पुराने और फेंके हुए जूते आमतौर पर कचरे में चले जाते हैं। लोग उन्हें बेकार समझकर फेंक देते हैं। लेकिन मुंबई के दो युवाओं ने इसी कचरे में करोड़ों रुपये का बिजनेस मॉडल खोज लिया। जिन जूतों को लोग बेकार मानते थे, उन्हीं जूतों ने आज एक ऐसा स्टार्टअप खड़ा कर दिया है जो न सिर्फ करोड़ों की कमाई कर रहा है बल्कि हजारों बच्चों के पैरों तक चप्पलें भी पहुंचा रहा है।
यह कहानी है मुंबई के श्रीयांस भंडारी और रमेश धामी की। दोनों एथलीट रहे हैं और खेल की दुनिया से जुड़े रहे। लेकिन एक छोटी सी घटना ने उनकी सोच बदल दी और वहीं से जन्म हुआ ‘ग्रीनसोल’ (Greensole) नाम के स्टार्टअप का। आज यह स्टार्टअप पुराने जूतों को रिसाइकिल करके नए फुटवियर और इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट बनाता है। कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 3 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
सबसे खास बात यह है कि इस बिजनेस की शुरुआत किसी बड़े ऑफिस या फैक्ट्री से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत मुंबई की एक झुग्गी बस्ती की छोटी सी यूनिट से हुई थी, जहां शुरुआत में दिनभर में केवल 15-20 जोड़ी चप्पलें बन पाती थीं।
एक पुराने जूते से आया करोड़ों के बिजनेस का आइडिया

ग्रीनसोल की शुरुआत के पीछे कोई बड़ी बिजनेस प्लानिंग नहीं थी। दरअसल, श्रीयांस भंडारी ने एक दिन अपने दोस्त और मैराथन कोच रमेश धामी को पुराने जूतों की मरम्मत करते देखा। रमेश उन जूतों को फेंकना नहीं चाहते थे क्योंकि उनका सोल अभी भी मजबूत था।
यहीं से दोनों के दिमाग में सवाल आया कि आखिर दुनिया भर में हर साल करोड़ों जूते फेंके जाते हैं, लेकिन क्या उनका दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता?
इसके बाद दोनों ने इस विषय पर रिसर्च शुरू की। रिसर्च में सामने आया कि दुनिया भर में अरबों जूते हर साल लैंडफिल में फेंक दिए जाते हैं और इन्हें पूरी तरह नष्ट होने में 150 से 200 साल तक लग सकते हैं। यही वह पल था जब दोनों ने तय किया कि वे इस समस्या को बिजनेस और सामाजिक समाधान दोनों में बदलेंगे।
झुग्गी बस्ती से शुरू हुआ सफर
आज भले ही ग्रीनसोल का नाम बड़े सोशल इम्पैक्ट स्टार्टअप्स में लिया जाता हो, लेकिन इसकी शुरुआत बेहद मुश्किल हालात में हुई थी।
श्रीयांस और रमेश का फुटवियर इंडस्ट्री से कोई संबंध नहीं था। न उनके पास बड़ा निवेश था और न ही कोई बड़ी फैक्ट्री। उन्होंने मुंबई की एक झुग्गी बस्ती में किराए की छोटी यूनिट लेकर काम शुरू किया।
शुरुआत में उन्हें यह तक नहीं पता था कि पुराने जूतों को दोबारा उपयोग के लायक कैसे बनाया जाए। लेकिन लगातार प्रयोग और मेहनत के बाद उन्होंने एक खास तकनीक विकसित की। इस तकनीक में पुराने जूतों को अलग-अलग हिस्सों में काटा जाता है। फिर उनके सोल को स्टैंडर्ड साइज में ढाला जाता है और करीब 20 फीसदी नया मटेरियल जोड़कर उन्हें साफ, मजबूत और आरामदायक चप्पलों में बदला जाता है।
शुरुआती दिनों में दोनों दिनभर मेहनत करके मुश्किल से 15 से 20 जोड़ी चप्पलें तैयार कर पाते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनका मॉडल लोगों और कंपनियों का ध्यान खींचने लगा।
एक पार्टनरशिप ने बदल दी किस्मत

