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Reading: भारत में कैश और डिजिटल पेमेंट्स दोनों में तेज़ उछाल: SBI की रिपोर्ट ने खोला “Cash Paradox” का सच
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बिजनेस न्यूज़

भारत में कैश और डिजिटल पेमेंट्स दोनों में तेज़ उछाल: SBI की रिपोर्ट ने खोला “Cash Paradox” का सच

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/26 at 10:38 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा मजबूत हुई है कि देश तेजी से कैशलेस सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। लेकिन State Bank of India (SBI) की ताज़ा रिसर्च रिपोर्ट इस धारणा को एक दिलचस्प मोड़ देती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में न सिर्फ डिजिटल पेमेंट्स बढ़ रहे हैं, बल्कि नकदी (Cash in Circulation) भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है। इसी विरोधाभासी स्थिति को SBI ने “Cash Paradox” नाम दिया है।

Contents
भारत में “Cash Paradox” क्या है और यह क्यों अहम है?UPI का तेज़ विस्तार: भारत की डिजिटल रीढ़नकदी की बढ़ती मांग: भारत क्यों अब भी कैश पर भरोसा करता है?GDP और कैश ग्रोथ: क्या अर्थव्यवस्था कैश को बढ़ा रही है?डिजिटल और कैश: प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सह-अस्तित्वनोटों का बदलता ट्रेंड: बड़े नोटों का दबदबाCBDC की धीमी रफ्तार: डिजिटल रुपये की चुनौतीभारत की वित्तीय तस्वीर: आगे क्या संकेत देती है रिपोर्ट?निष्कर्ष: Cash Paradox असल में क्या बताता है?

यह ट्रेंड सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती आर्थिक संरचना, व्यवहारिक आदतों और अनिश्चितताओं को भी दर्शाता है। एक तरफ UPI जैसे डिजिटल सिस्टम रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग नकदी को भी उतनी ही मजबूती से पकड़कर रख रहे हैं।

भारत में “Cash Paradox” क्या है और यह क्यों अहम है?

SBI की रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि भारत में कैश और डिजिटल पेमेंट्स एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक साथ बढ़ रहे हैं। आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि डिजिटल पेमेंट्स बढ़ने पर नकदी की मांग घटेगी, लेकिन भारत में तस्वीर इसके उलट दिख रही है।

रिपोर्ट बताती है कि Currency in Circulation (CiC) FY26 में 11.9% बढ़कर ₹41.6 ट्रिलियन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई है। यह 2016 के नोटबंदी के बाद सबसे तेज वृद्धि मानी जा रही है।

इसी समय UPI ट्रांजैक्शन भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। डिजिटल पेमेंट्स का कुल मूल्य ₹314 ट्रिलियन तक पहुंच गया है और ट्रांजैक्शन वॉल्यूम 241.6 बिलियन को पार कर चुका है।

यह स्थिति साफ बताती है कि भारत का भुगतान सिस्टम “Either-Or” नहीं बल्कि “Both-Together” मॉडल पर काम कर रहा है।

UPI का तेज़ विस्तार: भारत की डिजिटल रीढ़

Unified Payments Interface (UPI) भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बन चुका है। छोटे से लेकर बड़े ट्रांजैक्शन तक, UPI ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है।

SBI रिपोर्ट के अनुसार:

  • डिजिटल ट्रांजैक्शन वैल्यू में 20.6% की वृद्धि दर्ज की गई
  • ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में 30% की तेज़ बढ़ोतरी हुई
  • लगभग 86% छोटे व्यापारी (P2M) और 60% P2P ट्रांजैक्शन ₹500 से कम के हैं

यह आंकड़े दिखाते हैं कि UPI ने छोटे भुगतानों के लिए नकदी की जगह काफी हद तक ले ली है। किराना दुकान, चाय स्टॉल, ऑटो किराया, ऑनलाइन शॉपिंग—हर जगह UPI अब डिफॉल्ट विकल्प बन चुका है।

फिर भी, यह पूरी तरह कैश को खत्म नहीं कर पाया है, और यहीं से “Cash Paradox” की कहानी शुरू होती है।

नकदी की बढ़ती मांग: भारत क्यों अब भी कैश पर भरोसा करता है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब डिजिटल पेमेंट्स इतना बढ़ रहे हैं, तो कैश भी क्यों बढ़ रहा है?

SBI रिपोर्ट इस सवाल का जवाब कई स्तरों पर देती है। सबसे महत्वपूर्ण कारण है “Precautionary Motive”—यानी अनिश्चितता के समय लोग नकदी अपने पास रखना सुरक्षित मानते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, per capita cash holding और ATM withdrawals के बीच का अंतर FY24 में ₹1,804 था, जो FY26 में बढ़कर ₹9,127 हो गया। यह लगभग पांच गुना वृद्धि है।

इसका मतलब साफ है—लोग ATM से पैसे निकालकर ज्यादा कैश अपने पास रख रहे हैं, बजाय इसे डिजिटल रूप में खर्च करने के।

इसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं:

  • आर्थिक अनिश्चितता का डर
  • सामाजिक मीडिया से बढ़ी हुई वित्तीय चिंता
  • ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नकदी की आदत
  • आपात स्थिति के लिए कैश रखना

भारत जैसे विविध आर्थिक संरचना वाले देश में कैश सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि “सुरक्षा की भावना” भी है।

GDP और कैश ग्रोथ: क्या अर्थव्यवस्था कैश को बढ़ा रही है?

