अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की आक्रामक tariff policy एक बार फिर कानूनी संकट में घिर गई है। अमेरिकी अदालतों द्वारा ट्रंप प्रशासन के वैश्विक शुल्कों को लगातार अवैध ठहराए जाने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है। इसका असर अब भारत समेत उन देशों पर भी पड़ सकता है जो अमेरिका के साथ बड़े व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका के साथ proposed bilateral trade agreement (BTA) को अंतिम रूप देने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। उनका कहना है कि जब तक अमेरिका एक स्थिर और कानूनी रूप से भरोसेमंद trade framework तैयार नहीं करता, तब तक किसी दीर्घकालिक व्यापार प्रतिबद्धता में जोखिम बना रहेगा।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका की एक संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 10% global tariffs को “illegal” और “unauthorised by law” करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि इन शुल्कों के लिए जिस कानून का इस्तेमाल किया गया, वह राष्ट्रपति को इतनी व्यापक व्यापारिक शक्तियां नहीं देता।
अदालत ने ट्रंप की टैरिफ नीति पर क्या कहा?
अमेरिकी अदालत ने साफ कहा कि ट्रंप प्रशासन ने International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) और Trade Act 1974 की सीमाओं का उल्लंघन किया।
संयुक्त राज्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय ने 2-1 के फैसले में कहा कि राष्ट्रपति को इस तरह blanket global tariffs लगाने का अधिकार नहीं दिया गया था।
यह फैसला केवल कानूनी झटका नहीं बल्कि अमेरिका की trade policy credibility पर भी बड़ा सवाल माना जा रहा है।
भारत क्यों सतर्क हो गया है?
भारत और अमेरिका पिछले कुछ समय से bilateral trade agreement को लेकर बातचीत कर रहे हैं। लेकिन ट्रंप की tariff policy पर अदालतों के फैसलों ने स्थिति को जटिल बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि:
अगर अमेरिकी trade rules बार-बार अदालतों में रद्द होते रहे, तो किसी भी long-term trade deal की विश्वसनीयता कमजोर पड़ सकती है।
Economic think tank Global Trade Research Initiative (GTRI) के संस्थापक Ajay Srivastava ने कहा कि अमेरिका की tariff policy को लेकर जारी अनिश्चितता भारत के लिए चिंता का विषय है।
उनके मुताबिक:
“बार-बार कानूनी चुनौतियों का सामना कर रही trade policy के बीच भारत के लिए स्थायी व्यापार प्रतिबद्धता को सही ठहराना मुश्किल हो रहा है।”
भारत को क्या डर सता रहा है?
भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि:
- अमेरिका खुद अपने MFN tariffs कम करने को तैयार नहीं दिख रहा,
- जबकि भारत से market access बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है।
MFN यानी Most Favoured Nation status के तहत देश एक-दूसरे को न्यूनतम tariff treatment देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर:
- भारत अपने बाजार खोल दे,
- लेकिन बदले में अमेरिका tariff relief न दे,
तो trade agreement एकतरफा हो सकता है।
WTO Rules पर भी उठा सवाल
World Trade Organization (WTO) के पूर्व निदेशक Shishir Priyadarshi ने कहा कि अमेरिकी अदालत का फैसला यह संकेत देता है कि ट्रंप के global tariffs WTO norms के खिलाफ थे।
उन्होंने कहा कि:
“इन tariffs को रद्द किया जाना बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है।”
हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि:
- फैसला अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है,
- और अमेरिकी प्रशासन नए कानूनी रास्ते तलाश सकता है।
यानी uncertainty अभी खत्म नहीं हुई है।
मलेशिया क्यों पीछे हट गया?
रिपोर्ट्स के मुताबिक Malaysia पहले ही अमेरिका के साथ संभावित trade agreement को लेकर पीछे हट चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
- अमेरिकी tariff uncertainty,
- policy reversals,
- और legal challenges
की वजह से कई देश अब trade deals को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं। भारत भी इसी कारण जल्दबाजी से बचना चाहता है।
यह मामला वैश्विक व्यापार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया:
- US-China trade war,
- protectionism,
- sanctions,
- और geopolitical tariffs
के दौर से गुजर चुकी है। ट्रंप प्रशासन की aggressive tariff strategy ने global supply chains और international trade flows को काफी प्रभावित किया था। अब अमेरिकी अदालतों द्वारा उन्हीं tariffs को चुनौती मिलना:
- global trade order,
- WTO framework,
- और multilateral system
के लिए अहम माना जा रहा है।
क्या भारत की रणनीति बदल सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब:
- phased trade approach,
- limited sectoral agreements,
- और cautious negotiations
पर ज्यादा फोकस कर सकता है। भारत पहले ही:
- manufacturing push,
- PLI schemes,
- और strategic trade diversification
पर काम कर रहा है। ऐसे में unstable US tariff environment भारत को अधिक balanced trade strategy अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
Why It Matters
ट्रंप की tariff policy पर अमेरिकी अदालतों के फैसले केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति का मामला नहीं हैं। इनका असर global trade negotiations और emerging economies की रणनीति पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
क्या अमेरिका लंबे समय तक stable और predictable trade partner बना रह पाएगा?
अगर अमेरिकी trade policy लगातार अदालतों और राजनीतिक बदलावों के बीच फंसती रही, तो कई देश:
- नए trade alliances,
- regional agreements,
- और diversified export markets
की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं। यानी यह विवाद केवल tariffs का नहीं बल्कि future global trade order की दिशा का भी संकेत माना जा रहा है।
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