नई दिल्ली: भारत में हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देशभर में मॉनसून 2025 के बाद लगभग 73 प्रतिशत कुएं में भूजल स्तर में वृद्धि दर्ज की गई है। यह आंकड़ा पिछले दशक (2015–2024) के औसत की तुलना में है और इसे लोकसभा में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री C.R. पाटिल ने साझा किया।
मंत्री ने बताया कि केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से 2022 से लगातार किया जा रहा वार्षिक मूल्यांकन दर्शाता है कि देश में कुल भूजल रिचार्ज 2017 में 432 अरब क्यूबिक मीटर (BCM) से बढ़कर 2025 में 448.52 BCM तक पहुँच गया है।
सुरक्षित और अधिक-उपयोग वाले क्षेत्र में बदलाव
C.R. पाटिल ने कहा कि ‘सुरक्षित’ भूजल मूल्यांकन इकाइयों का हिस्सा बढ़कर 62.6 प्रतिशत से 73.14 प्रतिशत हो गया है, जबकि अत्यधिक उपयोग वाले क्षेत्र घटकर 17.2 प्रतिशत से 10.8 प्रतिशत रह गए हैं। यह संकेत देता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भूजल की स्थिति में सुधार हो रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, देशभर में 13,875 कुओं का विश्लेषण किया गया, जिनमें से 10,164 कुएं में जल स्तर बढ़ा, जबकि 3,662 कुएं में गिरावट दर्ज की गई।
मंत्री ने यह भी कहा कि हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति अनुकूल है, कुछ क्षेत्रों में मौसमी भूजल तनाव देखा जा रहा है। इसके कारणों में शामिल हैं:
- अधिक जनसंख्या और शहरीकरण
- जल-गहन फसलों की पैदावार
- कृषि और उद्योग में पानी की अत्यधिक मांग
- असंगत सिंचाई प्रथाएं
- जलवायु परिवर्तन
राज्य विशेष विवरण: कर्नाटक
कर्नाटक में 237 मूल्यांकन इकाइयों (तालुक) में से 45 इकाइयां (18.99%) ‘अत्यधिक उपयोग’ श्रेणी में आती हैं, जहां वार्षिक भूजल निकासी उपलब्ध भूजल संसाधन से अधिक है।
अन्य श्रेणियाँ इस प्रकार हैं:
- ‘संकटग्रस्त’ – 11 इकाइयां (4.64%)
- ‘अर्ध-संकटग्रस्त’ – 36 इकाइयां (15.19%)
- ‘सुरक्षित’ – 145 इकाइयां (61.18%)
मंत्री ने स्पष्ट किया कि भूजल प्रबंधन राज्य का विषय है, और इसके लिए मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। केंद्र तकनीकी और वित्तीय सहायता विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रदान करता है।
जल संरक्षण और कृत्रिम रिचार्ज के प्रयास
सरकार ने बताया कि ‘जल शक्ति अभियान’ के तहत अब तक देशभर में दो करोड़ से अधिक जल संरक्षण और कृत्रिम रिचार्ज कार्य किए गए हैं।
कर्नाटक में लगभग 17.62 लाख कार्य किए गए हैं, जिसमें बेंगलुरु शहरी जिले में 33,259 और बेंगलुरु ग्रामीण जिले में 18,837 कार्य शामिल हैं। छत्तीसगढ़ में 4.97 लाख कार्य किए गए।
इसके अतिरिक्त, ‘जल संचय जन भागीदारी’ पहल, जो 2024 में शुरू हुई थी, का उद्देश्य बरसाती जल संचयन को जन आंदोलन में बदलना है। इस योजना के तहत अब तक 50 लाख से अधिक रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और कृत्रिम रिचार्ज संरचनाएँ बनाई गई हैं।
कर्नाटक में 2.52 लाख और छत्तीसगढ़ में 7.26 लाख संरचनाएं बनाई गई हैं।
कृत्रिम रिचार्ज और जलाशयों का विकास
- देशभर में 38,000 से अधिक कृत्रिम रिचार्ज कार्य भी MGNREGS और वित्त आयोग अनुदानों के माध्यम से बनाए गए और जियो-टैग किए गए हैं।
- ‘मिशन अमृत सरोवर’ के तहत अब तक लगभग 69,000 जलाशयों का विकास या पुनरुद्धार किया गया है, जिसमें कर्नाटक में 4,056 और छत्तीसगढ़ में 2,901 शामिल हैं।
साथ ही, आर्टिफिशियल रिचार्ज मास्टर प्लान (2020) राज्यों को दिशानिर्देश के रूप में साझा किया गया है, ताकि वे प्रभावी रिचार्ज संरचनाओं को लागू कर सकें।
भूजल सुधार में मूलभूत संकेत
विशेषज्ञों के अनुसार, यह आंकड़ा यह दिखाता है कि भारत में भूजल संरक्षण और कृत्रिम रिचार्ज योजनाओं का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है।
- सुरक्षित क्षेत्र का बढ़ना,
- अत्यधिक उपयोग वाले क्षेत्रों में कमी,
- और व्यापक रिचार्ज प्रयास
यह संकेत देते हैं कि सरकार की नीतियाँ और योजनाएँ प्रभावी हो रही हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि स्थानीय जल संकट अभी भी गंभीर चुनौती है। बड़े शहरों, जल-गहन उद्योगों और अत्यधिक सिंचित फसलों वाले क्षेत्रों में सतत निगरानी और नवीन तकनीकों की आवश्यकता बनी हुई है।
भविष्य की दिशा और सुझाव
- स्थानीय सहभागिता बढ़ाना: समुदाय आधारित जल संचयन और संरक्षण मॉडल को और प्रोत्साहित करना।
- स्मार्ट तकनीक का उपयोग: ड्रोन, GIS और IoT सेंसर के माध्यम से भूजल स्तर की निगरानी।
- सिंचाई में सुधार: जल-गहन फसलों के स्थान पर कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहित करना।
- शहरी जल प्रबंधन: शहरों में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और जल पुनर्चक्रण को अनिवार्य बनाना।
इन उपायों के साथ, सरकार की योजना है कि भूजल संसाधनों की स्थिरता को सुनिश्चित किया जा सके और भविष्य में संभावित जल संकट से निपटा जा सके।
निष्कर्ष
2025 के मॉनसून के बाद भूजल स्तर में 73% कुओं में वृद्धि एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि जल संरक्षण, कृत्रिम रिचार्ज और राज्य-केन्द्र सहयोग का प्रभाव दिखाई दे रहा है।
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समस्याएँ बनी हुई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भूजल प्रबंधन में सतत निगरानी, तकनीकी सुधार और समुदाय सहभागिता अनिवार्य है।
इस डेटा से स्पष्ट होता है कि भारत धीरे-धीरे भूजल संकट से निपटने और सतत जल संसाधन सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ रहा है।
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