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Reading: भारत की ग्लास इंडस्ट्री पर ऊर्जा संकट का असर: HNG ने झेला “Energy Shock”, लेकिन चुनौतियाँ अभी बाकी
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भारत की ग्लास इंडस्ट्री पर ऊर्जा संकट का असर: HNG ने झेला “Energy Shock”, लेकिन चुनौतियाँ अभी बाकी

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/26 at 10:37 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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भारत की मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग इंडस्ट्री में ग्लास सेक्टर हमेशा से एक अहम लेकिन कम चर्चा में रहने वाला हिस्सा रहा है। हाल ही में Hindusthan National Glass (HNG) के चीफ स्ट्रैटेजी ऑफिसर सुरज मेहता ने ANI को दिए बयान में इस सेक्टर की वास्तविक स्थिति को विस्तार से सामने रखा। उनके अनुसार, भारत की ग्लास इंडस्ट्री ने हालिया “Energy Shock” यानी ऊर्जा संकट को तो किसी तरह झेल लिया है, लेकिन लागत दबाव और गैस सप्लाई की अनिश्चितता अभी भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।

Contents
ग्लास इंडस्ट्री क्यों है सबसे अलग और संवेदनशील सेक्टर?पश्चिम एशिया संकट और भारत की ऊर्जा सप्लाई पर असरउत्पादन रुकना नहीं, लेकिन महंगा जरूर हो गयाLPG और LNG सप्लाई की समस्या: सबसे बड़ा bottleneckवैकल्पिक ईंधन ने बचाया उत्पादन, लेकिन लागत बढ़ा दीभारत की पैकेजिंग सप्लाई चेन पर असरकीमतों में बढ़ोतरी लेकिन कंपनियों ने पूरी लागत नहीं डाली ग्राहकों परसरकारी हस्तक्षेप ने दी आंशिक राहतभविष्य की सबसे बड़ी चुनौती: स्थिर ऊर्जा सप्लाईनिष्कर्ष: संकट से उबर गई इंडस्ट्री, लेकिन रास्ता आसान नहीं

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक कंपनी या एक सेक्टर की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे ग्लोबल भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता सीधे भारत की इंडस्ट्रीज को प्रभावित करती है।


ग्लास इंडस्ट्री क्यों है सबसे अलग और संवेदनशील सेक्टर?

ग्लास मैन्युफैक्चरिंग को अक्सर एक भारी उद्योग (heavy industry) माना जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत और चुनौती इसकी “continuous production requirement” है।

Hindusthan National Glass जैसे प्लांट्स 24×7 फर्नेस पर चलते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फर्नेस को बंद करना लगभग असंभव और बेहद खतरनाक होता है।

सुरज मेहता के अनुसार, यदि फर्नेस एक बार बंद हो जाए तो अंदर मौजूद पिघला हुआ ग्लास ठंडा होकर फैल सकता है, जिससे विस्फोट जैसी स्थिति भी बन सकती है। यही कारण है कि इस उद्योग में “डाउनटाइम” की कोई गुंजाइश नहीं होती।

यही संरचनात्मक बाध्यता ग्लास इंडस्ट्री को ऊर्जा संकट के दौरान सबसे ज्यादा कमजोर बना देती है।


पश्चिम एशिया संकट और भारत की ऊर्जा सप्लाई पर असर

हाल के समय में पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। भारत जैसे देश, जो प्राकृतिक गैस और एलएनजी (LNG) का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन जाती है।

ग्लास इंडस्ट्री प्राकृतिक गैस और फर्नेस ऑयल (LSHS) पर बहुत अधिक निर्भर है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बाधित होती है, इसका सीधा असर उत्पादन लागत और उपलब्धता दोनों पर पड़ता है।

HNG के अनुसार, संकट के चरम पर कई प्लांट्स में गैस की सप्लाई बेहद सीमित हो गई थी, जिससे कंपनियों को वैकल्पिक ईंधन अपनाना पड़ा।


उत्पादन रुकना नहीं, लेकिन महंगा जरूर हो गया

ग्लास इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा चैलेंज यह नहीं था कि उत्पादन बंद हो गया, बल्कि यह था कि उत्पादन बहुत ज्यादा महंगा हो गया।

कंपनी ने बताया कि संकट के दौरान ऊर्जा लागत में लगभग 67% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह एक बहुत बड़ा झटका था, खासकर तब जब कंपनियाँ पहले से ही पोस्ट-इंसॉल्वेंसी रिकवरी मोड में थीं।

Hindusthan National Glass के लिए यह स्थिति और जटिल इसलिए हो गई क्योंकि कंपनी ने हाल ही में सितंबर 2025 में insolvency से बाहर निकलकर पुनर्गठन शुरू किया था।

इस समय ऊर्जा लागत का अचानक बढ़ना किसी भी कंपनी के लिए वित्तीय संतुलन बिगाड़ सकता है।


LPG और LNG सप्लाई की समस्या: सबसे बड़ा bottleneck

ग्लास निर्माण में LPG और LNG दोनों का उपयोग अलग-अलग प्लांट्स में किया जाता है। लेकिन संकट के दौरान:

  • कुछ प्लांट्स में गैस सप्लाई बहुत सीमित हो गई
  • कुछ जगहों पर LPG सिर्फ 10% क्षमता पर उपलब्ध थी
  • पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी ने समस्या को और बढ़ाया

विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां पाइपलाइन गैस उपलब्ध नहीं थी, कंपनियों को propane जैसे महंगे विकल्पों पर निर्भर होना पड़ा।

यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं था, बल्कि आर्थिक रूप से भी भारी नुकसान देने वाला था।


वैकल्पिक ईंधन ने बचाया उत्पादन, लेकिन लागत बढ़ा दी

जब प्राकृतिक गैस की सप्लाई बाधित हुई, तो कंपनियों के पास दो ही विकल्प थे:

  1. उत्पादन रोक दें (जो संभव नहीं था)
  2. वैकल्पिक ईंधन पर शिफ्ट करें (जो महंगा था)

अधिकांश कंपनियों ने दूसरा विकल्प चुना।

Badli प्लांट जैसे स्थानों पर फर्नेस ऑयल का उपयोग बढ़ गया, जो प्राकृतिक गैस की तुलना में काफी महंगा है। कंपनी ने इसे “huge cost disadvantage” बताया।

हालांकि यह कदम मजबूरी में उठाया गया था, लेकिन इससे इंडस्ट्री के मार्जिन पर सीधा असर पड़ा।


भारत की पैकेजिंग सप्लाई चेन पर असर

ग्लास सिर्फ एक उत्पाद नहीं है, यह एक पूरी सप्लाई चेन का हिस्सा है।

Hindusthan National Glass जैसी कंपनियाँ मुख्य रूप से इन सेक्टर्स को सप्लाई करती हैं:

  • फार्मास्यूटिकल पैकेजिंग
  • फूड एंड बेवरेज इंडस्ट्री
  • अल्कोहल और बेवरेज सेक्टर

इन सभी क्षेत्रों में ग्लास पैकेजिंग एक जरूरी घटक है। इसलिए जब ग्लास इंडस्ट्री प्रभावित होती है, तो इसका असर सीधे FMCG, दवा और खाद्य उद्योगों पर भी पड़ता है।

यह स्थिति एक “chain reaction” की तरह काम करती है, जहां एक सेक्टर की समस्या पूरे इकोसिस्टम को प्रभावित करती है।


कीमतों में बढ़ोतरी लेकिन कंपनियों ने पूरी लागत नहीं डाली ग्राहकों पर

ऊर्जा और कच्चे माल की लागत बढ़ने से ग्लास बॉटल्स की कीमतों में लगभग 15-20% तक की बढ़ोतरी देखी गई।

लेकिन कंपनी ने यह भी बताया कि उन्होंने पूरी लागत ग्राहकों पर नहीं डाली।

यह निर्णय रणनीतिक था, क्योंकि:

  • मांग को स्थिर रखना जरूरी था
  • FMCG सेक्टर पहले से दबाव में था
  • पूरी लागत ट्रांसफर करने से ऑर्डर घट सकते थे

इसलिए कंपनियों ने “partial cost pass-through” मॉडल अपनाया, जिससे वे बाजार में बने रह सकें।


सरकारी हस्तक्षेप ने दी आंशिक राहत

संकट के दौरान भारत सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

कुछ प्लांट्स में गैस सप्लाई सुधारने के लिए सरकारी हस्तक्षेप किया गया, जिससे उत्पादन पूरी तरह रुकने से बच गया।

हालांकि यह राहत अस्थायी थी, लेकिन इसने इंडस्ट्री को collapse होने से जरूर बचाया।


भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती: स्थिर ऊर्जा सप्लाई

HNG के अधिकारी के अनुसार, स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। वैश्विक बाजार में अस्थिरता बनी हुई है, और सप्लाई चेन बार-बार प्रभावित हो सकती है।

सबसे बड़ी जरूरत है:

  • स्थिर प्राकृतिक गैस सप्लाई
  • पाइप्ड गैस नेटवर्क का विस्तार
  • ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करना
  • वैकल्पिक ईंधन पर निर्भरता कम करना

यदि यह सुधार नहीं हुए, तो भारत की ग्लास इंडस्ट्री लगातार लागत दबाव में रहेगी।


निष्कर्ष: संकट से उबर गई इंडस्ट्री, लेकिन रास्ता आसान नहीं

भारत की ग्लास इंडस्ट्री ने यह साबित कर दिया है कि वह संकट झेल सकती है, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया है कि उसकी संरचना बेहद संवेदनशील है।

Hindusthan National Glass जैसे खिलाड़ियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब survival नहीं, बल्कि stability है।

पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अस्थिरता आने वाले समय में भी जोखिम बनाए रखेगी।

ग्लास इंडस्ट्री ने “Energy Shock” को झेल लिया है, लेकिन यह कहानी खत्म नहीं हुई है। असली परीक्षा अब लागत नियंत्रण, सप्लाई स्थिरता और दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति की होगी।

भारत जैसे तेजी से बढ़ते औद्योगिक देश के लिए यह सेक्टर सिर्फ पैकेजिंग नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन की रीढ़ है—और इसे मजबूत बनाए रखना अब नीति और उद्योग दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

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TAGGED: Energy Shock, Furnace Oil, Gas Supply Crisis, Glass Industry India, HNG, Indian Economy 2026, industrial costs, LPG LNG Shortage, Manufacturing Sector, Packaging Industry, West Asia conflict
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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