अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे समय बड़ा कानूनी झटका लगा है जब पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है और वैश्विक व्यापार बाजार पहले से दबाव में है। अमेरिका की फेडरल ट्रेड कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा घोषित 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि राष्ट्रपति प्रशासन ने 1974 के व्यापार कानून के तहत अपनी संवैधानिक सीमा से बाहर जाकर यह फैसला लिया था।
यह फैसला सिर्फ अमेरिकी राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार, आयात-निर्यात नीतियों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर ऐसे समय में जब अमेरिका, ईरान और तेल बाजार को लेकर पहले से अनिश्चितता बनी हुई है।
क्या था ट्रंप का ग्लोबल टैरिफ प्लान?
डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी में 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इसका मकसद अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना और घरेलू उद्योगों को सुरक्षा देना बताया गया था।
ट्रंप प्रशासन ने यह कदम 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत उठाया था। यह प्रावधान राष्ट्रपति को सीमित अवधि के लिए आयात पर अस्थायी शुल्क लगाने की अनुमति देता है। हालांकि अदालत ने माना कि इस कानून का इस्तेमाल जिस आधार पर किया गया, वह कानूनी रूप से उचित नहीं था।
कोर्ट ने क्यों रद्द किया टैरिफ?
फेडरल ट्रेड कोर्ट ने 2-1 के बहुमत से दिए फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने कानून की गलत व्याख्या की। कोर्ट के अनुसार:
- धारा 122 केवल विशेष “भुगतान-संतुलन संकट” (Balance of Payments Crisis) जैसी परिस्थितियों के लिए बनाई गई थी।
- ट्रंप प्रशासन ने इसे सामान्य व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे पर लागू करने की कोशिश की।
- यह कानून 1970 के दशक की अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक परिस्थितियों के लिए तैयार किया गया था, न कि आधुनिक वैश्विक व्यापार असंतुलन के लिए।
जज मार्क ए. बार्नेट और क्लेयर आर. केली ने अपने फैसले में कहा कि प्रशासन यह साबित नहीं कर सका कि कानून के तहत आवश्यक परिस्थितियां वास्तव में मौजूद थीं।
कोर्ट ने राष्ट्रपति की शक्तियों पर भी जताई चिंता
फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि अगर इस तरह की व्यापक व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए, तो भविष्य में कोई भी राष्ट्रपति लगभग असीमित टैरिफ लगाने की शक्ति हासिल कर सकता है। कोर्ट ने इसे शक्तियों के दुरुपयोग की संभावित स्थिति बताया।
अदालत ने माना कि व्यापार नीति और आर्थिक सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय हैं, लेकिन इसके लिए कानून की सीमाओं का पालन करना जरूरी है।
पहले भी ट्रंप की टैरिफ नीति पर उठ चुके हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप की टैरिफ नीति को कानूनी चुनौती मिली हो। इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट भी उनकी पिछली टैरिफ व्यवस्था को रद्द कर चुका है। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से चीन और अन्य देशों के खिलाफ आक्रामक व्यापार नीति अपनाता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका की भविष्य की व्यापार रणनीति पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है, खासकर अगर मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है।
एक जज ने ट्रंप के पक्ष में दिया समर्थन
हालांकि कोर्ट का फैसला पूरी तरह एकमत नहीं था। जज टिमोथी स्टैंसियू ने ट्रंप प्रशासन के पक्ष में राय दी। उनका कहना था कि अदालत को राष्ट्रपति के आर्थिक फैसलों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि “भुगतान-संतुलन घाटे” की व्याख्या को बहुत संकीर्ण तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।
अब आगे क्या होगा?
फेडरल ट्रेड कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अमेरिकी फेडरल सर्किट अपीलीय कोर्ट में अपील की जा सकती है। माना जा रहा है कि मामला अंततः फिर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है।
अगर ऊपरी अदालतें भी इस फैसले को बरकरार रखती हैं, तो यह अमेरिका में राष्ट्रपति की व्यापार संबंधी शक्तियों पर ऐतिहासिक सीमा तय कर सकता है।
वैश्विक बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?
इस फैसले का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी नजर आ सकता है। निवेशक पहले से ही ईरान-अमेरिका तनाव, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से चिंतित हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- टैरिफ रद्द होने से वैश्विक व्यापार तनाव कुछ कम हो सकता है
- आयात-निर्यात कंपनियों को राहत मिल सकती है
- अमेरिकी बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है
- डॉलर और कमोडिटी बाजारों पर असर देखने को मिल सकता है
ईरान संकट के बीच ट्रंप के लिए राजनीतिक चुनौती
यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। ईरान के साथ तनाव, तेल बाजार में अस्थिरता और घरेलू महंगाई पहले से अमेरिकी राजनीति में बड़ा मुद्दा बने हुए हैं।
ऐसे में कोर्ट का यह फैसला ट्रंप की आर्थिक नीतियों और राष्ट्रपति पद की शक्तियों पर एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी संदेश माना जा रहा है।
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