भारत सरकार ने एक अहम नीतिगत कदम उठाते हुए पीली मटर (Yellow Peas) और उड़द दाल (Black Gram/Urad) के ड्यूटी-फ्री आयात की अवधि को मार्च 2027 तक बढ़ा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश में दालों की मांग लगातार ऊंची बनी हुई है, जबकि घरेलू उत्पादन कई बार इस मांग को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाता। सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है—खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, कीमतों को स्थिर रखना और बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना।
यह कदम केवल एक प्रशासनिक विस्तार नहीं, बल्कि भारत की पल्सेस (दलहन) रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं, किसानों, व्यापारियों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर पड़ता है।
ड्यूटी-फ्री आयात क्या है और सरकार इसे क्यों बढ़ाती है?
ड्यूटी-फ्री आयात का अर्थ है कि सरकार किसी विशेष वस्तु के आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी (Import Duty) को एक निश्चित अवधि के लिए हटा देती है। सामान्य परिस्थितियों में आयातित दालों पर शुल्क लगता है, जिससे घरेलू उत्पादकों को सुरक्षा मिलती है। लेकिन जब:
- बाजार में आपूर्ति कम हो
- कीमतें तेजी से बढ़ रही हों
- या खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) का जोखिम हो
तब सरकार अस्थायी रूप से ड्यूटी हटाकर सस्ते आयात को प्रोत्साहित करती है, ताकि कीमतें काबू में रहें।
पीली मटर और उड़द दाल के लिए यह छूट 2027 तक बढ़ाना इस बात का संकेत है कि सरकार मध्यम अवधि (medium term) में भी मांग-आपूर्ति के दबाव को लेकर सतर्क है।
भारत में दालों की मांग इतनी ज्यादा क्यों?
भारत दुनिया के सबसे बड़े दाल उपभोक्ता देशों में शामिल है। इसकी वजहें स्पष्ट हैं:
- भारतीय आहार में दालें प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं
- शाकाहारी आबादी का बड़ा हिस्सा दालों पर निर्भर है
- पारंपरिक भोजन—दाल-चावल, इडली, डोसा, वड़ा—इनके बिना अधूरा है
उड़द दाल का उपयोग दक्षिण भारतीय व्यंजनों (इडली, डोसा बैटर) से लेकर उत्तर भारतीय दाल माखनी तक होता है। वहीं पीली मटर स्नैक्स, बेसन जैसे मिश्रित आटे और प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है।
घरेलू उत्पादन बनाम मांग: क्यों जरूरी है आयात?
भारत में दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए वर्षों से प्रयास किए जा रहे हैं—MSP, बेहतर बीज, सिंचाई और तकनीक। इसके बावजूद:
- उत्पादन मानसून पर काफी निर्भर है
- खेती का क्षेत्र सीमित है
- उत्पादकता अभी भी विकसित देशों से कम है
ऐसे में जब मांग तेजी से बढ़ती है, तो आयात एक जरूरी सेफ्टी वाल्व बन जाता है।
पीली मटर खास तौर पर कनाडा और रूस जैसे देशों से आयात की जाती है, जबकि उड़द दाल का आयात म्यांमार और अफ्रीकी देशों से होता है।
कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?
ड्यूटी-फ्री आयात का सबसे सीधा असर कीमतों पर नियंत्रण के रूप में दिखता है।
संभावित फायदे:
- बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी
- थोक और खुदरा कीमतों में स्थिरता आएगी
- खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी
लेकिन एक संतुलन भी जरूरी:
यदि आयात बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो:
- घरेलू किसानों को कम कीमत मिल सकती है
- स्थानीय उत्पादन हतोत्साहित हो सकता है
इसलिए सरकार आमतौर पर संतुलित नीति अपनाती है—आयात की अनुमति भी और किसानों के लिए समर्थन भी।
किसानों पर असर: फायदा या नुकसान?
यह सबसे संवेदनशील पहलू है।
सकारात्मक पहलू:
- अगर कीमतें बहुत गिरने लगें, तो सरकार MSP और खरीद के जरिए समर्थन देती है
- स्थिर बाजार से दीर्घकाल में खेती का जोखिम कम होता है
नकारात्मक आशंका:
- सस्ते आयात से स्थानीय बाजार में दबाव बन सकता है
- खासकर छोटे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है
यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से सुझाव दे रहे हैं कि भारत को:
- दलहन उत्पादकता बढ़ाने
- भंडारण और सप्लाई चेन सुधारने
- और फसल विविधीकरण (crop diversification)
पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बड़ा फायदा
पीली मटर और उड़द दाल दोनों ही फूड प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए अहम कच्चा माल हैं।
ड्यूटी-फ्री आयात से:
- इनपुट कॉस्ट कम होती है
- मुनाफा बढ़ता है
- प्रतिस्पर्धा मजबूत होती है
विशेषकर स्नैक्स, रेडी-टू-ईट और प्रोटीन-आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को इससे बड़ा फायदा मिलता है।
पोषण और कृषि में दलहनों की भूमिका
दलहन सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा की रीढ़ हैं।
- उच्च प्रोटीन और फाइबर
- आयरन, पोटैशियम जैसे खनिज
- कम वसा (low fat)
इसके अलावा, कृषि के नजरिए से:
- ये नाइट्रोजन फिक्सेशन करती हैं
- मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं
- रासायनिक खाद की जरूरत कम करती हैं
इसलिए दलहन खेती सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
नीति का बड़ा संदेश: संतुलन और रणनीति
पीली मटर और उड़द के ड्यूटी-फ्री आयात को 2027 तक बढ़ाने का फैसला यह दिखाता है कि सरकार:
- अल्पकालिक राहत (short-term relief)
- और दीर्घकालिक रणनीति (long-term strategy)
दोनों पर एक साथ काम कर रही है। यह कदम संकेत देता है कि भारत अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हुआ है, लेकिन वह मांग-आपूर्ति संतुलन को सक्रिय नीति के जरिए मैनेज कर रहा है।
निष्कर्ष: उपभोक्ता राहत, लेकिन दीर्घकालिक चुनौती बरकरार
सरकार का यह फैसला फिलहाल उपभोक्ताओं और उद्योग के लिए राहत लेकर आएगा। कीमतों पर दबाव कम होगा और बाजार में स्थिरता बनी रहेगी। लेकिन दीर्घकाल में भारत के लिए असली चुनौती वही रहेगी—घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना।
अगर नीति का अगला चरण उत्पादन, तकनीक और किसानों की आय पर केंद्रित रहता है, तो भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि भविष्य में दालों के निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है।
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