ग्रीनसोल के लिए बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी साझेदारी ‘राम फैशन एक्सपोर्ट्स’ के साथ हुई। इस पार्टनरशिप ने उन्हें बेहतर मैन्युफैक्चरिंग सपोर्ट और स्केल पर काम करने का मौका दिया।
इसके बाद कंपनी ने अपना नेटवर्क तेजी से बढ़ाया। पुराने जूतों को इकट्ठा करने के लिए अलग-अलग शहरों में कलेक्शन ड्राइव शुरू की गईं। कॉर्पोरेट कंपनियों ने भी CSR प्रोग्राम के तहत इस पहल का समर्थन करना शुरू किया।
आज कंपनी हर महीने करीब 15,000 से 20,000 जोड़ी पुराने जूते इकट्ठा करती है। इन जूतों को प्रोसेस करने के बाद जरूरतमंद बच्चों के लिए चप्पलें बनाई जाती हैं।
गांवों और आदिवासी इलाकों तक पहुंच रही मदद
ग्रीनसोल सिर्फ बिजनेस नहीं कर रहा, बल्कि एक बड़ा सामाजिक मिशन भी चला रहा है।
कंपनी की ग्राउंड टीम गांवों और आदिवासी इलाकों में जाकर बच्चों के पैरों का माप लेती है ताकि उन्हें सही फिटिंग की चप्पलें मिल सकें। इसके बाद रिसाइकिल किए गए जूतों से तैयार चप्पलें उन बच्चों तक पहुंचाई जाती हैं।
भारत के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे बिना चप्पलों के स्कूल जाते हैं। ऐसे में यह पहल उनके लिए काफी मददगार साबित हो रही है।
कंपनी का नेटवर्क अब देश के 20 राज्यों तक फैल चुका है। 100 से ज्यादा कॉर्पोरेट कंपनियां CSR के जरिए इस मिशन से जुड़ी हुई हैं।
रिसाइकिलिंग से खड़ा किया रिटेल ब्रांड

ग्रीनसोल सिर्फ डोनेशन मॉडल पर निर्भर नहीं है। कंपनी ने अपना एक रिटेल ब्रांड भी तैयार किया है, जिसके जरिए इको-फ्रेंडली स्नीकर्स, बैग और एक्सेसरीज बेची जाती हैं।
आज पर्यावरण के प्रति जागरूक ग्राहकों के बीच सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। ग्रीनसोल ने इसी ट्रेंड को समझते हुए अपने प्रोडक्ट्स को मार्केट में उतारा।
कंपनी का यह रिटेल बिजनेस अब सालाना 2.5 करोड़ से 3 करोड़ रुपये तक का टर्नओवर हासिल कर रहा है। खास बात यह है कि इस मॉडल से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
पर्यावरण को भी मिल रहा बड़ा फायदा
भारत समेत दुनिया भर में फुटवियर वेस्ट तेजी से बढ़ रहा है। पुराने जूते प्लास्टिक, रबर और सिंथेटिक मटेरियल से बने होते हैं, जिन्हें नष्ट होने में कई दशक लग जाते हैं।
ग्रीनसोल का मॉडल इस कचरे को कम करने में मदद कर रहा है। कंपनी अब तक लाखों पुराने जूतों को लैंडफिल में जाने से रोक चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सर्कुलर इकोनॉमी और रिसाइकिलिंग आधारित बिजनेस मॉडल तेजी से बढ़ सकते हैं। ग्रीनसोल उसी दिशा में काम करने वाले भारतीय स्टार्टअप्स में शामिल है।
अब विदेशों तक पहुंचाने की तैयारी

श्रीयांस भंडारी और रमेश धामी अब अपने मॉडल को भारत से बाहर ले जाने की तैयारी में हैं। उनका लक्ष्य नेपाल, भूटान और अफ्रीकी देशों तक इस पहल को पहुंचाना है।
इसके अलावा कंपनी सरकार के साथ मिलकर जूते के कचरे का इस्तेमाल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में करने की योजना पर भी काम करना चाहती है। इसमें रनिंग ट्रैक और अन्य खेल सुविधाओं के निर्माण जैसे प्रोजेक्ट शामिल हो सकते हैं।
क्यों खास है यह सफलता की कहानी?
ग्रीनसोल की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि यह सिर्फ पैसे कमाने का बिजनेस नहीं है। यह एक ऐसा मॉडल है जिसमें:
- कचरा कम हो रहा है
- जरूरतमंद बच्चों की मदद हो रही है
- रोजगार पैदा हो रहा है
- पर्यावरण संरक्षण हो रहा है
- और साथ ही करोड़ों रुपये का कारोबार भी बन रहा है
एक छोटे से आइडिया से शुरू हुआ यह सफर आज देश के सफल सोशल एंटरप्राइज मॉडल्स में गिना जा रहा है। यह कहानी बताती है कि सही सोच और लगातार मेहनत के दम पर कचरे से भी करोड़ों का कारोबार खड़ा किया जा सकता है।
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