Kalyan Silks Misleading Advertisement Case: केरल में एक मशहूर कपड़ा कंपनी का प्रमोशनल ऑफर उसके लिए भारी पड़ गया। कंपनी ने ओणम के मौके पर अखबार में ऐसा विज्ञापन प्रकाशित किया था, जिसमें ₹3,000 की खरीदारी पर ₹1,500 का शॉपिंग बेनिफिट देने का दावा किया गया था। विज्ञापन देखकर एक 81 वर्षीय ग्राहक खरीदारी करने शोरूम पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें ऑफर की ऐसी शर्तें बताई गईं, जो विज्ञापन में किए गए प्रमुख दावे से काफी अलग थीं। मामला जिला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा और आयोग ने कंपनी के खिलाफ फैसला सुनाते हुए ग्राहक को कुल ₹31,500 देने का आदेश दिया।
अखबार में दिया गया था ₹1,500 के फायदे का दावा
यह पूरा मामला केरल में ओणम के दौरान चलाए गए एक प्रमोशनल कैंपेन से जुड़ा है। आयोग के आदेश के अनुसार, 81 वर्षीय शिकायतकर्ता ने 12 अगस्त 2023 को एक अखबार में Kalyan Silks का फुल-पेज विज्ञापन देखा था।
विज्ञापन में बड़े और प्रमुख अक्षरों में बताया गया था कि ₹3,000 की खरीदारी करने पर ग्राहक को ₹1,500 का शॉपिंग बेनिफिट मिलेगा।
ऑफर देखकर ग्राहक ने कंपनी के शोरूम से खरीदारी करने का फैसला किया। इसके बाद वह 27 अगस्त 2023 को अपने बेटे और बहू के साथ शोरूम पहुंचे और वहां से करीब ₹4,055 के कपड़े खरीदे।
लेकिन खरीदारी पूरी होने के बाद उन्हें पता चला कि विज्ञापन में बताए गए ₹1,500 का लाभ उन्हें सीधे या तत्काल नहीं मिलने वाला था।
₹1,500 का फायदा लेने के लिए रखी गई थीं कई शर्तें
ग्राहक का आरोप था कि शोरूम में खरीदारी करने के बाद उन्हें बताया गया कि ₹1,500 का लाभ लेने के लिए उन्हें तीन अलग-अलग कूपन दिए जाएंगे।
इन कूपन की कीमत ₹500-₹500 थी। लेकिन इनका इस्तेमाल भी तुरंत नहीं किया जा सकता था।
शिकायत के मुताबिक, प्रत्येक ₹500 के कूपन को इस्तेमाल करने के लिए ग्राहक को अलग-अलग महीनों में कम से कम ₹1,500 की अतिरिक्त खरीदारी करनी थी। यानी तीनों कूपन का लाभ लेने के लिए ग्राहक को सितंबर, अक्टूबर और नवंबर 2023 में अलग-अलग खरीदारी करनी पड़ती।
इस तरह ग्राहक के अनुसार, जिस ऑफर को विज्ञापन में सीधे तौर पर ₹3,000 की खरीदारी पर ₹1,500 का लाभ बताया गया था, उसकी वास्तविक स्थिति काफी अलग थी।
ग्राहक ने कहा- शर्तें फाइन प्रिंट में छिपाई गई थीं
शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता आयोग के सामने यह भी आरोप लगाया कि ऑफर की महत्वपूर्ण शर्तें विज्ञापन में बहुत छोटे अक्षरों में लिखी गई थीं।
उनका कहना था कि विज्ञापन का मुख्य संदेश एक आम ग्राहक को यही समझाता था कि ₹3,000 की खरीदारी करने पर उसे ₹1,500 का फायदा मिलेगा। लेकिन जब ग्राहक ऑफर का लाभ लेने शोरूम पहुंचता है, तब उसे अतिरिक्त खरीदारी और अलग-अलग कूपन से जुड़ी शर्तों की जानकारी दी जाती है।
आयोग ने इसी पहलू को मामले में महत्वपूर्ण माना।
₹4,055 की खरीदारी के बाद शुरू हुआ विवाद
ग्राहक ने 27 अगस्त 2023 को शोरूम से ₹4,055 की खरीदारी की थी। उनका कहना था कि उन्होंने विज्ञापन में बताए गए ऑफर को ध्यान में रखते हुए खरीदारी की थी।
लेकिन खरीदारी के बाद जब उन्हें ऑफर की वास्तविक शर्तों के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने कंपनी के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
