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Reading: RBI Dividend: ‘RBI को अपना सोना बेच देना चाहिए’, ₹2.87 लाख करोड़ के डिविडेंड पर क्यों भड़के दीपक शेनॉय? आखिर क्या है पूरा विवाद
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RBI Dividend: ‘RBI को अपना सोना बेच देना चाहिए’, ₹2.87 लाख करोड़ के डिविडेंड पर क्यों भड़के दीपक शेनॉय? आखिर क्या है पूरा विवाद

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 12:11 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड ट्रांसफर करने के फैसले ने देश में एक नई आर्थिक बहस छेड़ दी है। आमतौर पर RBI का सरकार को दिया जाने वाला डिविडेंड बाजार के लिए सकारात्मक खबर माना जाता है, क्योंकि इससे सरकार की वित्तीय स्थिति मजबूत होती है। लेकिन इस बार मामला अलग है।

Contents
आखिर कितना बड़ा है RBI का यह डिविडेंड?दीपक शेनॉय आखिर क्यों नाराज हैं?क्या RBI सचमुच जरूरत से ज्यादा पैसा रोक रहा है?कंटिजेंट रिस्क बफर क्यों जरूरी है?गोल्ड रिजर्व बेचने का सुझाव कितना व्यावहारिक है?सोशल मीडिया पर क्यों बंट गए लोग?पहला पक्ष: ज्यादा पैसा सरकार को मिलना चाहिएदूसरा पक्ष: RBI का सतर्क रहना जरूरीसरकार को इस डिविडेंड से क्या फायदा होगा?क्या भविष्य में और बढ़ सकता है RBI का डिविडेंड?असली सवाल: RBI का काम मुनाफा कमाना है या सुरक्षा देना?निष्कर्ष

कैपिटल माइंड के सीईओ और जाने-माने निवेशक दीपक शेनॉय ने इस डिविडेंड को “निराशाजनक” बताते हुए ऐसा बयान दिया जिसने सोशल मीडिया से लेकर आर्थिक जगत तक हलचल मचा दी। उन्होंने कहा कि RBI को अपना गोल्ड रिजर्व बेच देना चाहिए और सरकार को ज्यादा पैसा लौटाना चाहिए।

उनकी इस टिप्पणी के बाद अर्थशास्त्रियों, निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है। सवाल यह है कि क्या सचमुच RBI जरूरत से ज्यादा पैसा अपने पास रोक कर रख रहा है? क्या गोल्ड रिजर्व बेच देना चाहिए? या फिर केंद्रीय बैंक का सतर्क रवैया ही देश की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी है?


आखिर कितना बड़ा है RBI का यह डिविडेंड?

RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का अधिशेष (Surplus Transfer) देने का फैसला किया है। यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा डिविडेंड ट्रांसफर माना जा रहा है।

इससे पहले भी RBI सरकार को हर साल अधिशेष राशि देता रहा है, लेकिन इस बार रकम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इसकी प्रमुख वजहें मानी जा रही हैं विदेशी मुद्रा भंडार से बेहतर कमाई, डॉलर की मजबूती और करेंसी ऑपरेशन, सरकारी बॉन्ड होल्डिंग से आय, ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण कमाई में इजाफा, सोने की कीमतों में भारी तेजी.

आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस बड़े डिविडेंड से सरकार को राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। साथ ही सरकार को अतिरिक्त उधारी लेने की जरूरत भी कम हो सकती है।


दीपक शेनॉय आखिर क्यों नाराज हैं?

कैपिटल माइंड के सीईओ दीपक शेनॉय का तर्क है कि RBI का कुल मुनाफा लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा, लेकिन केंद्रीय बैंक ने उसका बड़ा हिस्सा सरकार को देने के बजाय अपने कंटिजेंट रिस्क बफर (CRB) में डाल दिया।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि RBI जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरत रहा है। उनके मुताबिक:

“इतना बड़ा बफर रखने की क्या जरूरत है जिसे कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया?”

उन्होंने सुझाव दिया कि RBI को अपना गोल्ड रिजर्व बेचकर बैलेंस शीट का आकार कम करना चाहिए और सरकार को ज्यादा अधिशेष देना चाहिए।

उनकी राय का मूल तर्क यह है कि: RBI के पास पहले से पर्याप्त सुरक्षा है, भारत की अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में अधिक स्थिर है, अत्यधिक रिजर्व रखने से सरकार को मिलने वाला पैसा कम हो जाता है, सरकार इस अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं में कर सकती है हालांकि, उनकी यह राय काफी विवादित मानी जा रही है।


क्या RBI सचमुच जरूरत से ज्यादा पैसा रोक रहा है?

यहीं से असली बहस शुरू होती है। RBI का कहना है कि उसे अपनी बैलेंस शीट का 5.5% से 6.5% हिस्सा कंटिजेंट रिस्क बफर (CRB) के रूप में रखना अनिवार्य है। यह व्यवस्था बिमल जालान समिति की सिफारिशों के आधार पर तय की गई थी।

कंटिजेंट रिस्क बफर क्यों जरूरी है?

