एशिया की बदलती भू-राजनीति के बीच वियतनाम दुनिया की सबसे दिलचस्प रणनीतिक नीति अपनाने वाले देशों में शामिल हो गया है। एक तरफ चीन उसके लिए आर्थिक लाइफलाइन बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ वह तेजी से भारत के साथ अपने रक्षा, तकनीक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है।
यह सिर्फ सामान्य कूटनीति नहीं बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बन रहे नए शक्ति संतुलन का बड़ा संकेत माना जा रहा है। हाल के महीनों में वियतनाम के शीर्ष नेतृत्व की विदेश यात्राओं का क्रम इस रणनीति को साफ दिखाता है। राष्ट्रपति बनने के बाद टो लैम सबसे पहले चीन गए, लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद उन्होंने भारत का दौरा किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
भारत और वियतनाम ने अपने रिश्तों को “Enhanced Comprehensive Strategic Partnership” तक पहुंचाया। यह भारत की ओर से दी जाने वाली सबसे ऊंची कूटनीतिक श्रेणियों में शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि वियतनाम अब चीन पर आर्थिक निर्भरता बनाए रखते हुए भी अपनी रणनीतिक सुरक्षा के लिए भारत जैसे भरोसेमंद साझेदारों को मजबूत करना चाहता है।
चीन-वियतनाम व्यापार कितना बड़ा है?
चीन पिछले दो दशकों से वियतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बना हुआ है। 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 256 अरब डॉलर यानी करीब ₹24 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यह आंकड़ा बताता है कि चीन वियतनाम की अर्थव्यवस्था में कितनी गहरी भूमिका निभाता है।
वियतनाम की manufacturing economy काफी हद तक चीनी supply chains पर निर्भर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कच्चा माल और औद्योगिक उत्पादन में चीन की भूमिका बेहद बड़ी है। Samsung, Apple suppliers, semiconductor assembly और electronics manufacturing जैसे सेक्टर्स में चीन-वियतनाम आर्थिक नेटवर्क काफी मजबूत माना जाता है।
China+1 Strategy से कैसे बदल रहा है वियतनाम?
अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और geopolitical tensions के बाद दुनिया की बड़ी कंपनियां “China+1 Strategy” पर काम कर रही हैं। इसका मतलब है कि कंपनियां सिर्फ चीन पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे देशों में भी manufacturing base तैयार कर रही हैं।
वियतनाम इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है। Apple, Foxconn, Samsung, Intel और कई वैश्विक कंपनियों ने चीन के बाहर manufacturing diversify करने के लिए वियतनाम में निवेश बढ़ाया है।
लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है। वियतनाम खुद कई मामलों में चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर है। यही वजह है कि वह आर्थिक रूप से चीन से जुड़ा रहने के बावजूद रणनीतिक diversification की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
चीन से वियतनाम को खतरा क्यों महसूस होता है?
आर्थिक संबंध मजबूत होने के बावजूद चीन और वियतनाम के बीच गहरा अविश्वास मौजूद है। इसकी सबसे बड़ी वजह South China Sea विवाद है।
दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यहां से हर साल ट्रिलियन डॉलर का व्यापार गुजरता है। चीन “Nine-Dash Line” के जरिए इस समुद्री क्षेत्र के बड़े हिस्से पर दावा करता है, जबकि वियतनाम समेत कई देश इसे चुनौती देते हैं।
दोनों देशों के बीच पुराने तनाव क्या हैं?
वियतनाम चीन की विस्तारवादी नीति से लंबे समय से सतर्क रहा है। 1974 में चीन ने Paracel Islands पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2014 में चीनी oil rig विवाद ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया।
हाल के वर्षों में Spratly Islands में सैन्य गतिविधियों और construction projects को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। इन घटनाओं ने वियतनाम को यह समझा दिया कि आर्थिक साझेदारी के बावजूद सुरक्षा जोखिम खत्म नहीं हुए हैं।
भारत इस पूरे समीकरण में क्यों महत्वपूर्ण बन रहा है?
यहीं से भारत की भूमिका शुरू होती है। वियतनाम भारत को सिर्फ एक trade partner नहीं बल्कि strategic balancing power के रूप में देख रहा है।
भारत और वियतनाम के बीच हालिया वार्ता में defense cooperation, digital payments, healthcare, education, maritime security, rare earth partnership और technology collaboration समेत 13 बड़े समझौते हुए।
Rare Earth सहयोग क्यों अहम माना जा रहा?
