अनिल अग्रवाल की वेदांता लिमिटेड ने अपने ESOS ट्रस्ट में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी ने डीमर्जर के बाद ट्रस्ट की व्यवस्था में संशोधन करते हुए दो नए ट्रस्टी नियुक्त किए हैं। यह बदलाव 1 मई 2026 से लागू माना जाएगा।
वेदांता लिमिटेड ने 8 मई को स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग में इसकी जानकारी दी। कंपनी के अनुसार यह फैसला डीमर्जर के बाद कर्मचारियों को मिलने वाले शेयर आधारित लाभों को व्यवस्थित तरीके से जारी रखने के लिए लिया गया है।
दरअसल वेदांता ने वर्ष 2016 में कर्मचारियों को शेयर विकल्प देने और उनकी प्रक्रिया संभालने के लिए “Vedanta Limited ESOS Trust” बनाया था। अब कंपनी ने इस ट्रस्ट के मूल दस्तावेज में सातवीं बार बदलाव किया है।
कंपनी ने पुराने ट्रस्टियों रोहित अग्रवाल और अनुश्री बाफना के इस्तीफे के बाद राहुल अरोड़ा और प्रीत सेठी को नया ट्रस्टी नियुक्त किया है। मौजूदा ट्रस्टी मनमीत सिंह पहले की तरह अपनी भूमिका में बने रहेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि वेदांता के हालिया डीमर्जर के बाद यह बदलाव जरूरी माना जा रहा था। कंपनी अब अलग-अलग कारोबार इकाइयों में बंट चुकी है और ऐसे में कर्मचारियों को मिलने वाले ESOS लाभों को सुरक्षित रखना कंपनी की प्राथमिकता है।
डीमर्जर के बाद वेदांता के कारोबार को अलग-अलग कंपनियों में बांटा गया है। इनमें वेदांता एल्यूमीनियम, वेदांता ऑयल एंड गैस, वेदांता आयरन एंड स्टील, वेदांता पावर और मूल कंपनी वेदांता लिमिटेड शामिल हैं।
कंपनी का कहना है कि नई व्यवस्था इस बात को सुनिश्चित करेगी कि डीमर्जर से पहले जिन कर्मचारियों को शेयर विकल्प मिले थे, उनके लाभ प्रभावित न हों। चाहे कर्मचारी नई इकाइयों में ट्रांसफर हुए हों या मूल कंपनी में बने हों, उनके मौजूदा शेयर लाभ सुरक्षित रखे जाएंगे।
वेदांता ने यह भी स्पष्ट किया है कि ट्रस्ट अलग-अलग कंपनियों की योजनाओं को अलग तरीके से संभालेगा ताकि किसी एक इकाई की देनदारी दूसरी इकाई पर असर न डाले। जरूरत पड़ने पर ट्रस्ट बाजार से शेयर खरीद भी सकेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़े कॉरपोरेट डीमर्जर में कर्मचारियों को मिलने वाले शेयर लाभ सबसे संवेदनशील हिस्सों में माने जाते हैं। अगर इन्हें सही तरीके से संभाला न जाए तो कर्मचारियों का भरोसा और लंबे समय तक कंपनी से जुड़े रहने की इच्छा प्रभावित हो सकती है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि वेदांता का यह कदम कर्मचारियों और निवेशकों दोनों को भरोसा देने की कोशिश है कि डीमर्जर के बाद भी कंपनी अपनी आंतरिक व्यवस्था और कर्मचारी हितों को लेकर गंभीर है।
वेदांता का डीमर्जर लंबे समय से बाजार में चर्चा का विषय रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार अलग-अलग कारोबार को स्वतंत्र इकाइयों में बांटने से हर बिजनेस की वास्तविक क्षमता और वैल्यू बेहतर तरीके से सामने आ सकती है। हालांकि आने वाले समय में नई इकाइयों के प्रदर्शन और कर्ज प्रबंधन पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।
Source- BSE Filing
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