यह फंड किसी भी बड़े आर्थिक संकट के समय काम आता है। उदाहरण: वैश्विक वित्तीय संकट, डॉलर संकट, युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी पूंजी का अचानक बाहर निकलना, बैंकिंग सिस्टम पर दबाव, करेंसी मार्केट में अस्थिरता. 2026 में दुनिया जिस तरह के हालात से गुजर रही है — मिडिल ईस्ट तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, डॉलर की मजबूती और वैश्विक मंदी की आशंकाएं — ऐसे समय में RBI शायद अतिरिक्त सावधानी बरतना चाहता है।


गोल्ड रिजर्व बेचने का सुझाव कितना व्यावहारिक है?

यही सबसे बड़ा सवाल है। भारत का गोल्ड रिजर्व सिर्फ निवेश नहीं बल्कि रणनीतिक सुरक्षा कवच माना जाता है। दुनिया के लगभग सभी बड़े केंद्रीय बैंक पिछले कुछ वर्षों में सोना खरीद रहे हैं। इसकी वजह यह है कि डॉलर पर निर्भरता कम हो, भू-राजनीतिक संकट में सुरक्षा मिले, विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिरता मिले, मुद्रास्फीति के समय मूल्य सुरक्षित रहे

RBI ने भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार सोने की खरीद बढ़ाई है। ऐसे में कई विशेषज्ञों का मानना है कि गोल्ड रिजर्व बेचना अल्पकालिक फायदे के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा से समझौता करने जैसा हो सकता है।

A little disappointing that RBI has given just 2.86 lakh crore as a dividend to the government.

They had nearly 4 lakh crore of profit. And yet, chose to keep a substantial portion of it into their CRB – a risk buffer they have never had to use ever, and won't.

The official… pic.twitter.com/99GmDa19tr

— Deepak Shenoy (@deepakshenoy) May 22, 2026

सोशल मीडिया पर क्यों बंट गए लोग?

दीपक शेनॉय के बयान के बाद सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग धाराएं दिखाई दीं।

पहला पक्ष: ज्यादा पैसा सरकार को मिलना चाहिए

कुछ लोगों का मानना है कि: RBI जरूरत से ज्यादा रिजर्व रख रहा है, सरकार को अधिक संसाधनों की जरूरत है, अतिरिक्त पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास में इस्तेमाल हो सकता है, बड़ी बैलेंस शीट रखने का कोई खास फायदा नहीं.

दूसरा पक्ष: RBI का सतर्क रहना जरूरी

दूसरे समूह का कहना है कि: केंद्रीय बैंक का काम सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं होता, आर्थिक संकट अचानक आते हैं, गोल्ड रिजर्व राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा है मजबूत बफर विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाता है

एक यूजर ने लिखा:

“सोना तब बेचा जाता है जब घर संकट में हो, इसलिए नहीं कि बैलेंस शीट बड़ी हो गई है।”

यह टिप्पणी तेजी से वायरल हुई।


सरकार को इस डिविडेंड से क्या फायदा होगा?

2.87 लाख करोड़ रुपये का यह अधिशेष सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे Fiscal Deficit कम रखने में मदद मिलेगी, सरकारी उधारी घट सकती है, बॉन्ड यील्ड पर दबाव कम होगा, इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ सकता है, चुनावी साल से पहले वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे सरकार को टैक्स बढ़ाए बिना अतिरिक्त खर्च करने की क्षमता मिलेगी।


क्या भविष्य में और बढ़ सकता है RBI का डिविडेंड?

अगर डॉलर मजबूत रहता है, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है, ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, सोने की कीमतें मजबूत रहती हैं तो आने वाले वर्षों में RBI की आय और बढ़ सकती है। लेकिन यह भी संभव है कि वैश्विक संकट की स्थिति में केंद्रीय बैंक भविष्य के जोखिमों को देखते हुए और बड़ा बफर बनाए।


असली सवाल: RBI का काम मुनाफा कमाना है या सुरक्षा देना?

यही इस पूरी बहस का केंद्र है। दीपक शेनॉय का नजरिया बाजार-केंद्रित और दक्षता आधारित है, जहां अतिरिक्त रिजर्व को “idle capital” माना जा रहा है।

वहीं RBI और उसके समर्थकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक का असली काम आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है, न कि अधिकतम डिविडेंड देना।

दरअसल, RBI कोई सामान्य कंपनी नहीं है। उसका काम संकट आने पर देश की वित्तीय व्यवस्था को बचाना भी है। इसलिए कई बार वह “extra cautious” दिखाई देता है।


निष्कर्ष

RBI के रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपये के डिविडेंड ने सिर्फ आर्थिक चर्चा नहीं बल्कि केंद्रीय बैंक की भूमिका पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या RBI जरूरत से ज्यादा सतर्क है? क्या गोल्ड रिजर्व बेचना चाहिए? या फिर अनिश्चित वैश्विक माहौल में मजबूत बफर ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है?

फिलहाल इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं है। लेकिन इतना तय है कि दीपक शेनॉय की टिप्पणी ने RBI की बैलेंस शीट, गोल्ड रिजर्व और कंटिजेंट रिस्क बफर जैसे जटिल विषयों को आम लोगों की चर्चा में ला दिया है।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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