Rare Earth Minerals आधुनिक टेक्नोलॉजी और defense industry के लिए बेहद जरूरी हैं। इनका इस्तेमाल electric vehicles, semiconductors, missile systems, smartphones और renewable energy systems में होता है।
दुनिया की rare earth supply chain पर चीन का बड़ा नियंत्रण है। भारत और वियतनाम का सहयोग इस निर्भरता को कम करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
BrahMos Deal क्यों बदल सकती है एशिया की रणनीति?
Defense cooperation दोनों देशों के रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। वियतनाम भारत की BrahMos Supersonic Missile System में गहरी दिलचस्पी दिखा चुका है।
अगर यह डील फाइनल होती है, तो इसकी अनुमानित कीमत करीब 63 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। इसमें coastal anti-ship missile systems, training और logistics support शामिल हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि BrahMos deployment South China Sea में power balance बदल सकता है। फिलीपींस पहले ही भारत से BrahMos खरीद चुका है। अगर वियतनाम भी यह सिस्टम लेता है, तो भारत Indo-Pacific defense architecture में और मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।
भारत Indo-Pacific में क्यों मजबूत हो रहा है?
भारत अब सिर्फ South Asia power नहीं बल्कि Indo-Pacific strategic player के रूप में उभर रहा है। Quad partnership, naval cooperation, defense exports और maritime security में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
वियतनाम जैसे देशों के साथ सहयोग भारत की regional credibility मजबूत करता है।
वियतनाम की “Bamboo Diplomacy” क्या है?
वियतनाम अपनी विदेश नीति को “Bamboo Diplomacy” कहता है। इसका मतलब है लचीलापन, संतुलन और strategic autonomy।
यानी वियतनाम किसी एक महाशक्ति के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ना चाहता। वह चीन से आर्थिक संबंध बनाए रखते हुए भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भी मजबूत रणनीतिक साझेदारी बना रहा है।
भारत वियतनाम के लिए बेहतर साझेदार क्यों माना जा रहा?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की कुछ खास बातें वियतनाम को आकर्षित करती हैं। भारत का South China Sea में कोई territorial dispute नहीं है। भारत aggressive alliance politics नहीं करता और strategic autonomy को महत्व देता है।
इसके अलावा भारत का approach चीन के Belt and Road मॉडल से काफी अलग माना जाता है। भारत आमतौर पर institutional cooperation, defense partnership और technology collaboration पर ज्यादा जोर देता है।
भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?
भारत-वियतनाम रिश्तों के मजबूत होने से भारत को कई रणनीतिक फायदे मिल सकते हैं। इससे defense exports बढ़ेंगे, Indo-Pacific influence मजबूत होगा और China+1 supply chain strategy में भारत की भूमिका बढ़ सकती है।
इसके अलावा electronics manufacturing partnerships और maritime security cooperation में भी भारत को फायदा मिल सकता है।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
Observer Research Foundation (ORF) और Indo-Pacific policy experts लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि एशिया के छोटे और मध्यम आकार के देश अब “Strategic Hedging” की नीति अपना रहे हैं।
यानी वे चीन से पूरी तरह दूरी नहीं बनाना चाहते, लेकिन उसकी बढ़ती शक्ति के खिलाफ संतुलन भी तैयार कर रहे हैं। भारत इस balancing framework में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
क्या यह एशिया में नए शक्ति संतुलन का संकेत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया अब Cold War जैसे दो स्पष्ट गुटों में नहीं बंट रहा। इसके बजाय देश आर्थिक रूप से चीन से जुड़े रहना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा और रणनीतिक स्तर पर विकल्प भी तैयार कर रहे हैं।
वियतनाम इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।
निष्कर्ष
वियतनाम की हालिया रणनीति साफ दिखाती है कि आज की दुनिया में सिर्फ व्यापारिक संबंध काफी नहीं हैं। चीन के साथ ₹24 लाख करोड़ का व्यापार होने के बावजूद वियतनाम भारत के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को तेजी से मजबूत कर रहा है।
यह सिर्फ भारत-वियतनाम संबंधों की कहानी नहीं बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है, जहां देश आर्थिक मजबूरी और रणनीतिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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