पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें लंबे समय से स्थिर बनी हुई हैं। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने साफ संकेत दिया है कि भारत के लिए लंबे समय तक ईंधन की कीमतों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित रखना आसान नहीं होगा। IMF ने भारत से अपील की है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों को वैश्विक बाजार के हिसाब से तय होने दिया जाए, क्योंकि लगातार बढ़ती लागत सरकारी तेल कंपनियों और सरकारी खजाने दोनों पर दबाव बढ़ा रही है।
70 डॉलर से 100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
ईरान संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल थीं। लेकिन हालात बिगड़ने के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर के आसपास पहुंच चुका है। कुछ समय के लिए कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक भी चली गई थीं।
इसके बावजूद भारत में आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी नहीं की गई। यही वजह है कि सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) पर भारी वित्तीय दबाव बन रहा है। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन कर रही हैं ताकि खुदरा कीमतें स्थिर रखी जा सकें।
तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का बोझ
सरकारी तेल कंपनियों के लिए यह स्थिति लंबे समय तक संभालना मुश्किल होता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनियां पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने के कारण लगातार नुकसान झेल रही हैं।
हालांकि सरकार ने अभी तक आम उपभोक्ताओं के लिए ईंधन कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन कुछ संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं। हाल ही में कमर्शियल LPG सिलेंडर, इंडस्ट्रियल डीजल, 5 किलो LPG सिलेंडर और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों के लिए जेट फ्यूल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। इससे यह माना जा रहा है कि सरकार धीरे-धीरे बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की ओर बढ़ सकती है।
IMF ने क्यों दी कीमतें बढ़ाने की सलाह?
IMF का मानना है कि बाजार के संकेतों को लंबे समय तक दबाने से आर्थिक असंतुलन पैदा हो सकता है। IMF के एशिया-प्रशांत विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा कि सरकार कुछ समय तक टैक्स कटौती और सब्सिडी के जरिए राहत दे सकती है, लेकिन यह रणनीति हमेशा नहीं चल सकती।
उन्होंने कहा कि किसी न किसी स्तर पर कीमतों को बाजार के हिसाब से तय होने देना होगा। IMF का तर्क है कि जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा महंगी हो रही है, तब कृत्रिम रूप से कीमतें कम रखने से मांग अधिक बनी रहती है और इससे सप्लाई संकट और बढ़ सकता है।
सरकार क्यों नहीं बढ़ाना चाहती कीमतें?
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा भी हैं। ईंधन महंगा होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुएं तक महंगी हो जाती हैं।
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद अब बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि सरकार कीमतों में संशोधन कर सकती है। हालांकि सरकार लगातार यह कहती रही है कि फिलहाल ऐसी कोई योजना नहीं है।
RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने हाल ही में कहा कि भारत की राजकोषीय स्थिति मजबूत है और सरकार आर्थिक दबावों को संभालने में सक्षम है। उनका कहना है कि भारत ने बेहतर वित्तीय प्रबंधन और मजबूत विकास दर के जरिए अपनी स्थिति को काफी मजबूत किया है।
क्या सब्सिडी मॉडल लंबे समय तक टिक पाएगा?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो सरकार के लिए सब्सिडी और टैक्स कटौती के जरिए राहत देना मुश्किल हो सकता है।
IMF का सुझाव है कि सार्वभौमिक राहत देने के बजाय जरूरतमंद वर्गों को लक्षित सहायता दी जाए। यानी सभी उपभोक्ताओं के लिए कीमतें दबाने के बजाय गरीब और कमजोर तबकों को सीधे आर्थिक सहायता दी जाए।
इस मॉडल से बाजार की वास्तविक कीमतें भी बनी रहेंगी और सरकार पर अनावश्यक वित्तीय बोझ भी कम होगा।
भारत के सामने बड़ी चुनौती
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी तरह का तनाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है।
अगर सरकार कीमतें बढ़ाती है तो महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा। लेकिन अगर कीमतें लंबे समय तक दबाकर रखी जाती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियों और सरकारी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
यही वजह है कि आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक फैसला भी बन सकती हैं। फिलहाल आम लोगों को राहत जरूर मिल रही है, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए यह राहत कितने समय तक जारी रहेगी, इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है।
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