ईरान युद्ध के कारण तेल संकट के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति से न केवल घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित की बल्कि पड़ोसी देशों को ईंधन मुहैया कराकर स्थिरता भी प्रदान की।
जैसे‑जैसे पश्चिम एशिया में Iran युद्ध ने खाड़ी के ऊर्जा मार्गों और तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है, वैश्विक तेल कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और कई देश तेल एवं गैस संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे संकट के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति और विदेश नीति के जरिए न केवल अपनी जरूरतें सुरक्षित रखी हैं बल्कि पड़ोसी देशों को भी समर्थन प्रदान किया है, जिससे वह एक stabiliser यानी स्थिरता का स्तंभ के तौर पर उभरा है।
पश्चिम एशिया युद्ध और तेल संकट की पृष्ठभूमि
पश्चिम एशिया में Iran के खिलाफ युद्ध तथा Strait of Hormuz (होर्मुज जलडमरूमध्य) में अवरोध ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। यह संकरा मार्ग विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है, और युद्ध के कारण यहाँ की आपूर्ति में भारी बाधा आई है। इससे तेल की कीमतें बढ़ गईं और कई देशों में ईंधन संकट के खतरे बढ़े।
भारत का स्थिर और सहायक रोल
चुनौतियों के बावजूद भारत ने कई कदम उठाए हैं जिससे वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखते हुए पड़ोसी देशों के लिए सहायता का स्रोत भी बना है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
ईंधन आपूर्ति बनाए रखना
भारत, जो दुनिया का एक बड़ा तेल रिफ़ाइनर और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है, ने अपनी घरेलू मांग पूरी करने के साथ ही पड़ोसी देशों को ईंधन प्रदान करने की प्रक्रिया जारी रखी। श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों को ईंधन उपलब्ध कराना इस संबंध को मजबूत करता है।
पड़ोसी देशों के लिए निरंतर सप्लाई
भारत ने कई देशों को निरंतर ईंधन सप्लाई जारी रखी है—उदाहरण के लिए श्रीलंका, नेपाल और भूटान को आपूर्ति बाधित नहीं हुई, और बांग्लादेश को भी अतिरिक्त डीज़ल भेजने की योजना बनाई जा रही है।
आपूर्ति Diversification
भारत ने अपने तेल स्रोतों को diversify किया है, और अब होर्मुज़ स्ट्रेट पर निर्भरता कम करके 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है। इससे भारत निर्यात क्षेत्र की सप्लाई बाधाओं को काफी हद तक कम करने में सफल रहा है।
60 दिनों तक पर्याप्त तेल भंडार
सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत के पास लगभग 60 दिनों तक तेल की आपूर्ति के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद रहे, जिससे घरेलू बिक्री और ईंधन उपलब्धता स्थिर रहे।
सरकार के कदम और नीतियाँ
पश्चिम एशिया संकट की वजह से भारत ने कई अहम नीतिगत फैसले भी लिए हैं:
- विशेष करों में कटौती: पेट्रोल और डीज़ल पर विशेष अतिरिक्त शुल्क को कम कर महंगाई पर नियंत्रण रखा गया।
- ऊर्जा आपूर्ति की समीक्षा: रक्षा और ऊर्जा मंत्रालयों ने उच्च स्तर की बैठकों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित की।
- डिप्लोमैटिक संवाद: प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय ने खाड़ी के प्रमुख देशों के नेतृत्व से बातचीत की ताकि आपूर्ति चैनलों को सुरक्षित रखा जा सके।
दूसरे देशों पर प्रभाव और भारत की भूमिका
जब कई एशियाई देश जैसे फ़िलीपींस और थाईलैंड ईंधन की कीमतों में उछाल और आपूर्ति संकट का सामना कर रहे हैं, भारत ने स्थिरता प्रदान करने वाले देशों में अपनी भूमिका मजबूत की है। इससे पड़ोसी देशों और दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों को प्राथमिक ऊर्जा संसाधन उपलब्ध करवाए जा सके।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध से उत्पन्न वैश्विक तेल संकट के बीच भारत ने न केवल अपने घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया, बल्कि पड़ोसी देशों के लिए ईंधन सप्लाई जारी रखकर एक stabiliser की भूमिका निभाई। यह कदम अपनी Neighborhood First नीति और diversified energy sourcing रणनीति का परिणाम है, जिसने संकट के समय में भारत को दोनों—खुद की और अन्य देशों की—ऊर्जा आवश्यकताओं को संतुलित रखने में सक्षम बनाया।
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Author: Namam Sharma
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Namam Sharma NewsJagran में बिज़नेस और फाइनेंस खबरों को कवर करते हैं।
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