जब कंपनी की ओर से उन्हें संतोषजनक समाधान नहीं मिला, तो मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंच गया।
बिल को लेकर भी ग्राहक ने की शिकायत
मामले में सिर्फ प्रमोशनल ऑफर ही विवाद का विषय नहीं था। ग्राहक ने अपने टैक्स इनवॉइस को लेकर भी शिकायत की।
उनके अनुसार, खरीदारी के समय दिया गया बिल कुछ ही महीनों में इतना धुंधला हो गया कि उसे पढ़ना मुश्किल हो गया। उन्होंने कंपनी से इस संबंध में लिखित शिकायत भी की, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
इसके बाद ग्राहक ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई और कंपनी की सेवा को लेकर भी सवाल उठाए।
Kalyan Silks ने आरोपों से किया इनकार
मामले में कंपनी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार नहीं किया। Kalyan Silks की ओर से आयोग के सामने कहा गया कि ऑफर से जुड़ी सभी आवश्यक शर्तें विज्ञापन में मौजूद थीं।
कंपनी का तर्क था कि ग्राहक को खरीदारी से पहले ही सेल्समैन और कैशियर की ओर से ऑफर की शर्तों के बारे में जानकारी दे दी गई थी।
कंपनी ने बिल को लेकर भी सफाई दी। उसका कहना था कि ग्राहक को सामान्य बिलिंग प्रक्रिया के तहत थर्मल पेपर पर इनवॉइस जारी किया गया था।
इसलिए कंपनी ने विज्ञापन को भ्रामक मानने और सेवा में कमी के आरोपों से इनकार किया।
उपभोक्ता आयोग ने कंपनी की दलील क्यों नहीं मानी?
जिला उपभोक्ता आयोग ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने विज्ञापन के उस हिस्से को महत्वपूर्ण माना, जिसमें ₹3,000 की खरीदारी पर ₹1,500 के शॉपिंग बेनिफिट का प्रमुखता से दावा किया गया था।
आयोग का मानना था कि किसी विज्ञापन को केवल छोटे अक्षरों में दी गई शर्तों के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता, अगर विज्ञापन का मुख्य संदेश आम ग्राहक को कुछ और समझाता हो।
आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि किसी विज्ञापन को एक सामान्य उपभोक्ता के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
यानी अगर विज्ञापन का सबसे प्रमुख संदेश ग्राहक को यह विश्वास दिलाता है कि उसे ₹1,500 का लाभ मिलेगा, तो बाद में फाइन प्रिंट में ऐसी शर्तें जोड़ना, जो उस लाभ को काफी मुश्किल बना दें, उपभोक्ता को भ्रमित कर सकता है।
₹1,500 का लाभ लेने के लिए करनी पड़ती अतिरिक्त खरीदारी
आयोग ने अपने फैसले में इस बात को भी रेखांकित किया कि कूपन की शर्तों के कारण ग्राहक को ऑफर का पूरा लाभ उठाने के लिए अतिरिक्त खरीदारी करनी पड़ती।
यानी ग्राहक को पहले ₹3,000 की खरीदारी करनी थी और इसके बाद ₹500-₹500 के तीन कूपन इस्तेमाल करने के लिए अलग-अलग मौकों पर कम से कम ₹1,500 की खरीदारी करनी थी।
आयोग के अनुसार, इस तरह विज्ञापन में दिखाई गई शुरुआती पेशकश और उसके वास्तविक इस्तेमाल की शर्तों के बीच महत्वपूर्ण अंतर था।
सेल्समैन की मौखिक जानकारी से नहीं खत्म होता भ्रामक असर
कंपनी की ओर से यह भी कहा गया था कि खरीदारी से पहले सेल्समैन और कैशियर ने ग्राहक को ऑफर की शर्तों के बारे में जानकारी दी थी।
हालांकि, आयोग ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना।
फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यदि कोई विज्ञापन ग्राहक को आकर्षित करके उसे शोरूम तक लाता है और विज्ञापन का मुख्य दावा भ्रामक पाया जाता है, तो बाद में कर्मचारी की ओर से दी गई मौखिक जानकारी उस प्रभाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।
दूसरे शब्दों में, कंपनियों को अपने प्रमोशनल ऑफर की मुख्य और महत्वपूर्ण शर्तों को साफ तथा आसानी से समझ आने वाले तरीके से बताना चाहिए।
धुंधला बिल भी माना गया सेवा में कमी
उपभोक्ता आयोग ने बिल से जुड़ी शिकायत को भी गंभीरता से लिया।
आयोग ने कहा कि ग्राहक को ऐसा बिल उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिसे वह उचित अवधि तक सुरक्षित रख सके और जरूरत पड़ने पर पढ़ सके।
अगर कुछ ही महीनों में बिल इतना धुंधला हो जाए कि उसकी जानकारी पढ़ना मुश्किल हो जाए, तो इसे सेवा में कमी के तौर पर देखा जा सकता है।
इसी वजह से आयोग ने कंपनी को ग्राहक को बिल की स्पष्ट और पढ़ने योग्य डिजिटल या डुप्लीकेट कॉपी उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।
Kalyan Silks को देना होगा कुल ₹31,500
जिला उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को ग्राहक के पक्ष में अलग-अलग मदों में भुगतान करने का आदेश दिया है।
| भुगतान का आधार | रकम |
|---|---|
| विज्ञापन में बताए गए शॉपिंग बेनिफिट के बदले | ₹1,500 |
| अनुचित व्यापार व्यवहार, असुविधा और मानसिक परेशानी का मुआवजा | ₹25,000 |
| मुकदमेबाजी का खर्च | ₹5,000 |
| कुल रकम | ₹31,500 |
इस तरह कंपनी को ग्राहक को कुल ₹31,500 का भुगतान करना होगा।
इसके अलावा, आयोग ने कंपनी को शिकायतकर्ता को खरीदारी के बिल की स्पष्ट और पढ़ने योग्य डिजिटल या डुप्लीकेट कॉपी देने का भी आदेश दिया है।
45 दिनों के भीतर करना होगा आदेश का पालन
आयोग के आदेश के मुताबिक कंपनी को निर्धारित अवधि में आदेश का पालन करना होगा। कंपनी को 45 दिनों के भीतर ग्राहक को तय रकम का भुगतान और बिल की स्पष्ट कॉपी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
अगर तय समयसीमा में भुगतान नहीं किया जाता है, तो मुआवजे की रकम पर 9% सालाना ब्याज लागू होगा।
उपभोक्ताओं के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?
यह मामला सिर्फ एक कंपनी और एक ग्राहक के विवाद तक सीमित नहीं है। यह उन उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो डिस्काउंट, कैशबैक, कूपन या शॉपिंग बेनिफिट वाले विज्ञापनों को देखकर खरीदारी करते हैं।
किसी ऑफर में सिर्फ बड़ी रकम का फायदा देखकर खरीदारी करने के बजाय उसकी पूरी शर्तें पढ़ना जरूरी है। खास तौर पर यह देखना चाहिए कि ऑफर तत्काल मिल रहा है या भविष्य की खरीदारी से जुड़ा है, न्यूनतम खरीदारी की कोई शर्त है या नहीं और कूपन कब तथा कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।
वहीं कंपनियों के लिए भी यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि प्रमोशनल विज्ञापनों में महत्वपूर्ण शर्तों को इस तरह नहीं छिपाया जा सकता कि ग्राहक को मुख्य ऑफर कुछ और दिखाई दे और वास्तविक लाभ लेने की प्रक्रिया कुछ और निकले।
ओणम ऑफर से शुरू हुआ यह विवाद अब उपभोक्ता आयोग के फैसले के बाद ₹31,500 के भुगतान तक पहुंच गया है। आयोग का फैसला विज्ञापन में किए गए दावों और उनकी वास्तविक शर्तों के बीच स्पष्टता की जरूरत को रेखांकित करता है।


