- कुल जुटाई गई राशि: लगभग ₹20,000 करोड़
यह राशि सरकार को अतिरिक्त सब्सिडी और विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय लचीलापन प्रदान कर सकती है।
किन कंपनियों में हिस्सेदारी बेच चुकी है सरकार?
इस वित्त वर्ष में अब तक सरकार ने कई प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बिक्री के जरिए धन जुटाया है।
इनमें प्रमुख नाम हैं:
इन कंपनियों में Offer For Sale (OFS) के जरिए सरकार ने निवेशकों को शेयर बेचे और राजस्व प्राप्त किया।
अब NLC India पर नजर
सरकार की अगली बड़ी योजना NLC India में लगभग 3 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की है।
कंपनी के OFS को निवेशकों से मजबूत प्रतिक्रिया मिली है। पहले दिन ही यह इश्यू लगभग 5.2 गुना सब्सक्राइब हुआ। इससे सरकार को करीब ₹1,260 करोड़ जुटने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाजार की स्थिति अनुकूल रही तो सरकार वर्ष के बाकी हिस्से में भी कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बिक्री के जरिए लक्ष्य हासिल कर सकती है।
पिछले वर्षों में कैसा रहा विनिवेश प्रदर्शन?
सरकार कई वर्षों से विनिवेश को गैर-कर राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत मानती रही है। हालांकि कई बार बाजार परिस्थितियों और निवेशक मांग के कारण लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण रहा है।
वर्तमान वित्त वर्ष में शुरुआती दो महीनों का प्रदर्शन यह संकेत देता है कि सरकार इस बार लक्ष्य प्राप्ति के मामले में बेहतर स्थिति में हो सकती है। खासकर तब, जब बढ़ते सब्सिडी खर्च और वैश्विक अनिश्चितता के बीच अतिरिक्त राजस्व की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
आम निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
सरकार की विनिवेश रणनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि निवेशकों को अक्सर बड़े PSU शेयरों में हिस्सेदारी खरीदने का अवसर मिलता है। OFS के दौरान कई बार शेयरों पर छूट भी दी जाती है।
हालांकि निवेशकों को केवल सरकारी हिस्सेदारी बिक्री देखकर निवेश निर्णय नहीं लेना चाहिए। कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, सेक्टर की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन करना भी जरूरी है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध के कारण बढ़ती तेल और उर्वरक कीमतों ने सरकार के सामने अतिरिक्त वित्तीय चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे माहौल में विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बनकर उभरे हैं। वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में लगभग ₹20,000 करोड़ जुटाकर सरकार ने अपने वार्षिक लक्ष्य का 25 प्रतिशत हासिल कर लिया है। आने वाले महीनों में NLC India समेत अन्य PSU कंपनियों में हिस्सेदारी बिक्री इस रणनीति का अहम हिस्सा रह सकती है।