SBI की रिपोर्ट एक और दिलचस्प बात सामने रखती है—भारत की आर्थिक वृद्धि भी कैश की मांग को बढ़ा रही है।

FY12 से FY26 के बीच भारत की per capita GDP में 9.4% CAGR की वृद्धि हुई है। वहीं per capita cash in circulation में 9.0% की वृद्धि देखी गई है।

इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, वैसे-वैसे नकदी की मांग भी समानांतर रूप से बढ़ रही है।

यह संकेत देता है कि भारत में कैश का उपयोग केवल पिछड़ेपन का संकेत नहीं है, बल्कि यह आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का भी हिस्सा है।

डिजिटल और कैश: प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सह-अस्तित्व

भारत की पेमेंट प्रणाली को समझने के लिए यह जरूरी है कि इसे “competition” के बजाय “co-existence” के रूप में देखा जाए।

UPI ने जहां छोटे और त्वरित भुगतान को आसान बनाया है, वहीं कैश अभी भी कई क्षेत्रों में जरूरी बना हुआ है:

  • अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (informal sector)
  • ग्रामीण बाजार
  • दैनिक मजदूरी भुगतान
  • व्यक्तिगत बचत और इमरजेंसी फंड

SBI की रिपोर्ट स्पष्ट कहती है कि दोनों सिस्टम एक-दूसरे को पूरी तरह replace नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक hybrid financial ecosystem बना रहे हैं।

नोटों का बदलता ट्रेंड: बड़े नोटों का दबदबा

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण पहलू नोटों के उपयोग का है। ₹500 का नोट कुल कैश वैल्यू का लगभग 86% हिस्सा बन चुका है।

यह दर्शाता है कि लोग ज्यादा मूल्य वाले नोटों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे स्टोरेज और लेन-देन आसान हो जाता है।

हालांकि, RBI के निर्देशों के बाद ₹100 के नोटों की उपलब्धता भी बढ़ी है। मार्च 2025 में जहां इसका हिस्सा 6.2% था, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर 8.2% हो गया है।

यह बदलाव छोटे लेन-देन को सुचारू बनाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

CBDC की धीमी रफ्तार: डिजिटल रुपये की चुनौती

भारत ने Central Bank Digital Currency (CBDC) की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन इसका उपयोग अभी बहुत सीमित है।

रिपोर्ट के अनुसार CBDC की कुल सर्कुलेशन लगभग ₹1,016 करोड़ है, जो कुल कैश सर्कुलेशन का सिर्फ 0.02% है।

यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल रुपये को अभी आम जनता में लोकप्रिय बनाने के लिए बड़े प्रयासों की जरूरत है।

इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

  • कम जागरूकता
  • सीमित उपयोग केस
  • UPI की मजबूत पकड़
  • डिजिटल भरोसे की कमी

भारत की वित्तीय तस्वीर: आगे क्या संकेत देती है रिपोर्ट?

SBI की रिपोर्ट सिर्फ वर्तमान स्थिति नहीं दिखाती, बल्कि भविष्य के संकेत भी देती है। भारत का वित्तीय सिस्टम अब एक ऐसे चरण में पहुंच चुका है जहां कोई भी एक माध्यम पूरी तरह dominant नहीं है।

आने वाले वर्षों में यह ट्रेंड और मजबूत हो सकता है कि:

  • UPI और डिजिटल पेमेंट्स और बढ़ेंगे
  • कैश भी समानांतर रूप से बना रहेगा
  • CBDC धीरे-धीरे अपनी जगह बनाएगा
  • ग्रामीण और शहरी उपयोग पैटर्न अलग-अलग रहेंगे

भारत का भुगतान सिस्टम अब “transition phase” से आगे बढ़कर “hybrid maturity phase” में प्रवेश कर चुका है।

निष्कर्ष: Cash Paradox असल में क्या बताता है?

SBI की रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अभी पूरी तरह डिजिटल या पूरी तरह कैश-आधारित अर्थव्यवस्था नहीं है। यह एक संतुलित मिश्रण की ओर बढ़ रहा है, जहां दोनों सिस्टम अपनी-अपनी जगह पर मजबूत हैं।

“Cash Paradox” असल में विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक विविधता का प्रतिबिंब है।

एक तरफ तकनीक लोगों के हाथों में तेजी से डिजिटल भुगतान दे रही है, वहीं दूसरी तरफ भरोसा, सुरक्षा और आदतें अभी भी नकदी को मजबूती से थामे हुए हैं।

भारत की असली ताकत शायद इसी संतुलन में छिपी है—जहां पुराना और नया, दोनों साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं।

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TAGGED: Cash Paradox, Cash vs Digital, CBDC India, Currency in Circulation, Digital Payments, Financial Trends India, Indian Economy 2026, RBI, SBI Report, UPI India
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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